रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदीजी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति

        मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है



मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



शनिवार, 1 जुलाई 2017

ठंडे समाज की सिहरन


       तमाम ठंड़े दिमाग के लोग यही कह रहे हैं मोदीजी उपकार करेंगे!आरएसएस देश का मान-सम्मान ऊँचा करेगा।दुनिया में जहां पर भी आरएसएस जैसे संगठनों के लोग सत्ता में आए हैं सरकार ,समाज और देश का मस्तक गर्व से ऊँचा ही हुआ है ! इसलिए आरएसएस के प्रति शत्रुभाव रखने की जरूरत नहीं है ! दंगों में लोगों का मारे जाना, गऊ रक्षकों के हाथों निर्दोष लोगों की हत्या,कश्मीर में चल रहा उत्पीड़न असल में उत्पीड़न नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक काम है जिसे इस देश को हर हालत में और खुशी खुशी संपन्न करना चाहिए ! हमें ठंड़े रहकर चीजों को देखना चाहिए। ठंड़े रहकर ही समाधान खोजने चाहिए।हमें ठंड़े रहकर जीने की कला हिमालय से सीखनी चाहिए।कितना ठंड़ा है और कितना ऊँचा है ! कितना निर्जन है !ठंड़ा समाज,ठंड़ा दिमाग और निर्जन समाज और हिमालय जैसी शांति और ठंड़क ही है जो भारत को महान बनाती है ! उसके मान-सम्मान में इजाफा करती है।

ठंड़ा रहना,ठंड़ा सोचना और सिहरन में काँपते रहना यही है 21वीं सदी के भारत का सच।आप ठंड़े हैं तो सुरक्षित हैं ! ऐसे बनो कि कभी पिघलो मत।चाहे जितनी चिंताएं दिखाई दें,आदमी तकलीफों में डूब जाए लेकिन ठंड़े रहो! गुलफाम रहो!गुलाम रहो!

कल्पना करो बार-बार उन ऐतिहासिक क्षणों के बारे में मोदी सरकार क्यों याद दिला रही है ॽ उन नेताओं के नामों और कामों का स्मरण क्यों कर रही है जिनके जमाने में समाज गर्म था ॽउन क्षणों में मोदी सरकार क्यों मौजूद दिखना चाहती है जो समाज के गर्म क्षण थे।

सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ तो समाज गर्म था,पटेल ने विभिन्न रियासतों का भारत में विलय कराया था तब भारत गर्म था।आम जनता के मन में आशा और उमंगों की हिलोरें उठ रही थीं ,समाज में गर्म हवाएं चल रही थी, हर आदमी बेचैन था।यानी आज के ठंड़े माहौल से पुराने वाले माहौल की विलोम के रूपमें ही तुलना संभव है।कांग्रेस सत्ता के शिखर पर थी संसद में छाई हुई थी,आरएसएस संसद के बाहर था, लेकिन कल कांग्रेस संसद के बाहर खड़ी थी, कल आरएसएस ने संसद को घेरा हुआ था,सन् 47 में वे मुखबिर थे,आज वे देश के संरक्षक हैं,पहले वे गांधी के परमशत्रु थे ,आज वे गांधी के परमभक्त हैं! सन् 47 में कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन आज वे राजनीतिक प्रक्रिया के बाहर खड़े हैं। सन्47 के समाज में गर्म ऊर्जा थी,सन्2017 के समाज में सारी ऊर्जा ठंड़ी पड़ी है।गर्म समाज और ठंडे समाज में यही अंतर है।गर्म समाज ने सुई से लेकर परमाणु बम तक सब चीजों का निर्माण किया,ठंड़े समाज ने मात्र एप का निर्माण किया।विज्ञापनों का निर्माण किया।गर्म समाज के पास कुर्बानी का जज्बा था,ठंड़े समाज के पास आराम के साथ जीने,परजीवी की तरह रहने की आदत है।गर्म समाज सोचता था ,ठंड़ा समाज भोक्ता है।

ठंड़े समाज की स्प्रिट के साथ सन्47 की स्प्रिट की तुलना करना बेवकूफी है।आप चाहकर भी वह स्प्रिट पैदा नहीं कर सकते।सन्47 में सारा देश संसद में था,सारे मत-मतान्तर संसद में थे,लेकिन सन्17 में तो सिर्फ एक ही मत संसद में था,गैर-मोदी मत-मतान्तरों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया।याद रखो ठंड़े समाज में हरकत नहीं होती।ठंडा शरीर हरकत नहीं करता।जो हरकत नहीं करता वह समाज का निर्माण नहीं करता।हिमालय से भारत नहीं, भारत बनता है हिमालय को तोड़कर ! हिमालय प्रगति का प्रतीक नहीं है बल्कि हिमालय को बदलना ही प्रगति है।अफसोस की बात है हम ठंड़े होते जा रहे हैं!हिमालय होते जा रहे हैं!हिमालय बनने या ठंड़े समाज बनने का अर्थ है सभ्यता को,समाज को,दिमाग को प्रकृति को गिरवी रखना,तय करो किस ओर हो हिमालय की ओर या मनुष्यता की ओर ! मनुष्यता की सारी उपलब्धियां वे हैं जो उसने हिमालय को तोड़कर हासिल की हैं,लेकिन ठंड़े समाज का अंग बनकर आप उपलब्धियां हासिल नहीं कर सकते लेकिन हिटलर हासिल कर सकते हैं !





शुक्रवार, 30 जून 2017

गुलाम संविधान को नहीं मानते


                नए दौर का सबसे खतरनाक पहलू है कि गुलाम विचारधारा में यकीन रखने वाले हमारे देश के उदारतावादी संविधान को नहीं मानते।वे संविधान प्रदत्त नैतिकता को ठुकराते हैं।एक जमाना था ब्रिटिश गुलामी से मुक्त होने के लिए देश में स्वाधीनता की आकांक्षा थी, गुलामी से मुक्त होने के लिए स्वाधीनता ,स्वतंत्रता और उदारतावाद को हमने गले लगाया, उससे जुड़े मूल्यों और नैतिकता को अपना कंठहार बनाया।लेकिन आपातकाल के बाद पैदा हुए युवावर्ग में देश के लिबरल संविधान के प्रति, उससे जुड़ी नैतिकताओं के प्रति नफरत पैदा हुई ,इस नफरत की जड़ में है धर्म और जाति आधारित गुलाम विचारधाराएं।

आपातकाल के बाद पैदा हुए समाज में युवा का आतंक है, आक्रामकता है,राजनीति में जिसका चमकता हुआ चेहरा नजर आ रहा है,यह वह युवा है जिसके पास किसी भी किस्म के लोकतांत्रिक मूल्यों और हकों के लिए संघर्ष करने का कोई अनुभव नहीं है। इसे सारी लिबरल मान्यताएं बिना संघर्ष के मिली हैं।यह युवा अपने निहित स्वार्थों में इस कदर डूबा है कि उसे लोकतांत्रिक मनुष्य, लोकतांत्रिक समाज और लोकतंत्र के निर्धारक मूल्यों और नैतिकता से ऩफरत है।वह अपनी जाति और अपने धर्म की श्रेष्ठता और उनकी सर्वोपरि भूमिका के नशे में डूबा है।हर चीज को जाति और धर्म के पैमाने पर कसकर देख रहा है।यहां तक कि संविधान को भी जाति और धर्म के पैमाने पर परखकर देख रहा है।कायदे से जाति और धर्म की श्रेष्ठता पर उसे शर्म आनी चाहिए,लेकिन जाति और धार्मिक पहचान के रूप उसे इस कदर पसंद हैं कि उनके अलावा वह कोई चीज सुनने को तैयार नहीं है। यह वह युवा है जिसे बिना कोई संघर्ष किए सभी लोकतांत्रिक हक मिले हैं,लेकिन वह लोकतांत्रिक हकों, लिबरल संविधानजनित मूल्यों और नैतिकता को ठेंगे पर रखता है।हर चीज को जाति और धर्म की भीड़चेतना के आधार पर तय करना चाहता है।फलतः लोकतंत्र को इसने भीड़तंत्र में तब्दील कर दिया है।आप जरा टीवी इमेजों में जाति और धर्म के नाम पर उठे आंदोलनों को देखिए और उनमें शिरकत करने वालों की उम्र देखिए तो पाएंगे कि इनमें अधिकांश युवा हैं।

राममंदिर आंदोलन,असम आंदोलन,आरक्षण विरोधी आंदोलन आदि से यह युवा अपनी नई अ-लोकतांत्रिक पहचान के साथ समाज में दाखिल होता है। उल्लेखनीय है इन आंदोलनों में आरएसएस की केन्द्रीय भूमिका थी। समग्रता में इन सभी आंदोलनों के जरिए एक ही संदेश गया है ´हम संविधान को नहीं मानते´ ,´संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकता को नहीं मानते।´इन आंदोलनों में शामिल युवाओं को संविधानप्रदत्त हकों का लाभ मिला लेकिन इन लोगों ने संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकताओं को मानने से इंकार किया। वे अपने को विभिन्न नामों से संबोधित करने में रुचि रखते हैं लेकिन ´लोकतांत्रिक´ या ´नागरिक´ कहलाने में इनकी कोई रुचि नहीं है,मसलन्, वे कहते हैं ´हम भारतीय हैं´,´हम भारतीय मुसलमान हैं´,´हम हिंदू हैं´,´हम ईसाई हैं´,´हम दलित हैं´,आदि, लेकिन वे अपने को लोकतांत्रिक या नागरिक कहने से परहेज करते हैं।लोकतंत्र में रहना, लोकतांत्रिक उदार संविधान के हकों का उपभोग करना और लोकतांत्रिक पहचान के ´नागरिक´ रूप में अपने को न देखना,यह सबसे बड़ी कमी है।इस कमी को हमारा देश जिस दिन पूरा कर लेगा उस दिन वह संविधान का सम्मान करना सीख जाएगा।

नागरिक की पहचान हमें गुलाम पहचान के रूपों से मुक्त करती है, एक बड़ा परिवेश देती है,नए लोकतांत्रिक असंख्य विकल्पों को जन्म देती है। लोकतांत्रिक आत्म-सम्मान पैदा करती है। आयरनी यह है हम नागरिक के गौरव में जीने की बजाय जाति और धर्मगत पहचान के आत्म-सम्मान में जीना पसंद करते हैं।इससे समाज में लोकतंत्र कमजोर हुआ है और उससे फासिज्म को मदद मिली है।आज जो युवा मोदी-मोदी का नारा लगा रहा है,यह वही युवा है जिसके अंदर जाति और धर्म की गुलाम पहचान कूट-कूटकर भरी हुई है।वह गुलामी में मस्त है और निरंकुश की तरह व्यवहार कर रहा है।



बिना इज्जत के लोग


          आधुनिक युग की पहचान यह है कि मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रहती।वह अपनी आँखों के सामने ही अपनी इज्जत खोता है।आमतौर पर आधुनिककाल में त्रासदी के सभी नायकों के साथ यह हुआ है। आधुनिक युग का महानायक है किसान और व्यक्ति के रूप में, एक वर्ग के रूप में उसकी इज्जत इस युग में जिस तरह नष्ट हुई है,उस पर जितने लांछन और आरोप लगे हैं,उसकी निजी और सामाजिक तौर पर जितनी क्षति हुई है वह अकल्पनीय है। यही हाल मजदूरों का है।यह एक तरह से मनुष्यता के पीड़ा का युग है।शिक्षित लोग लगातार जिस तरह का आचरण कर रहे हैं वह अपने आपमें शिक्षा और शिक्षित दोनों को शर्मसार करने के लिए काफी है। पहले कहा गया कि शिक्षा व्यक्ति को मनुष्य बनाती है, बेहतर मनुष्य बनाती है लेकिन व्यवहार में यह देखा गया कि शिक्षितवर्ग के लोग बड़ी संख्या में बर्बरता कर रहे हैं,मसलन्, दहेज हत्या और हत्या के आंकड़े उठाकर देखें तो पाएंगे दहेज के नाम पर लड़कियों की हत्या और उत्पीड़न में शिक्षितों की केन्द्रीय भूमिका है।दहेज हत्या की अधिकतर घटनाएं शिक्षितों में घटी हैं। इनकी तुलना में अशिक्षितों और गरीबों में यह समस्या नहीं के बराबर है।असल में विवाह करने वालों के बीच संपत्ति जितनी होगी,बर्बरता और उत्पीड़न की मात्रा भी उतनी ही ज्यादा होगी।यही हाल अपराध के बाकी क्षेत्रों का है वहां भी शिक्षित अपराधियों की भरमार है।

यही स्थिति मध्यवर्ग के दूसरे पेशेवर तबकों की है उनमें भ्रष्टाचार इनदिनों चरम पर है,कायदे से शिक्षित को ईमानदार भी होना चाहिए। लेकिन मुसीबत यह है कि हमारी शिक्षा ईमानदार नहीं बनाती, दुनियादार बनाती है।व्यवहारवादी बनाती है। इसके कारण शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है जो अपने पेशेवर दायित्वों के प्रति गैर जिम्मेदार है।मसलन्, भ्रष्ट अफसरों के आंकड़े देखेंगे तो आंखें फटी रह जाएंगी,सबसे बेहतरीन नौकरशाह आईएएस-आईपीएस माने जाते हैं लेकिन हालात यह हैं कि इनमें भ्रष्टाचार और घूसखोरी चरम पर है ईमानदार अफसरों की संख्या दिनोंदिन घट रही है। एक जमाना था वे सबसे ईमानदार अफसरों में गिने जाते थे आज स्थिति यह है कि वे सबसे बेईमान हैं।

उल्लेखनीय है भ्रष्ट आईएएस-आईपीएस अफसरों की संख्या तेजी से बढ़ी है।ईमानदार अफसर गिनती के रह गए हैं।दिलचस्प बात है जो ईमानदार है वह ईमानदारी के कारण पीड़ित है,सरकार उसके प्रति निर्दयता से पेश आती है,उसे स्थिर होकर काम ही नहीं करने देती।मैंने कुछ दिन पहले अपने एक आईपीएस मित्र से पूछा कि इतने दिनों से नौकरी कर रहे हो क्या कमा लिया,कितना नगद बैंकों में जमा है तो बोला ज्यादा नहीं मात्र 170 करोड़ रूपये कमा पाया हूं।मैं मन ही मन सोच रहा था कि प्रोफेसर के नाते उससे पगार मेरी ज्यादा रही है ,मैं बमुश्किल कुछ लाख रूपये बैंक में अब तक जमा कर पाया हूँ और इस बंदे ने इसी दौरान 170 करोड़ कमा लिए।यही हाल और भी बहुत से अमीर दोस्तों का है,सबके सब शिक्षित हैं,बातें ऐसी करेंगे कि आपको निरूत्तर कर दें।लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में वे इस कदर अव्वल हैं कि लगता ही नहीं है उन पर शिक्षा का कोई असर हुआ है।मैं जब यह कहता हूं कि आधुनिक युग में मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रही तो इस दरअसल व्यवस्था के संदर्भ में मनुष्य के भ्रष्ट रूपों को देखकर ही कह रहा हूं। आधुनिककाल के ऐसे क्षण की कल्पना करें ,जिसमें हम रह रहे हैं, इसमें कोई बड़ा जनांदोलन नहीं हो रहा,सभी दल निरर्थक होकर रह गए हैं।

इसके समानांतर देखें गुलाम विचारधारा, विजेता बन जाएगी।हिंदुत्व की विचारधारा जो आज विजेता नजर आ रही है उसकी जड़ें आधुनिक समाज के विघटन की प्रक्रिया में निहित हैं।हिंदुत्व की विचारधारा आधुनिककाल में मुक्ति की विचारधारा नहीं है।बल्कि यह गुलामी की विचारधारा है।सामान्य लोग तेजी से गुलाम विचारधारा की गोद में दौड़-दौड़कर जा रहे हैं।



उल्लेखनीय है पुरानी परंपरागत हिंदू विचारधारा हो या नई आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा हो उसका मानसिक-सामाजिक गुलामी से गहरा संबंध है, इस संबंध की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।यह दौर गुलामी की विचारधारा के उभार का है।अब संविधान की व्याख्याएं हिंदुत्व की संगति में की जा रही हैं,संविधान की वे बातें नहीं मानी जा रहीं जो संविधान निर्माताओं ने कही हैं बल्कि वे बातें मानने पर जोर है जो हिंदुत्व कह रहा है। संविधान और हिंदुत्व के बीच में सह-संबंध बनाने और संविधान की हिंदुत्व सम्मत नई व्याख्याओं पर मुख्य रुप से जोर दिया जा रहा है।यह नए खतरे की घंटी है।

हम कितने असहाय हैं !


          संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुकेहैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।

फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक विचारों,अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।

फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।

´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं,उसके नाम पर किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं।

पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ के विचार को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे।



फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है।मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद इसकी बुनियाद है।अविवेकवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे।

गुरुवार, 29 जून 2017

जुनैद की हिमायत में


               आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस –भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा –आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ

कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´।



-´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

बुधवार, 28 जून 2017

जुनैद के हत्यारों की तलाश में

        जुनैद मारा जाए या अखलाक मारा जाए,एक वर्ग ऐसा है जो इन सब हत्याओं से बेखबर-निश्चिंत है।उनके तर्क सुनेंगे तो गुस्सा आने लगेगा।वहीं दूसरी ओर आरएसएस वालों के तर्क सुनेंगे तो वे पलटकर कहेंगे आप इस समय बोल रहे हैं, मुसलमान मारे जा रहे हैं तब क्यों नहीं बोल रहे थे, फलां-फलां समय फलां –फलां मारा गया तब आप चुप क्यों थे, आपने हल्ला क्यों नहीं किया।आप उनको कहेंगे कि देखिए यह पैटर्न है हत्या का ,और अब तक 22 मुसलमान मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, तो वे कहेंगे हम इसमें क्या करें,हत्या हुई है तो कानून अपना काम करेगा,कानून को काम करने दें।कानूनी तंत्र जो कहे और जो करे उसकी मानें।आप ज्यादा बोलेंगे तो वे एक लंबी फेहरिश्त बताने लगते हैं और कहते हैं सैंकड़ों सालों से मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है उस समय के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते।

कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक हिंसा की जब भी कोई घटना होती है और आप संवाद करना चाहें तो साम्प्रदायिक लोग बहस को अतीत में ले जाते हैं, गैर-जरूरी ,अप्रासंगिक मसलों की ओर ले जाते हैं।इस क्रम में वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं,बार-बार वैज्ञानिक समझ और नजरिए को निशाना बनाते हैं,कम्युनिस्टों पर हमले करते हैं।

असल में साम्प्रदायिकता की बुनियादी लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति की अवधारणा से है। वे प्रगति को सहन नहीं कर पाते। विचारों से लेकर जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति को वे सहन नहीं कर पाते। यह सच है विगत 70साल में देश में प्रगति हुई है। अनेक कमियों के बावजूद प्रगति हुई है और यही प्रगति असल में आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर है।

हममें से अधिकतर लोग हिन्दुत्व की विचारधारा को शाकाहारी विचारधारा के रुप में देखते हैं। लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिकता या हिंदुत्व एकदम नॉनवेज विचारधारा नहीं है,बिना हिंसा के इसे चैन नहीं मिलता।सतह पर हिन्दुत्ववादी विचार बड़ा भोला-सीधा लगता है लेकिन आचरण में पूरी तरह अविवेकवादी है।समाज में अविवेकवादी होना पशुता की निशानी है लेकिन हमने कभी इस रुप में देखने की कोशिश ही नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि कारपोरेट घरानों या बुर्जुआजीके प्रति आम जनता में जितना गुस्सा बढ़ता है ठीक उसके समानांतर आरएसएस जैसे संगठन आक्रामक रुप में खड़े हो जाते हैं।बुर्जुआजी जब बेचैन,निराश और पराजय के दौर से गुजरता है तब ही आरएसएस जैसे संगठन प्रगतिशील विचारों,मजदूरों-किसानों के हितों पर हमला बोलते हैं,इसी अर्थ में मैंने कहा था कि संघ को प्रगति से नफरत है। वे मुसलमान से नफरत नहीं करते वे प्रगति और प्रगतिशील विचारधारा और प्रगतिशील वर्गों से नफरत करते हैं और कारपोरेट घरानों की वैचारिक-राजनीतिक सेवा करते हैं।

नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ सारे देश में जिस समय सबसे ज्यादा गुस्सा था,मनमोहन सिंह के खिलाफ देश में आंधी चल रही थी,कारपोरेट घराने और उनके विचारक जनता में अलग-थलग पड़ चुके थे ठीक उसी समय सांड की तरह आरएसएस सामने आता है और सभी किस्म के प्रगतिशील विचारों को पहला और आखिरी निशाना बनाता है और यही वह चीज है जो गंभीरता से समझने की जरूरत है।सवाल यह है आरएसएस इतना ताकतवर क्यों बना ॽ उसके कामकाज और राजनैतिक एक्शन किसकी वैचारिक मदद करते हैं ॽ



हम सब लगातार समाज में विवेकवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और चाहते हैं कि विवेकवाद को आम जनता के आम-फहम विचार की तरह पेश किया जाए,यह चीज बुर्जुआजी को नापसंद है और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर आरएसएस हमला करता है,आरएसएस के हमलों की धुरी है अविवेकवाद। इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आरएसएस को यदि किसी चीज की जरूरत है तो वह है अविवेकवाद।वे अपनी सांगठनिक और वैचारिक क्षमता के विकास और विस्तार के लिए अविवेकवाद का बहुआयामी इस्तेमाल करते हैं।आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि देश को अविवेकवाद की आंधी से कैसे बचाएं।

जुनैद नहीं भारत की हत्या के प्रतिवाद में

         छह दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक एक गिरफ्तारी हुई है।जबकि वे बीस से अधिक थे और उन सबके हाथों में चाकू थे,वे चाकू लिए ही ट्रेन में दाखिल हुए थे,संयोग की बात थी कि जुनैद अपने भाईयों के साथ उस ट्रेन में था।कोई तर्क जुनैद की हत्या को वैध नहीं बना सकता,लेकिन मजाल है कि भाजपा के लोगों के मुँह पर शिकन पड़ी हो,वे गम में हों !

प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सबको मालूम है लेकिन कोई जुनैद के घर नहीं गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी जुनैद के घर नहीं गए।कम से कम मानवता और संवेदनशीलता के नाते जुनैद के घर शोक व्यक्त करने जा सकते थे,ट्विटर पर एक-दो पोस्ट लिख सकते थे।लेकिन पीएम,सीएम,मुख्यमंत्री किसी के पास जुनैद की मौत पर शोक व्यक्त करने का समय नहीं है।

बेशर्मी की हद देखो कि टीवी चैनलों में जुनैद की हत्या को वर्गीकृत कर रहे हैं और बता रहे हैं यह तो यात्रियों के बीच में सीट पर बैठने का झगड़ा था।सत्ता में बैठे लोग यह देखने को तैयार नहीं है कि देश में चारों ओर घृणा की विचारधारा की जहरीली हवा चल रही है और उस हवा को चलाने में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की केन्द्रीय भूमिका है। हम सब जानते हैं साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के नाम पर जब भी जहां पर भी प्रचार आरंभ होता है ,जब आम जनता उसमें भाग लेने लगती तो सबसे पहले राजसत्ता और उसके तंत्र ठंड़े पड़ जाते हैं,पुलिस-सेना के हाथ-पैर फूल जाते हैं,दिमाग सुन्न हो जाता है,अनेक मामलों में तो सत्ता के तंत्र स्वयं भी उस जहरीले प्रचार का अंग बन जाते हैं और आम जनता पर साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों के साथ मिलकर हमला करने लगते हैं।आज ठीक देश की यही अवस्था है।सारा देश मुसलिम विरोधी प्रचार में डूबा हुआ है। मुसलिम विरोध को स्वाभाविक बनाकर हम सबके मन में उतार दिया गया है।

आज वास्तविकता यह है कि मोदीसरकार रहे या जाए मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार समाज से सहज ही जाने वाला नहीं है।इसका प्रधान कारण है साम्प्रदायिकता के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों का खुला समर्पण।देश के विभिन्न इलाको में इस समर्पण को साफ तौर पर देखा जा सकता है।मुसलिम विरोधी साम्प्रदायिक जहर महज सामान्य प्रचार या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि यह असामान्य राजनैतिक कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य है समाज को,लोगों के दिलो-दिमाग को साम्प्रदायिक आधारों पर विभाजित करना,साम्प्रदायिक तर्कों को सहज,बोधगम्य बनाना और आम लोगों के दिलो-दिमाग में उतारना।इस काम में आरएसएस पूरी तरह सफल हो चुका है। आज उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा की पकड़ में सारा देश है।हर आदमी है।चाहे वह किसी भी दल का हो।

जो लोग सोचते हैं साम्प्रदायिक विचार मुझे नहीं उसे प्रभावित कर सकते हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। साम्प्रदायिक विचार सबको प्रभावित कर सकते हैं,वे जिस गति ,आक्रामकता और स्वाभाविक रूप में आ रहे हैं उससे हर कोई प्रभावित होगा,वे भी प्रभावित हो सकते हैं जो उसके शत्रु दिख रहे हैं।

साम्प्रदायिकता का मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार तमाम किस्म के कॉमनसेंस विश्वासों,कपोल-कल्पित कहानियों और धारणाओं के जरिए फैलाया जा रहा है। जुनैद की हत्या सतह पर उन 20गुंडों ने की है जिनके पास चाकू थे,लेकिन असल में उन चाकुओं में धार और उनको चलाने का बहशियाना भावबोध तो मुसलिम विरोधी प्रचार ने निर्मित किया था।जुनैद के कातिल पकड़े जाएं यह जरूरी है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि मुसलिम विरोधी जहरीले प्रचार अभियान के खिलाफ बिना किसी किन्तु-परन्तु और बहानेबाजी के हम सब एकजुट हों,उसके खिलाफ जमकर लिखें,बोलें,आंदोलन करें।असल में जुनैद के हत्यारे हमारे अंदर प्रवेश कर चुके हैं। वे जुनैद को नहीं हम सबको रोज चाकुओं से मार रहे हैं,हमें साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने से रोक रहे हैं।



जुनैद मुसलमान नहीं था।वह भारतीय नागरिक था।साम्प्रदायिक ताकतें सतह पर मुसलमान को मारती दिखती हैं लेकिन वे असल में नागरिक को मार रही होती हैं,नागरिक हकों पर हमले कर रही होती हैं,संविधान के परखच्चे उडा रही होती हैं।उनके सामने पीएम,सीएम,न्यायपालिका बौने हैं।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

नवजागरण और शूद्रों की मुक्ति के सवाल


          भारतीय नवजागरण पर जब भी बहस होती है तो दलितों या शूद्रों की मुक्ति के सवालों पर बहस नहीं होती,यह मान लिया गया कि दलितों की मुक्ति का आरंभ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के आने के बाद होता है। ज्योतिबा फुले दलित मुक्ति के मिशन की नींव रखते हैं,लेकिन इस पर पूरा शास्त्र बाबासाहेब ने ही बनाया।
     दलित मुक्ति का सवाल जहां एक ओर दलितों की मुक्ति से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर यह सवाल फुले-आम्बेडकर के सत्ता विमर्श से जुड़ा है। इन दोनों को अंग्रेजों के शासन से कोई गंभीर शिकायत नहीं है। ये दोनों ही तत्कालीन सत्ता से हमदर्दी रखते हैं। सवाल यह है क्या दलितों की मुक्ति पूंजीवाद में संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श में वैकल्पिक नजरिए से शामिल हुए बगैर दलित के लिए संघर्ष करना संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श दलितों को मुक्ति देता है
    नवजागरण बुर्जुआ संवृत्ति है।यह आधुनिकता के प्रकल्प का अंग है,इसे क्रांतिकारी प्रकल्प नहीं समझना चाहिए।यदि नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के नजरिए को देखेंगे तो यह मूलतःआधुनिकतावादी आंदोलन है।इसी तरह बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का समग्र नजरिया बुर्जुआ है और उसकी धुरी है आधुनिकता।पुराने किस्म के दलित की बजाय आधुनिक दलित की खोज और निर्माण उसका केन्द्रीय लक्ष्य है।यह नजरिया दलित को पुराने सामंती शोषण से मुक्त तो करता है लेकिन दलितों में शोषणमुक्त समाज का नजरिया नहीं बनाता।पूंजीवाद से मुक्ति का सपना पैदा नहीं करता।
यही वजह है 20वीं शताब्दी में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ही दलित मुक्ति के केन्द्र में है।इस धारणा ने कई स्टीरियोटाइप सरलीकरणों को जन्म दिया है।पहला,दलित मुक्ति का एकमात्र रास्ता वही है जिसको आम्बेडकर व्यक्त करते हैं।दूसरा,शिक्षा से जातिप्रथा नष्ट हो जाती है,तीसरा,दलितमुक्ति के लिए आरक्षण जरूरी है,चौथा,पूंजीवाद के विकास के साथ जातिप्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी,जाति शोषण नष्ट हो जाएगा।पांचवां,महानगरीय जीवन जातिप्रथा खत्म कर देता है। ये पांचों चीजें आधुनिकता के प्रकल्प का हिस्सा है। इन सरलीकरणों के पीछे आस्थाएं ही प्रमुख रूप से काम करती रही हैं।आस्था केन्द्रित होने के कारण नवजागरण और दलित पर बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसका यथार्थ से कम संबंध है,इसमें इच्छित लक्ष्यों और इच्छित तर्कों के आधार पर इच्छित सामाजिक यथार्थ की सृष्टि करने में भारत के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग सफल रहा है।
     नवजागरण और शूद्र के अन्तस्संबंध के प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि नवजागरण वस्तुतःदलितमुक्ति का प्रकल्प नहीं है।बल्कि यों कहें तो सही होगा कि नवजागरण के दलित मुक्ति के बुनियादी लक्ष्यों से  गहरे अंतर्विरोध हैं।
   जाति कहां है -
        जाति के समान कोई चीज नहीं है जिसके साथ जाति का विनिमय नहीं हो सके। जाति का किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है,यह व्यवस्था या सिस्टम है,इसको आप पूरा छोड़ें तब ही जाति से मुक्ति संभव है,जाति में से किसी अंश को रख लो,अथवा उस जाति का वह गुण ले लो या निचली जाति से ऊँची जाति में या अ-सवर्ण से सवर्ण जाति में चले जाने से जाति खत्म होने वाली नहीं है।अंशों में विनिमय के जरिए जाति खत्म नहीं होगी।जाति तो जाति है उसका विनिमय नहीं कर सकते।वह बेहद ठोस भौतिक शक्ति है, उसके साथ भेदभावभरी व्यवस्था के साथ विनिमय संभव नहीं है।जाति ठोस है,उसके विचार चंचल हैं,इसलिए जब भी जाति बदलती दिखती है तो असल में जाति नहीं बदलती उसके विचार बदलते हैं,जाति तो जस की तस बनी रहती है।विचारों के विनिमय से जाति नहीं बदलती।विचार बदलते हैं,जाति असल में शोषण का एक रूप है,जो बड़ी बारीकी से हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन में व्याप्त हो गयी है।हम जब जाति सुधार की बातें करते हैं तो अधिक से अधिक जाति के बुरे विचार को निकाल फेंकने की बातें करते हैं।इससे जाति नष्ट नहीं होती।

    जाति कोई सामाजिक समूह नहीं है,सामाजिक समूह के रूप में जाति को देखेंगे तो सही निष्कर्ष नहीं निकलेंगे।जाति को सामाजिक समूह के रूप में देखेंगे तो हमें अधिक से अधिक उसके ऊपरी ढाँचे को बदलने की इच्छा पैदा होगी,हम ऊपरी ढाँचे को बदल देंगे,लेकिन इससे जाति की आत्मा नहीं बदलेगी।छूआछूत,ऊँच-नीच,निचली जाति,ऊँची जाति, मनु व्यवस्था या अन्य व्यवस्थाएं या संवैधानिक व्यवस्थाएं अपने आपमें जाति को खत्म नहीं कर सकतीं,क्योंकि सभी किस्म के संवैधानिक उपाय जाति के ऊपरी कलेवर को बदलते हैं,उसकी आत्मा को स्पर्श नहीं करते।असल में जाति की आत्मा विनिमयरहित है।जाति के एक विचार को खत्म करेंगे,तो तुरंत दूसरा विचार उसकी हिमायत में उठ खड़ा होगा।हम करीब से उन जातियों को देखें जहां पर जाति का ऊपरी तौर पर खात्मा हो गया है लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई है। मसलन्,पश्चिम बंगाल में जातिप्रथा खत्म हो गयी है लेकिन उसकी जगह शोषित-शोषक के नए संबंधों ने जन्म ले लिया है,उन संबंधों को सहज ही घर-घर जाकर देख सकते हैं। कहने का आशय यह कि जाति तो शोषण का पुराना आदिम रूप है,वह हम सबकी आदतों,संस्कारों,चाल-चलन,रीति-रिवाज आदि में घुस आया है,वह सिर्फ समुदाय के रूप में ही मौजूद नहीं है बल्कि उसने दृष्टिकोण में जगह बना ली है।यही वजह है जाति के समान और कोई जगत नहीं है।
      जाति में रहने और जाति के मार्ग पर चलने का अर्थ है कि इसमें पैर जमाकर चल ही नहीं सकते, यह बेहद रपटन भरा मार्ग है।पुराने समाज में जाति के समान कोई चीज मौजूद नहीं है, आज भी जाति के समान कोई चीज नहीं है,जाति से किसी चीज की तुलना नहीं कर सकते,यह अतुलनीय है।इसने जीवन के हर क्षेत्र को अपने दायरे में शामिल कर लिया है।जाति के लिए समाज का हर आईना छोटा है,जाति हमारे विजन में इस कदर घर किए हुए है कि हम उसके बिना कोई चीज देख ही नहीं सकते।जाने-अनजाने जाति हमारे नजरिए  को प्रभावित करती है,वहां से हमारे ज़ेहन में शोषण के लक्षण व्यंजित होते रहते हैं।
    जाति को हमें सिस्टम की तरह देखना चाहिए।सिस्टम की तरह देखेंगे तो इसके आर्थिक आधार को भी देख पाएंगे।जाति कोई मानसिक अवस्था या विचार मात्र नहीं है।कहने के लिए जाति के ही आधार पर हर तरह का कार्य-व्यापार चलता रहा है।लेकिन जाति को आज इसके जरिए किसी चीज का विनिमय नहीं कर सकते।जाति के इस दौर में तीन और क्षेत्र सामने आए हैं वह है राजनीति,न्याय और साहित्य।इन तीनों क्षेत्रों में जाति के आधार पर देखने,विनिमय करने की बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं लेकिन मुश्किल यह है जाति को आधार बनाकर ज्योंही संप्रेषण करेंगे,संप्रेषण खत्म हो जाएगा।इसका प्रधान कारण यही है कि जाति को आधार बनाकर कोई बात नहीं की जा सकती, जाति की किसी से तुलना संभव नहीं है, किसी से विनिमय संभव नहीं है। क्योंकि जाति का जाति के बाहर कोई अर्थ नहीं है,जाति तब तक ही अर्थवान या प्रासंगिक है जब तक जाति के दायरे में रहकर विचार करते हैं। जाति की राजनीति तब तक चमकदार नजर आती है जब तक वह जाति केन्द्रित रहे,उसी तरह दलित साहित्य की केटेगरी तब तक प्रासंगिक है जब तक दलित के लेखन को जाति के आधार पर देखा जाय,उसके बाहर इनकी प्रासंगिकता नहीं है।जाति की इस सीमा को हमेशा ध्यान में रखें।
    जाति की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह अपने में हर चीज को समाहित करने की क्षमता रखती है।जो लोग जाति के आधार पर सोचते हैं वे हर चीज को जाति के आधार पर ही देखते हैं,चाहे राजनीति हो या न्याय हो या साहित्य या कला रूप हों,इन सब पर बातें करते समय हमेशा हर चीज को खींचकर जाति में समाहित कर लेते हैं।जब वे किसी चीज को जाति के आधार पर देखते हैं तो फिर उसमें से इच्छित अंतर्वस्तु भी निकाल लेते हैं। वे इस इच्छित अंतर्वस्तु को यथार्थ में रूपान्तरित नहीं कर पाते। उसके भिन्न अर्थ को देख नहीं पाते।
      जाति की तीसरी सबसे बड़ी विशेषता है उसके अंदर केटेगरी या कोटियों की अनिश्चितता है।मसलन्,जो जाति यूपी में आरक्षित केटेगरी में आती है,जरूरी नहीं है वह बंगाल या अन्य जगह आरक्षित केटेगरी में हो। यही वजह है जाति का भिन्न –भिन्न इलाकों या समुदायों में अलग ढ़ंग का विकास और चरित्र नजर आता है।इससे जाति की काल्पनिकता या विभ्रम सामने आते हैं।
     जाति को केन्द्र में रखकर जितना भी विमर्श निर्मित हुआ है उसके केन्द्र में प्रतीकों की भाषा है। इस भाषा ने जाति को वस्तुओं के संसार में एक वस्तु बना दिया है।फलतःवह अनुमान और अनुकरण पर चलती रही है,और आज भी चल रही है।उसके काल्पनिक और वास्तविक रूप में भेद करना असंभव है। मसलन्, एक ओर शूद्र अतिगरीब मिलेंगे तो दूसरी ओर आईएएस भी मिलेंगे,आप तय नहीं कर सकते कि यथार्थ में शूद्र क्या है सच यह है जाति पर अधिकांश बहस अनुमानाधारित है,जबकि दावे किए जाते हैं कि वह यथार्थ पर आधारित है।दिक्कत तब आती है  जब आप एक ही साथ अतिगरीब शूद्र और आईएएस शूद्र को सामने रखकर देखते हैं।इससे हमारे अनुमान में निहित अ-व्यवस्था का उद्घाटन होता है।
   ज्योंही यथार्थ और विवेकवाद इन दो तत्वों का जाति के मूल्यांकन के प्रसंग में इस्तेमाल करते हैं तो जाति हमें ठोस रूप में स्थिर नजर आने लगती है, इस तरह दिखने लगती है कि उसका किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है। जाति के सिद्धांत के दायरे में तो जाति प्रासंगिक लगती है लेकिन ज्योंही जाति के सिद्धांतों के बाहर निकलोगे तो जाति अ-प्रासंगिक नजर आने लगेगी।
   सवाल यह है जाति पुराना सिस्टम है,नया आधुनिक सिस्टम पूंजीवाद है।क्या जाति का पूंजीवाद के साथ विनिमय संभव है क्या पूंजीवाद में जातियों का लोप हो जाएगा जी नहीं,पूंजीवाद में जातियों का लोप नहीं हो सकता।उल्टे जातियों के विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार पूंजीवाद ने खोले हैं। नवजागरण आने के बाद जातियों की संख्या बढ़ी है, घटी नहीं है।जातियों के नाम पर सुख,सुविधा,कानून आदि सबमें इजाफा हुआ है,जातियों का विभिन्न नई जातियों में नाम परिवर्तन हुआ है लेकिन जाति का लोप नहीं हुआ है। जातियों के लिए नई परिधियां तय कर ली गयी हैं,नए आधार तय कर लिए गए हैं।इससे जाति के सिस्टम में अनिश्चितता और बढ़ी है।मसलन्, आज से सौ साल पहले व्यक्ति को जिस जाति के सदस्य के रूप में जानते थे वह आज उस जाति से निकलकर भिन्न जाति में शामिल हो चुका है।ऐतिहासिक तौर पर जाति के नाम का बदलना बताता है जाति में नाम बदलने,नियम बदलने,स्वयं ही अपने को नष्ट करके नए रूप में पेश करने की विलक्षण क्षमता है।इसके कारण जाति अपने को बार-बार प्रासंगिक और नए मूल्यबोध से जोड़ने में सफल हो जाती है।फलतः वह अपने को नष्ट करने में असफल रहती है।इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि जाति हर बार नया विभ्रम और अनिश्चितता  निर्मित करती है।इसका अर्थ यह भी है जाति खत्म होती नजर नहीं आती बल्कि आर्थिक तौर पर और भी ज्यादा ताकतवर नजर आती है। समग्रता में देखें तो जाति के लिए मूल्य और कानून अपवाद हैं ,विभ्रम यानी इल्युजन बुनियादी नियम है,फलतः जाति हमेशा समाज में बनी रहती है।मसलन्, आप जाति के नाम पर सब कुछ पा सकते हैं ,सब कुछ पाने के बाद भी जाति से आप मुक्त नहीं होते तो हम यही कहेंगे कि जाति के साथ किसी भी चीज का विनिमय संभव नहीं है। मसलन्, जाति के नाम पर शिक्षा,रोजगार,सामाजिक हैसियत आदि सब मिल जाता है,इसके बाद भी जाति नहीं छूटती।इसका अर्थ यह भी है कि जाति सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित सिस्टम है जिसे आप नियम, कानून, रोजगार,शिक्षा आदि प्रदान करके भी खत्म नहीं कर सकते।बल्कि उलटे इनसे जाति के और भी पुख्ता हो जाने की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।
   जाति पर बहस के दौरान असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीन कोटियों में जाति विमर्श सामने आया है।इन तीनों तत्वों या कोटियों को यदि जाति के परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाएगा तो यह तय है ये तीनों तत्व लौट-फिरकर वापस केन्द्र में आ जाएंगे।क्योंकि इन तीनों में अनुकरण पैदा करने की विलक्षण क्षमता है।ये अंतहीन चक्राकार रूप में घूमते रहते हैं।कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए,लग रहा था अब किसान कर्ज मुक्त हो गया है,लेकिन कुछ ही सालों में किसान फिर कर्जगीर हो गया।इन किसानों में दलित जातियों का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।इसी तरह दलित के उत्पीड़न को लेकर जितने भी सख्त कानून बना लो,उत्पीड़न पुनःलौटकर आ जाता है। तमाम कानून बनाने के बावजूद दलितों का उत्पीडन खत्म नहीं हुआ है,यही हाल औरतों के उत्पीड़न का है।असल में असमानता,कर्ज और उत्पीड़न ये तीन कोटियां ऐसी हैं जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी बनी रहती हैं, इनके जरिए यथार्थ के साथ विनिमय नहीं कर सकते। इनके जरिए यथार्थ नहीं बदल सकते,इनके जरिए कोई नई चीज पैदा नहीं कर सकते।

     असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीनों के आधार पर जब भी कोई परिप्रेक्ष्य खड़ा किया जाएगा वह अंततःअसफल होगा।मसलन्, यह माना गया कि भूमिहीनों को जमीन बांट देने से गांवों में असमानता घटेगी,भूमिहीन किसान ताकतवर बनेगा,पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू किया गया,लेकिन दो दशक के बाद पता चला कि भूमिहीन किसान जमीन के पाने के बावजूद असमानता,अभाव,कर्ज के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाया,उसकी पामाली घटने की बजाय बढ़ गयी।उसे जिन चीजों से बचाने के लिए जमीन दी गयी थी उन चीजों से जमीन उसकी रक्षा नहीं कर पायी।

बंदूक सबके पास है-

               राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है।छत्तीसगढ़ में सालों से पुलिस कार्रवाई हो रही है।नोट स्ट्राइक से सर्जीकल स्ट्राइक तक सब कुछ कर चुके हो,यह भी कह चुके हो,छत्तीसगढ़ और दूसरे इलाकों में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी,नक्सल बर्बाद कर दिए,फिर यह अचानक 300 नक्सलों ने सीआरपीएफ पर हमला कैसे कर दिया मोदीजी ?
सीआरपीएफ के अनेक जवान नक्सली हमले में मारे गए हैं,हम सब दुखी हैं ,इस हमले की निंदा करते हैं,लेकिन जब सीआरपीएफ के हमले से नक्सली मारे जाते हैं या फिर उन पर बेइंतिहा पुलिस जुल्म होते हैं,झूठे केस लगाकर उनको फंसाया जाता है तब भी हमें तकलीफ होती है।
देश के लिए पुलिस-सेना के जवान जितने महत्वपूर्ण हैं आदिवासी नक्सली भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन बंदूक की नोंक पर छीनी जाएगी तो वे बंदूक का जवाब फूलों की माला पहनाकर नहीं देंगे।बंदूकें सबके पास हैं।
आदिवासियों की बंदूक की नोक पर बेदखली बंद करो,आदिवासियों को न्याय और सुरक्षा दो,हम भी देखते हैं नक्सल कैसे हमले करते हैं !
नक्सलों को आदिवासियों में हीरो तो भाजपा की गलत नीतियों ने बनाया है,पहले यही काम कांग्रेस कर रही थी।
आदिवासी हों या नक्सल हों या माओवादी हों ,वे सब वैसे ही भारत के नागरिक हैं जैसे सेना-सीआरपीएफ -कारपोरेट घराने आदि।लेकिन भाजपा सरकार के नजरिए में सेना-कारपोरेट घराने-सीआरपीएफ आदि तो प्रिय हैं लेकिन अन्य अप्रिय हैं,शत्रु हैं,उनको न्याय पाने का हक नहीं है।इस तरह एक आंख से यदि सरकार देखेगी और अन्याय करेगी तो आदिवासियों और नक्सलों का प्रतिवाद थमने वाला नहीं है।
नक्सली प्रतिवाद को टीवी पर विजय का डंका बजाकर,फेसबुक पर बटुकसंघ के साइबरसैनिकों से हमला कराके परास्त नहीं किया जा सकता।कम से कम मोदीजी इतना तो जान लो आपसे या रमनजी की सरकार से छत्तीसगढ़ के आदिवासी खुश नहीं हैं,आदिवासियों की संकट की घड़ी में राज्य सरकार को मदद करनी चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है,फलतःआदिवासियों की मदद करने का नक्सलों को मौका मिला है।आदिवासियों में नक्सलों का सांगठनिक विस्तार हुआ है,मोदीजी आपकी और रमन सरकार की नक्सलवादियों के बारे में की गयी सभी घोषणाएं झूठी साबित हुई हैं।आपके और रमन सरकार का आदिवासियों पर कोई असर नहीं है,कोई आदिवासी आप पर विश्वास नहीं करता।आदिवासियों का घर उजाड़कर भाजपा-आरएसएस-कारपोर्ट घरानों का घर बसाया नहीं जा सकता।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

कश्मीर पर नल्लागिरी कर रही है मोदी सरकार

        ´भाबी जी घर पर हैं ´सीरियल में एक पात्र है विभूतिनारायण मिश्रा, उनकी खूबी है वे नल्ले हैं ,यानी बेरोजगार हैं।इसी तरह कश्मीर मामले पर हमारे पीएम नल्ले हैं,बेरोजगार हैं, उनके पास कश्मीर को लेकर कोई काम नहीं है।उनका समूचा मंत्रीमंडल नल्लागिरी का शिकार है,इसके कारण कश्मीर के संदर्भ में नीतिहीनता-दिशाहीनता की स्थिति पैदा हो गयी है।
मोदी की कार्यशैली में अक्लमंदों-नीतिविशारदों की न्यूनतम भूमिका है,वे हर काम कॉमनसेंस और नौकरशाही के बल पर करने के अभ्यस्त हैं,वे भूल गए हैं कि वे अब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं भारत के पीएम हैं।उनको अनेक ऐसे क्षेत्र देखने होते हैं जहां नीति,दूरदृष्टि और विश्वदृष्टि की जरूरत होती है।हर चीज नौकरशाही-कॉमनसेंस और गुजरातदृष्टि या एप बनाने से हल नहीं होती। मोदी का एप बनाने पर जोर मूलतः उनके तकनीकी कॉमनसेंस की देन है इसका किसी नीतिगत विवेकवाद से कोई संबंध नहीं है।
मोदी के सामने मुश्किलें तब आती हैं जब कोई जटिल नीतिगत मसला आकर फंस जाता है और यहीं पर मोदी का व्यक्तित्व एकदम बौना हो जाता है। कल वे जब मंत्रीमंडल के कुछ सहयोगियों,ढोभाल,थल सेनाध्यक्ष आदि को लेकर कश्मीर की स्थिति पर बातें कर रहे थे तो लोग इंतजार में थे कि कोई बड़ा नीतिगत बयान आ सकता है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई नीतिगत बयान नहीं दिया बल्कि जो बयान दिया वह पीएम और उनकी सरकार की कश्मीर पर नल्लागिरी को सामने लाता है।
पीएम यह मानकर चल रहे हैं कश्मीर में स्थिति अपने आप जब सामान्य होगी तब वे कोई कदम उठाएंगे,अब पीएम को कौन समझाए कि कश्मीर में सामान्य हालात तब बनेंगे जब मोदी सरकार झुकेगी,सेना के हस्तक्षेप को रोकेगी,पीडीपी-भाजपा चुनाव घोषणापत्र में जो वायदे किए गए थे उनको पूरा करने के लिए पहल करेगी,कश्मीर पर सभी संबंधित पक्षों को बुलाकर बातचीत करेगी।आश्चर्य की बात है कश्मीर पर सभी से बातचीत करने का चुनावी वायदा करके,हुर्रियत के वोट पाकर भाजपा नेता अब हुर्रियत से बातचीत करने को तैयार नहीं हैं।हुर्रियत से जब बात नहीं करनी थी तो संयुक्त चुनाव घोषणापत्र में हुर्रियत सहित सभी पक्षों से बातचीत आरंभ करने का वायदा क्यों किया था ॽ विधानसभा चुनाव पहले श्रीनगर बाढ़ में डूब गया था उस समय मोदी ने पीड़ितों को आर्थिक मदद देने का वायदा किया था,पैकेज घोषित किया था लेकिन आज तक मदद आम लोगों तक नहीं पहुँची।अभी भी समय है कश्मीर मसले पर निकम्मेपन को त्यागकर मोदीजी स्वयं पहल करके सभी विवाद में शामिल पक्षों को दिल्ली प्रधानमंत्री कार्यालय बुलाएं और कश्मीर में सामान्य हालात बनाने के उपायों पर खुलेमन से चर्चा करें और लोगों के देशसम्मत सुझावों को ईमानदारी से लागू करें।ध्यान रहे कश्मीर में अब छात्र मैदान में निकल पड़े हैं,इस समय हर जिले में आतंकवादी नहीं ,छात्र-युवा निकल पड़े हैं सड़कों पर,वे हर स्तर पर प्रतिवाद कर रहे हैं।

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां-


भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता । सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया। इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?

आम्बेडकर और हिन्दूधर्म


       हाल ही में आम्बेडकर के बहाने आरएसएस ने जो प्रचार किया उसमें आम्बेडकर के प्रति आस्था और विश्वास कम और वैचारिक अपहरण का भाव ज्यादा था।आरएसएस और आम्बेडकर के नजरिए में जमीन-आसमान का अंतर ही नहीं बल्कि शत्रुभाव है।दोंनों के लक्ष्य ,विचारधारा और हित अलग हैं। आम्बेडकर का व्यक्तित्व स्वाधीनता संग्राम और परिवर्तनकामी विचारों से बना था,जबकि संघ इस आंदोलन के बाहर था,उसे परिवर्तनकामी विचारों से नफरत है।वह अंग्रेजों की दलाली कर रहा था।
   आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष थे,संघ को धर्मनिरपेक्षता से नफरत है।आम्बेडकर हर स्तर पर समानता के हिमायती थे,संघ हर स्तर पर भेदभाव का पक्षधर है। आम्बेडकर दलितों की मुक्ति चाहते थे,संघ दलितों को दलित बनाए रखना चाहता है।आम्बेडकर को भगवान नहीं इंसान से प्रेम था,संघ को इंसान नहीं भगवान से प्रेम है।आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष भारत चाहते थे,संघ हिन्दू भारत चाहता है।इतने व्यापक भेद के बाद भी संघ के लोग आम्बेडकर को माला इसलिए पहनाते हैं जिससे आम्बेडकर प्रेम का ढोंग हना रहे।संघ में ढोंग और नाटक करने की विलक्षण क्षमता है।यह क्षमता इसे हिंदू धर्म से विरासत में मिली है।हिंदू माने नकली और अवसरवादी भाव में जीने वाला।


कश्मीर से आई आवाज छात्र एकता जिंदाबाद

इस साल का नारा होगा-गर्व से कहो हम छात्र हैं ।छात्रों के हकों पर जिस तरह हमले बढ़ रहे हैं,छात्र राजनीति के ऊपर अंकुश लगाने की साजिशें चल रही हैं उनसे छात्र अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं।यूजीसी से लेकर केन्द्र का मानव संसाधन मंत्रालय,राज्य सरकारों से लेकर शिक्षा माफिया तक सब ओर से छात्रों के हकों पर हमले हो रहे हैं।छात्रों के अपने हक हैं जिनकी लंबे समय से अनदेखी होती रही है।कश्मीर में आतंकी समस्या को हल करने में केन्द्र सरकार नाकाम रही है और उसके प्रतिवाद में विगत पांच दिनों से कश्मीर के छात्र हड़ताल पर हैं।कश्मीर में छात्रों का समूचा कैरियर और शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।दुख की बात यह है कश्मीरी छात्रों का भविष्य किसी को नजर नहीं आ रहा,उनकी समस्याएं किसी को दिखाई नहीं दे रहीं।
यही स्थिति जेएनयू की है ,जिन छात्रों ने जेएनयू से एमए किया और आगे एमफिल-पीएचडी करना चाहते थे, उनके भविष्य को रोकने के लिए जेएनयू वीसी ने वहां की तयशुदा दाखिला नीति को यूजीसी सर्कुलर की आड़ में खत्म कर दिया और एमफिल्-पीएचडी के दाखिले के लिए तय सीटों में इस तरह कटौती की कि एमफिल्-पीएचडी में तकरीबन सभी सीटें बलिदान हो गयीं।वहीं दूसरी ओर पंजाब वि वि ने ट्यूशन फीस में बेशुमार बढोतरी करके पढ़ना ही मुश्किल कर दिया है।वहां ट्यूशन फीस दस गुना बढा दी गयी है। यूपी में वि वि और कॉलेजों में छह महिनों के लिए पाबंदी लगा दी गयी है।मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी के बजट में कटौती की गयी है, केन्द्रीय वि वि से कहा गया है 30 फीसदी संसाधन वे स्वयं जुगाड़ करें।केन्द्र सरकार की नौकरियों की भर्ती मोदी सरकार आने के साथ ही बंद कर दी गयी है।ये सारे हालात बता रहे हैं कि विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर लगातार खराब होते जा रहे हैं।कश्मीर के छात्रों का विगत पांच दिनों से जिस तरह का आक्रोश सामने आया है वह कश्मीर के छात्र आंदोलन में हाल के वर्षों में नहीं देखा गया।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन की समस्याएं

         काव्य या साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने ज्यों ही जाते हैं बड़ी समस्या उठ खड़ी होती है। पहली अनुभूति यह पैदा होती है कि हिन्दी की कविता अन्य विदेशी भाषा की कविता से पीछे है। आलोचना का तुलनात्मक अध्ययन करने जाते हैं तो पाते हैं कि हिन्दी की आलोचना कितनी पीछे है। यही दशा अन्य विधाओं की है।

यानी तुलना करते ही बार-बार यह एहसास पैदा होता है कि हिन्दी का साहित्य अन्य भाषाओं के साहित्य से कितना पीछे है। ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी वालों को ही ऐसी अनुभूति होती है। अंग्रेजी के साहित्यकारों को भी ऐसी ही अनुभूति होती है कि फ्रेंच या जर्मन साहित्य से उनका साहित्य कितना पीछे है।

मैथ्यू अर्नाल्ड पहले लेखक हैं जिन्होंने पहलीबार एकपत्र में 1848 में ‘तुलनात्मक साहित्य’ पर सुसंगत ढ़ंग से विचार किया था। सन् 1886 में पहलीबार एच.एम.पॉसनेट ने ,जो अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, उन्होंने पहलीबार अपनी किताब का नाम इसी पदबंध से ऱखा था।

मैं निजीतौर पर महसूस करता हूँ कि ‘तुलनात्मक साहित्य’ की बजाय ‘ साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ कहना ज्यादा संगत होगा। ‘तुलनात्मक साहित्य’ मूलतः खोखला पदबंध है। इस प्रसंग में कॉरनेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लोन कूपर का उल्लेख करना समीचीन होगा। कूपर ने लिखा तुलनात्मक साहित्य खोखला शब्द है। इससे सही अर्थ की अभिव्यक्ति नहीं होती। मुझे अनुमति दो तो मैं ‘तुलनात्मक आलूओं’ और ‘तुलनात्मक भुसी’ कहना ज्यादा पसंद करूँगा।‘तुलनात्मक साहित्य’ पदबंध में ‘तुलनात्मक’ और ‘साहित्य’ दो पदबंध हैं। दिक्कत यह है कि साहित्य की परिभाषा में तेजी से परिवर्तन आया है जबकि ‘तुलनात्मक’ के उपकरण नहीं बदले हैं या उनमें कम बदलाव आया है। मसलन् साहित्य को अंग्रेजी में सीखना,साहित्य संस्कृति,साहित्यिक उत्पादन,लेखन का ढ़ांचा,लेखन आदि के नाम से विश्लेषित किया जा रहा है। इसी तरह सभी किस्म के ‘साहित्य उत्पादन’ को ‘साहित्य’ माना जाता है। 18वीं शताब्दी में साहित्य ‘राष्ट्रीय’ और ‘स्थानीय’ के साथ नत्थी होकर आया था। आज इस अर्थ की प्रासंगिकता कम हो गयी है। हमें इस संदर्भ को व्यापक फलक पर खोलकर विचार करना चाहिए।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘तुलनात्मक साहित्य’ पदबंध ‘सार्वभौम साहित्य’, ‘साहित्य’, ‘आम साहित्य’, ‘विश्व साहित्य’ से प्रतिस्पर्धा करते हुए आया है। वेन तिघेम के अनुसार तुलनात्मक साहित्य का लक्ष्य है विभिन्न साहित्यों का एक-दूसरे के संबंध के साथ अध्ययन करना। कुछ विचारक तुलनात्मक साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय साहत्य संबंधों के इतिहास के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं। इस क्रम में वे तथ्य,संपर्क और आध्यात्मिक संबंधों का अध्ययन करते हैं। इस क्रम में हमें यह भी ध्यान रखना होगा किकि लेखक की जिंदगी और आकांक्षाएं अनेक साहित्यों से जुड़ी होती हैं। एक मुश्किल यह है कि ‘तुलनात्मक साहित्य’ और ‘जनरल साहित्य’ में विभाजक रेखा खींचना मुश्किल है।

तुलनात्मक साहित्य के नजरिए से देखें तो संस्कृत,उर्दू और हिन्दी में कुछ चीजें साझा हैं। इन तीनों भाषाओं के साहित्य पर दरबारी संस्कृति और सभ्यता का गहरा असर है। इनमें संस्कृत और उर्दू पर दरबारी संस्कृति का ज्यादा असर है। हिन्दी पर कम असर है। हिन्दी में वीरगाथाकाल और रीतिकाल पर दरबारी संस्कृति का व्यापक असर देखा जा सकता है। इसके अलावा हिन्दी की मध्यकालीन कविता जन-जीवन से जुड़ी कविता है। इसमें राम-कृष्ण के आख्यान की आंधी चली है। राम-कृष्ण के बहाने दरबारी संस्कृति का विकल्प निर्मित किया गया। राजा के सामने सिर झुकाने से बेहतर भगवान के सामने सिर झुकाने का भाव है जो कि प्रतिवादी भाव है।

इसके विपरीत संस्कृत काव्य परंपरा में राजा को अपदस्थ नहीं किया जा सका। संस्कृत काव्य का बड़ा हिस्सा राजा केन्द्रित आख्यानों से भरा है। इसमें जनता के भावों और सुख-दुख के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें पशु हैं,पक्षी हैं,उपदेश हैं.काव्यमानक हैं और सबसे बड़ी बात यह कि इसमें सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिम्बन नहीं है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रेखांकित किया है संस्कृत कविता जीवन से कटी हुई है।जबकि हिन्दी कविता सामाजिक जीवन से जुड़ी है। संस्कृत कविता जन्म से नियमों से बंधी रही है। काव्य नियमों का यथोचित निर्वाह करना कवि का लक्ष्य रहा है। इसके विपरीत हिन्दी के जनकवियों ने कभी भी काव्य नियमों का पालन नहीं किया। काव्य निर्माण के उपकरणों को उन्होंने जन प्रचलित काव्य रूपों से ग्रहण किया।काव्य नियमों के प्रति हिन्दी के जनकवियों का उपेक्षाभाव वह प्रस्थान बिंदु है जहां से हमें प्रतिवादी काव्य के आरंभ को देखना चाहिए। नियमों की उपेक्षा से पैदा हुआ प्रतिवादी काव्यरूप अपने साथ राजतंत्र का विकल्प भी लेकर आया।रामाश्रयी-कृष्णाश्रयी, सगुण- निर्गुण काव्य परंपरा से उसने अंतर्वस्तु ली।इन कवियों ने क्या लिखा और किस नजरिए से लिखा इसका उनकी मंशा से गहरा संबंध है।

मूल सवाल है मध्यकालीन हिन्दी कवियों की मंशा का।कवि की मंशा का कविता के उपकरणों और काव्य क्षेत्र चयन के साथ गहरा संबंध है। मध्यकालीन जनकवियों ने राम-कृष्ण,सगुण-निर्गुण आदि व्यापक अभिव्यक्ति का क्षेत्र चुना।उसमें धारावाहिकता बनाए रखी।यह मूलतः उनके दरबारी संस्कृति के प्रति विरोधभाव की अभिव्यक्ति है। इस प्रतिवाद के केन्द्र में काव्य के रूप और अंतर्वस्तु दोनों हैं।

कवि की मंशा लक्ष्यीभूत श्रोता की प्रकृति के साथ नाभिनालबद्ध होती है। संस्कृत के कवि का लक्ष्यीभूत श्रोता और हिन्दी के जनकवियों का लक्ष्यीभूत श्रोता भिन्न है। यह भिन्न ही नहीं बल्कि इनके हितों में गहरा अंतर्विरोध है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो संस्कृत-हिन्दी कवियों के काव्यजगत में गहरी विचारधारात्मक टकराहट नजर आएगी। संस्कृत -हिन्दी के कवियों के सामाजिक सरोकारों में गहरा अंतर नजर आएगा। यही वजह है कि हिन्दी के मध्यकालीन जनकवि संस्कृत काव्य परंपरा से अपने को पूरी तरह अलग करते हैं।

संस्कृत कवि दरबार के लिए लिखता है। हिन्दी का जनकवि भक्त के लिए लिखता है, सबके लिए लिखता है। संस्कृत कवि अपनी निजता को सार्वजनिक नहीं करता इसके विपरीत हिन्दी कवि अपनी निजता को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करता है। संस्कृत कवि अपने निजी जीवन के दुखों को छिपाता है,हिन्दी कवि उन्हें सार्वजनिक करता है। व्यक्तिगत को सामाजिक बनाता है और व्यक्तिगत और सार्वजनिक के सामंतीभेद को नष्ट करते हुए व्यक्तिगत को सार्वजनिक बनाता है। यहां से वह सचेत रूप से आधुनिकभावबोध के लक्षणों की नींव ड़ालता है।

उल्लेखनीय है मध्यकालीन कवियों ने अपने सारे उपकरण व्यापारिक पूंजीवाद से लिए हैं। ये कवि नई उदीयमान सामाजिक शक्तियों कारीगर-दस्तकार और उदीयमान व्यापारीवर्ग के भावबोध से संसार को देखते हैं। उपेक्षित शूद्रों और स्त्रियों को समानता और अभिव्यक्ति का मंच देते हैं। उनके यहां सब कुछ पर्सनल है,व्यक्तिगत है। भक्ति का रूप भी व्यक्तिगत है। व्यक्तिगत सत्ता का ऐसा महाराग इसके पहले कभी नहीं सुना गया। व्यक्तिगत भावों की अभिव्यक्ति के बहाने राजतंत्र की समूची सत्ता और उसके सांस्कृतिकबोध और मूल्य संरचना को सर्जनात्मक चुनौती दी गयी।

तुलनात्मक साहित्य के क्षेत्र में अध्ययन की कई पद्धतियां प्रचलन में हैं। फ्रांसीसी तुलनाशास्त्री ‘प्रभाव’के अध्ययन पर जोर देते हैं। रेने वैलेक ने ‘कारण-प्रभाव’ को महत्ता दी है। हंगरी के तुलनाशास्त्री ‘स्रोत’ और ‘मौलिकता’ को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने राष्ट्रीय चरित्रों की पहचान स्थापित की।उल्लेखनीय है कि ‘प्रभाव’ का ‘ग्रहण’ के साथ संबंध है। फलतः ग्रहणकर्ता मूल्यांकन के केन्द्र में रहेगा। वेन तेघम और अन्य विचारकों ने ‘ग्रहण’ के सिद्धांत के अनुरूप ही अपने तुलनात्मक नजरिए का विकास किया।

साहित्य संप्रेषण और ग्रहण के सवालों पर सामयिक तुलनाशास्त्री विभिन्न दृष्टियों से विचार करते रहे हैं। हंगरी के तुलनाशास्त्रियों ने ‘स्रोत’ और ‘मौलिकता’ पर जब जोर दिया था तो उस समय हंगरी में 19वीं शताब्दी का समय था और संस्थानों के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी।तुलनात्मक साहित्य के मूल्यांकन और सिद्धान्त की किताबों को गौर से देखें तो पाएंगे कि कुछ महत्वपूर्ण पदबंधों का प्रयोग मिलता है। जैसे, फार्चून,डिफ्यूजन,रेडिएशन आदि इन पदबंधों का पाठक पर पड़ने वाले प्रभाव के संदर्भ में धडल्ले से प्रयोग चल रहा है। जबकि ग्रहणकर्त्ता के संदर्भ में प्रतिक्रिया, क्रिटिक,ओपिनियन,रीडिंग,ओरिएण्टेशन आदि का खूब प्रयोग हो रहा है। पुनर्रूत्पादन के संदर्भ में फेस,रिफ्लेक्शन, मिरर, इमेज, रिजोनेंस,इको,म्यूटेशन आदि का प्रयोग मिलता है।

फ्रांस में ग्रहण सिद्धांत का विरोध करने वालों का भी एक गुट है जो विषयवस्तु केन्द्रित अध्ययन पर जोर देता है। इस क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक और शैलीवैज्ञानिक आलोचना दृष्टियों का जमकर प्रयोग हुआ है। इसके दायरे में मिखाइल बाख्तिन के ‘इंटरटेक्चुअलिटी’ से लेकर वाक्य-विन्यास, रूपकों,वाक्य की बहुअर्थी संरचना और रूपवाद आदि सब कुछ शामिल हैं।फ्रांसीसी तुलनाशास्त्रियों ने इमेज और इमेनोलॉजी में अंतर किया है और इमेज के अध्ययन पर जोर दिया है। इन विचारकों ने विचारों के इतिहास,मनोदशा, संवेदनशीलता और मूल्यों का भी अध्ययन किया है। ये लोग वैविध्य और उदारता के आधार पर मूल्यांकन करते हैं।फ्रांसीसी तुलनाशास्त्रियों ने रूपवादी दृष्टिकोण का विरोध करते हुए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। उनके द्वारा किए गए अध्ययनों को चार भागों में बांट सकते हैं। 1.काल्पनिकता का अध्ययन, 2. किसी महान् विषयवस्तु का अध्ययन, 3. प्रतीकों का अध्ययन, 4. विषयवस्तु का अध्ययन।

फ्रांसीसी तुलनाशास्त्रियों के यहां सामान्य साहित्य और तुलनात्मक साहित्य का अंतर साफ दिखाई देता है। इन लोगों ने रिप्सेशन थ्योरी को सामान्य साहित्य के क्षेत्र के बाहर रखा है। इसके अलावा पद्धति की समस्याओं को भी उठाया है। तुलनात्मक साहित्य की जटिलता और समृद्धि को रेखांकित किया है। उनके मूल्यांकन के केन्द्र में पाठ है। किंतु यह काम उन्होंने रूपवादी और संरचनावादियों से भिन्न रूप में किया है। वे हमेशा इमेजरी और ओपिनियन पर केन्द्रित होकर काम करते रहे हैं। विधाओं के इतिहास का पुनर्लेखन,काव्य की व्याख्या के लिए इंटरटेक्चुअलिटी या अन्तर्पाठीयता की धारणा , इतिहास और अंतर्वस्तु का प्रयोग करते रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने पाठ का विकेन्द्रीकरण किया है।

उल्लेखनीय है फ्रांस में ‘लिटरेचर’ पदबध का अर्थ ‘साहित्यिक अध्ययन’ है। वाल्तेयर ने अपने अधूरे लेख ‘लिटरेचर’ में, जो उन्होंने दर्शनकोश के लिए लिखा था, उसमें उन्होंने साहित्य को ‘अभिरूचि का ज्ञान’ कहा था। 19वीं सदी में फ्रांस में ‘तुलनात्मक साहित्य’ पदबंध का प्रयोग मिलता है। खासकर ए.एफ.विल्हमैन की पत्रिकाओं के इतिहास संबंधी पुस्तक में इस पदबंध का सुसंगत प्रयोग मिलता है। यह पुस्तक 1828 में छपी थी। इस पुस्तक में तुलनात्मक साहित्य की पद्धति का इस्तेमाल करते हुए आधुनिककाल के अनेक साहित्यरूपों का विश्लेषण किया गया है।

सामान्य साहित्य का आंदोलनों और साहित्यिक फैशनों के साथ संबंध है। जबकि तुलनात्मक साहित्य दो भाषाओं के साहित्य के आपसी संबंध से बंधा है। मसलन् संस्कृत की कविता और हिन्दी की कविता के किसी कालखण्ड को लेकर या दो लेखकों का अध्ययन किया जा सकता है। तुलनात्मक स्रोतों और प्रभावों का अध्ययन किया जा सकता है. तुलनात्मक कारणों और परिणामों का अध्ययन किया जा सकता है।

तुलनात्मक अध्ययन के दौरान किसी कृति को पूरी तरह अन्य भाषा के प्रभावों में घटाया नहीं जा सकता। या अन्य भाषा के प्रभाव को आलोकित करने वाले प्रधान बिंदु के रूप में नहीं देखा जा सकता।तुलनात्मक सहित्य और सामान्य साहित्य के बीच में बनाबटी जंगल खड़े करने से बचना चाहिए। साहित्यिक वैदुष्य और साहित्येतिहास का एक ही लक्ष्य है साहित्य का मूल्यांकन करना। हमें तुलनात्मक साहित्य और सामान्य साहित्य के वर्गीकरण से बचना चाहिए। यदि इस वर्गीकरण को लागू करते हैं तो हम तुलनात्मक साहित्य को केवल दूसरी श्रेणी के लेखकों ,अनुवादों, यात्रा-पुस्तकों,मध्यस्थ के संबंधों तक सीमित कर देंगे। तुलनात्मक साहित्य को एक छोटे अनुशासन में सीमित कर देंगे।

वेन तेघम के अनुसार तुलनात्मक साहित्य को राष्ट्रीय साहित्यों से अलगाने की जरूरत है। तुलनात्मक साहित्य का संबंध उन मिथकों और गाथाओं से है जो कवियों के चारों ओर हैं और इनका गौण और लघु लेखकों से संबध है। वेन तेघम और उनके अनुयायी साहित्यिक अध्ययन के बारे में 19वीं सदी के प्रत्यक्षवादी तथ्यवाद की शब्दावली में सोचते थे। ये लोग स्रोतों और प्रभावों का अध्ययन करते थे। साहित्य की सरसरी व्याख्या करते थे। सरसरी व्याख्या के लिए मूलभाव,विषयवस्तु, चरित्र, स्थितियां, कथानक ,कालक्रम आदि का इस्तेमाल करते थे। इन्होंने अपने यहां समानान्तरों, समानताओं और अस्मिताओं के अम्बार को एकत्रित कर रखा है।तुलनात्मक साहित्य या सामान्य साहित्य पर विचार करते हुए ध्यान रहे कि कोई भी रचना,स्रोतों और प्रभावों का जोड़ नहीं होती।वह पूर्ण होती है। उसमें कच्ची सामग्री कहीं से भी ली जा सकती है। कच्ची सामग्री निर्जीव नहीं होती। वह नई संरचनाओं में आसानी से रूपान्तरित हो जाती है।

सरसरी व्याख्या कहीं नहीं ले जाती और साहित्य में कार्य-कारण संबंध स्थापित करने में सफल नहीं होती। यदि कृति और कृतिकार को तुलनात्मक मूल्यांकन करने के चक्कर में स्रोतों और प्रभावों में रिड्यूज कर दिया जाता है तो इससे कृति और कृतिकार की समग्र अर्थवत्ता को ठेस लगती है। जो कृतियां पूर्ण होती हैं उनके अलगाव के कारण कृति में नहीं होते।तुलनात्मक साहित्य के उदय का प्रधान कारण था राष्ट्रवाद का निषेध करना। साहित्य की आधुनिक धारणा के उदय के साथ साहित्य में राष्ट्रवाद का जयघोष होने लगा। जातीय साहित्य की धारणा पर जोर देने के बहाने साहित्य में राष्ट्रवाद के एजेण्डे को प्रतिष्ठित किया गया।

हिन्दी में जातीय साहित्य की बहस के केन्द्र में मूलतः राष्ट्रवाद को ही प्रतिष्ठित करने का लक्ष्य है। साहित्य का आधुनिक धारणा के आलोक में मूल्यांकन करने के बजाय जातीय साहित्य की धारणा के आलोक में रामविलास शर्मा और अन्य के द्वारा जो गट्ठर भरकर लेखन हुआ है उसने राष्ट्रवाद को साहित्य में पुख्ता किया है। साहित्य में राष्ट्रवाद की प्रतिष्ठा का हिन्दी में खास अर्थ है प्रतिक्रियावादी राजनीतिक चेतना की हिन्दी विभागों में प्रतिष्ठा। इससे हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है।

राष्ट्रवाद एक तरह का अलगाव भी है। यह समूचे समाज और साहित्य से अलगाव है। अलगाव और राष्ट्रवाद को तुलनासाहित्य शास्त्रियों ने फ्रेंच,जर्मन,अंग्रेजी साहित्य में चुनौती दी। तुलनाशास्त्रियों ने साहित्य में प्रचलित विषयवस्तु और पद्धति विज्ञान के बनावटी विभाजन को अस्वीकार किया। स्रोतों और प्रभावों की यांत्रिक धारणा का निषेध किया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का विरोध किया। मेरे कहने का यह आशय नहीं है कि तुलनाशास्त्री देशभक्त नहीं थे। वे देशभक्त थे लेकिन साहित्य को राष्ट्रवाद के साथ नत्थी करना नहीं चाहते थे।

तुलनाशास्त्री विलक्षण किस्म के हिसाबी लोग हैं। तुलना करते हुए और अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन करते हुए तुलनात्मक साहित्य को सांस्कृतिक बही-खाते के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वे मूल्यांकन के जरिए बताते हैं कि कैसे उनके देश ने दूसरे देश पर प्रभाव ड़ाला या उनकी भाषा ने अन्य भाषा के साहित्य को प्रभावित किया,इस तरह वे अपने देश के सांस्कृतिक बही-खाते को बढ़ाने का काम करते हैं। इसके जरिए वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उनके देश ने दूसरे देशों पर यथासंभव प्रभाव ड़ाला। वे बारीकी से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उनके देश ने किसी विदेशी साहित्यकार को किसी अन्य देश की तुलना में अधिक आत्मसात किया और समझा है। हिन्दी में यह बीमारी सहज ही छायावादी कवियों के साथ रवीन्द्ननाथ टैगौर के साथ तुलना के संदर्भ में देख सकते हैं।

तुलनात्मक साहित्य और सामान्य साहित्य के बीच विभाजन करने की पद्धति से हमें बचना चाहिए। यह विभाजन बनावटी है। आज तुलनात्मक साहित्य एक स्वतंत्र अनुशासन है। इसका लक्ष्य है राष्ट्रीय सीमाओं के परे जाकर साहित्य का अध्ययन करना।सच्चा साहित्यिक आलोचक वह है साहित्य को मृत तथ्यों का जखीरा होने से बचाता है। मृत तथ्यों की स्थापना करना पाण्डित्य नहीं है। आलोचक वह है जो साहित्य के मूल्यों और गुणों का उद्घाटन करता है।साहित्यिक इतिहास और आलोचना में कोई अंतर नहीं है। साहित्यिक इतिहास की सरलतम समस्या को बताने के लिए मूल्यांकन आवश्यक है। किसी लेखक ने किसी अन्य लेखक को प्रभावित किया इसके लिए लेखक की विशिष्टताओं का ज्ञान आवश्यक है। इसलिए उनकी परंपराओं के संदर्भ का ज्ञान और निरंतर तोलने,तुलना करने,विश्लेषण करने और अलगाने की क्रिया आवश्यक है। यह सारा कार्य-व्यापार आलोचनात्मक है।

आलोचना के बिना इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इतिहास लिखते समय चयन, चरित्र- चित्रण और मूल्यांकन की जरूरत पड़ती है। इन तीनों तत्वों के बिना कोई भी इतिहास नहीं लिखा जा सकता। जो साहित्यिक इतिहासकार आलोचना की महत्ता को अस्वीकार करते हैं उन्हें अचेत आलोचक कहना समीचीन होगा।तुलनात्मक साहित्य ने इतिहास और आलोचना को अस्वीकार किया है। अपने को तथ्यात्मक संबंधों, स्रोतों,प्रभावों,मध्यस्थों और ख्यातियों तक सीमित रखा है। हमें इस तरह के नजरिए से बचना चाहिए।

साहित्य में विधाओं का एक-दूसरे से बैर नहीं है। हमें एक-दूसरे को अपदस्थ करने की कोशिशों से बचना चाहिए। बहुत सारे काम हैं जो इतिहास करता है, अनेक ऐसे काम हैं जो इतिहास से संभव नहीं हैं उन्हें आलोचना करती है, आलोचना और इतिहास से जो काम नहीं हो पाते उन्हें तुलनात्मक साहित्य के जरिए किया जा सकता है।अभिव्यक्ति और मूल्यांकन के अभावों की पूर्ति नयी विधाएं और संचार रूप करते हैं। एक रूप जब जन्म ले लेता है तो वह जाता नहीं है। अभी तक इतिहासकार और आलोचक की दिलचस्पी जिन बातों में थी,तुलनात्मक साहित्य उसके परे जाता है। इतिहासकार की दिलचस्पी इतिहास और साहित्य की सामाजिकता में थी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यह कार्य बेहतर ढ़ंग से किया। आलोचना की दिलचस्पी मूल्य की खोज में रही है। इन दोनों से भिन्न तुलनात्मक साहित्य की दिलचस्पी सामान्य सांस्कृतिक इतिहास में होती है। इसे वह समस्त मानवता के इतिहास के रूप में पेश करता है।







शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

फेसबुक और नार्सिसिज़्म -

  मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों का बतर्ज मैकलहान मशीनीकरण करते हैं,इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है। हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए-
All media work us over completely. They are so persuasive in their personal, political, economic, aesthetic, psychological, moral, ethical, and social consequences that they leave no part of us untouched, unaffected, unaltered. The medium is the massage. Any understanding of social and cultural change is impossible without a knowledge of the way media work as environments .
हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकारचेतना को महत्वहीन मानता है। उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं। नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है। वे लोग जो मानवाधिकारों न समझे वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे इसमें संदेह है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आएदिन फोटोबाजी करते रहते हैं। लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते। डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है। फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना,आत्मगान करना विलासिता है,हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं।असल में हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है । यह वह युग है जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार है।
फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदियां सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है। अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थजीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है। इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं,लाइक करने लगे हैं।अनजान लोगों की लाइकलाइन पगलाती रहती है।अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलतःलेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।
फेसबुक टाइमलाइन की खूबी है कि यूनीफॉर्म,कंटीनुअस और कनेक्टेड है।नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्टों के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं। नार्सिसिज़्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार। हिन्दी लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिसिज़्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है। इसमें एक पहलू वह भी जिसमें व्यक्ति अपने बारे खूब काल्पनिक बातें लिखता है। इस तरह की काल्पनिक और बे-सिपैर की बातें लिखना नार्सिसिज़्म का वैचारिक धर्म है।
मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग,विकृतिकरण,कैरीकेचर,पर्सनल हमला करना,किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमला करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिसिज़्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिसिज़्म वैचारिक एड्स है।
फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव,निजी राय,जन्मदिन,मृत्यु दिवस,शादी,ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते हैं।फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं।यहां वातावरण अदृश्य है।इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं।सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है। लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है। अनेक फेसबुक लेखक इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन,आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है।नार्सिज्म है।फेसबुक संवाद का माध्यम है,संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है। वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।
भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है ,वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं।मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय ,बोगस,मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है।

नामवर सिंह और रसशास्त्र का विखंडन

        रस पर इन दिनों तकरीबन बातें नहीं हो रही हैं।जबकि रसशास्त्र ने 18सौ साल तक रचना और आलोचना को प्रभावित किया,हमारे सौंदर्यबोध के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।सवाल यह है कि वह अचानक गायब कैसे हो गया ? क्या रस आज भी प्रासंगिक है ? क्या रसशास्त्र के जरिए नाटक, साहित्य और समाज का नया मूल्यांकन संभव है ? बकौल नामवर सिंह “रसःजस का तस या बस ?” हमें इस लक्ष्मणरेखा का मूल्यांकन करना चाहिए।अनेकबार अकादमिक आलस्य के कारण हम परंपरा में जाना बंद कर देते हैं और यही बड़ी वजह है कि रस पर हमने बातें बंद कर दी हैं।

सवाल उठता है रचना लिखने के बाद और रचना लिखने के दौरान लेखक अपनी रचना का आनंद लेता है या नहीं ? कुछ कह रहे हैं रचना लिखने के बाद रचना स्वायत्त हो जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि रचना कभी स्वायत्त नहीं होती,वह पाठक से हमेशा जुड़ी रहती है,पाठक के आत्मगतबोध से जुड़ी रहती है। सृजन के बाद लेखक से रचना अपने को स्वायत्त कर लेती है , लेखक अपनी रचना का लिखने के दौरान आस्वाद भी लेता है लेकिन असल आस्वाद तो पाठक लेता है। लेखक को तो लिखकर ही शांति मिलती है,सुख मिलता है। रचना कैसी है यह तो पाठक ही बेहतर ढ़ंग से बता सकता है। संस्कृत कवि कहते हैं कवि को तो सहृदय की अवस्था में ही आनंद की प्राप्ति होती है।लेखक लिखता जरुर है लेकिन लेखन के सार का आनंद तो सहृदय लेता है। इस नजरिए से देखें तो संस्कृत का कवि रचना को ‘एक तैयार माल’ मानकर चलता है।इससे रचना का गतिशील आनंद उपेक्षित होता है। मसलन्,इसमें भोक्ता के आनंद का तो महत्व है लेकिन कवि के आनंद का कोई महत्व नहीं है। जबकि लेखक लिखते समय आनंद लेता है और रचना के संपूर्ण होने के बाद भी आनंद लेता है।इस प्रक्रिया में रचना के गतिशील पक्ष की उपेक्षा होती है और रचना के बाह्य स्थिर या जड़ उपकरणों के साज-संवार पर लेखक ज्यादा जोर देने लगता है।

आज लेखक के सामने सामाजिक सरोकारों को व्यक्त करने की चुनौती है,लेकिन इस तरह की कोई चुनौती रसयुग में नहीं थी,रसयुग में तो रचनाकार का एकमात्र लक्ष्य था रसग्राही सहृदय जुगाड़ करना और लेखक को अजर-अमर बनाने के सूत्रों की खोज करना। इसलिए उसने रचना बाह्य उपकरणों के सजाने-संवारने पर ज्यादा ध्यान दिया। नए विषयों की खोज पर कम ध्यान दिया।फलतः रचना में बड़े पैमाने पर अभिव्यक्ति के नए उपकरणों का सृजन तो हुआ लेकिन नई विषयवस्तु का प्रवेश नहीं हो पाया।इसने रचना के उपकरणों का निर्वैक्तिक तंत्र निर्मित किया। यह ऐसा तंत्र है जिसका सतह पर समाज से कोई संबंध नजर नहीं आता लेकिन गहराई में जाकर देखें तो रचना के उपकरणों के निर्वैयक्तिक तंत्र का गहरा संबंध वस्तुतःराज दरबार,राजस्तुति,सुभाषित और समाज की अगतिशीलता के साथ है।इस प्रक्रिया में सर्जना के गतिशील पक्ष की ओर लेखक ने ध्यान देना ही जरुरी नहीं समझा। यही वह बिंदु है जहाँ से खड़े होकर कवि के निरंकुश भावबोध का जन्म होता है। कवि निरंकुश होता है यह धारणा जन्म लेती है।

रचना में बाह्य उपकरणों,रुढ़िगत प्रतिमानों और सरस विषयों का आग्रह रहेगा तो कवि के निरंकुश होने की संभावनाएं ज्यादा होंगी।खासकर जब लेखक भावविशेष पर ही केन्द्रित होकर बार-बार रचना लिखेगा तो उसके रुपवादी होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। कहने के लिए नौ रस थे लेकिन लिखा गया श्रृंगार रस पर ही,खोज-खोज कर उससे संबंधित विषयों पर नई शैली,नई भाषा,नए अलंकारों में रचनाएं लिखी गयीं इसके कारण आलोचना में रुपवादी रुझानों का आरंभ हुआ। साहित्य और समाज के बीचमें अलगाव की सृष्टि हुई।लेखक और प्रकृति में अलगाव का आरंभ हुआ। “समग्रालक्ष्मी” की अवधारणा से क्रमशःलेखक दूर होता चला गया। आरंभ में समग्र व्यक्ति के बोध पर जोर था लेकिन बाद में व्यक्ति के भावविशेष पर जोर दिया गया।शास्त्रज्ञान पर जोर दिया गया।पहले प्रकृति को जानने और चित्रित करने पर जोर था बाद में शास्त्र जानने पर जोर दिया गया।इसके कारण आलोचना में रुपवादी तत्वों की जमकर सृष्टि हुई।

पहले लेखक के लिए प्रकृति प्रमुख थी,बाद में लेखक को ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया,बाद में इन सबसे दूर निकलकर लेखक ने स्थिर विषयों और परब्रह्म के रुपों पर लिखना आरंभ करना दिया ।इस क्रम में मनुष्य उपेक्षित हो गया परंपराएं निर्जीव हो गयीं और रचना के बाह्य उपकरण प्रमुख हो गए। रचनाकार के अंदर आए इन बदलावों का रचनाकार के सामाजिक नजरिए से गहरा संबंध है। रचनाकार पहले प्रकृति से जुड़ने के कारण समाज से जुड़ा हुआ था,बाद में ज्योंही उसने दरबार की ओर रुख किया वह प्रकृति से कट गया और अभिव्यक्ति के लिए उसने रुढ़िबद्ध रुपों को अपना लिया,साहित्य में यहीं से स्टीरियोटाइप चीजों का प्रवेश होता है। उसके इस तरह के रुख का एक अन्य कारण था लेखक का मूल्यबोध और सामाजिक सरोकारों का अभाव।यह भी सच्चाई है कि संस्कृत में कोई विद्रोही कवि नहीं हुआ और न विद्रोही साहित्य ही लिखा गया। इन दोनों के अभाव के कारण के रुप में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अंधविश्वास,कर्मफल के सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा के असर को जिम्मेदार ठहराया।

सवाल यह है इन मूल्यों और विचारों का लोकभाषा के साहित्य और कवियों पर असर क्यों नहीं पड़ा ? जनभाषाओं में ऐसे लेखक है जिनकी रचनाओं में अंधविश्वास,कर्मफल के सिद्धांत आदि का न्यूनतम असर है। जबकि संस्कृत के लेखकों में व्यापक असर है। उन लेखकों पर इन मूल्यों का ज्यादा असर था जिन्होंने अपने लिए विषयवस्तु “रामायण” और “महाभारत” से चुनी। क्योंकि इन दोनों महाकाव्यों में अंधविश्वास आदि से जुड़ी बातें बड़ी संख्या में नजर आती हैं। इस प्रसंग में हमें देखना चाहिए कि लेखक रचना के लिए विषय कहां से चुनता है ? लोकभाषाओं के अनेक लेखकों ने साहित्यिक रुढ़ियों और रुढ़िगत प्रतिमानों का जमकर विरोध किया और अभिव्यक्त के लिए संस्कृत परंपरा से भिन्न विकल्पों की खोज की, “रामायण” और “महाभारत” जैसे महाकाव्यों से विषय न चुनकर जीवन से विषय चुने। यही वजह है उनके साहित्य में संस्कृत साहित्य की तुलना में सर्जनात्मकता का विकास बेहतर ढ़ंग से हुआ। उनके साहित्य को आम जनता में जनप्रियता मिली। इसके विपरीत संस्कृत साहित्य शिक्षित संस्कृत समाज तक ही सीमित रहा।इसका एक आशय यह भी है कि संस्कृत के लेखकों पर अंधविश्वास,पुनर्जन्म और कर्मफल के सिद्धांत का ज्यादा असरथा।यही वजह है कि वहां साहित्यिक रूढ़ियों का व्यापक रूप में विकास हुआ।

इसके अलावा संस्कृत के अधिकांश लेखक आस्तिक थे ,फलतःउनमें स्वतंत्र चिन्तन के प्रति कोई आग्रह या पहल नजर नहीं आती। साहित्य में स्वतंत्र चिन्तन,नए विषय पर लिखने की इच्छा का लेखक के स्वतंत्र भावबोध से गहरा संबंध है। लोकभाषाओं के लेखकों ने स्वतंत्र चिन्तन का परिचय देते हुए कविता के फॉर्म से जुड़े रुपों को चुनौती दी। यह भी कह सकते हैं कि लोकभाषा के कवियों में संस्कृतकाव्य के फॉर्म से बाहर निकलकर लिखने की जो छटपटाहट है वह असल में उनके अंदर सामाजिक और दार्शनिक बंधनों से बाहर निकलने की स्वतंत्र चिंतन की प्रक्रिया से जुड़ी है। इनमें अनेक लेखक ऐसे भी हैं जो ईश्वर के परंपरागत रुप को सीधे चुनौती देते हैं।

संस्कृत काव्य लेखकों को धर्मशास्त्र प्रभावित कर रहा था जबकि लोकभाषा के लेखकों में धर्मशास्त्र के प्रति बगावत के भाव नजर आते हैं।धार्मिक और सामाजिक रुढ़ियों के प्रति बगावत नजर आती है।वे ईश्वर और राजा की सत्ता बनाए रखते हैं,लेकिन काव्य जगत में परिवर्तन की लहर पैदा कर देते हैं। कहने का अर्थ यह है कि संस्कृत साहित्य के लेखक और लोकभाषा साहित्य के लेखक के नजरिए में बुनियादी अंतर है।इसका अर्थ यह भी है मध्यकाल में साहित्य की कई परंपराएं थीं।इन परंपराओं में गहरे वैचारिक अंतर्विरोध हैं,इन परंपराओं से जुड़े लेखकों के नजरिए,साहित्य प्रयोजन,सामाजिक आधार और सामाजिक सरोकार भिन्न हैं।

संस्कृत लेखक की बौद्धिक-सांस्कृतिक संरचना और लोकभाषा लेखक की बौद्धिक-सांस्कृतिक संरचना की धुरी है उनकी समाजदृष्टि।संस्कृतलेखक हमेशा राजा को इकाई मानकर लिखते रहे।जबकि जनभाषा के लेखकों ने भगवान को आधार बनाकर लिखा। इसलिए राजा बनाम भगवान का द्वंद्व वहां सहज ही देख सकते हैं। संस्कृत लेखकों ने राजा की आड़ में सामाजिक-दार्शनिक अंतर्विरोधों को छिपाने की कोशिश की वहीं जनभाषा के लेखको ने भगवान के बहाने सामाजिक-दार्शनिक अंतर्विरोधों और सामाजिक पीड़ाओं को चित्रित किया। संस्कृत के लेखक के नजरिया रस और काव्यनियमों से संचालित है।

रस और काव्यनियम वस्तुतः धर्मशास्त्रीय मूल्यों और मान्यताओं के आवरण का काम करते हैं। रस के नाम पर वह वस्तुतःमध्यकालीन रूढ़ियों का पल्लवन हुआ।खासकर 5वीं शताब्दी के बाद से यह प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल रुप में सामने आती है। इसके कारण संस्कृत लेखकों का साहित्यबोध और साहित्यशिल्प दोनों प्रभावित हुए।साहित्य को शाश्वत मानने की धारणा बलवती हुई।अधिकांश कवियों ने कविता के शिल्प पर इस कदर जोर दिया कि लेखक के विचारों में स्वतंत्र पहलकदमी एकदम खत्म हो गयी, अब लेखक गढ़िया होकर रह गया। यह गढ़िया लेखक भावहीन शिल्प-साधना में निरंतर बढ़ता चला गया।फलतः अभिव्यक्ति के वास्तविक रुपों और विषयों के ऊपर से उसकी पकड़ एकसिरे से खत्म हो गयी।यह ऐसा लेखक है जिस पर जीवन की यथार्थ घटनाओं का कोई असर नजर नहीं आता। वह जीवन की सच्चाई को न तो देखता है और न उससे प्रभावित ही होता है।

संस्कृत के लेखकों ने जिन विषयों पर लिखा है उससे कुछ समय तक पाठक का मनोरंजन तो होता है लेकिन इस तरह के साहित्य का समाज पर कोई असर नहीं पड़ता।इस तरह के साहित्य को ही वे लोग “शाश्वत साहित्य”, “शाश्वत चिंतन” और “शाश्वत मूल्य” कहते हैं। इन लेखकों ने बड़े पैमाने साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं के सिद्धांत,नियम और संरचना की विधियों को खोजने का प्रयत्न किया। आंचलिक,व्यक्तिपरक,देशज सांकृस्तिक रुपों का बहिष्कार किया।रचनाओं में “प्रतिनिधि” और “सार्वभौम” की बड़े पैमाने पर सृष्टि की।सामान्य चरित्रों को न्यूनतम स्थान दिया।मसलन्, राजा जिस भाषा में बोलता है वह उसी में बोलेगा,आमजन जिस भाषा में बोलते हैं,वे उसी भाषा में बोलेगा ।राजा को राजा की तरह और रंक को जनभाषा में बोलना चाहिए।यह भी धारणा रही है कि “प्रतिनिधि” और “सार्वभौम” चरित्रों के रुपायन से ही महान साहित्य की सृष्टि होती है।इसी समझ ने शास्त्रीय रचनाओं के अनुकरण करने पर जोर दिया।फलतः सामाजिक यथार्थ से संस्कृत साहित्य का संपर्क संबंध कट गया। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें रस सिद्धांत का जन्म और विकास हुआ।

नामवर सिंह ने ‘रसःजस का तस या बस?’ इस शीर्षक से एक सम्पादकीय ‘आलोचना’ (जनवरी-मार्च1990)में लिखा था,यह उनकी किताब ‘कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता’(2010) में शामिल है। उल्लेखनीय है “कविता के नये प्रतिमान” में नामवरजी ने 1968 में पहलीबार रस पर विचार किया था उसके बाद 1990 में उनकी नजर रस पर पड़ी। देखना यह है कि उनके नजरिए में रस के के प्रसंग में क्या बदलाव आया ? “कविता के नये प्रतिमान” में नामवरजी ने प्रतिमान के रूप में रस की पुनर्व्याख्या या पुनरूद्धार को अप्रासंगिक माना है,महत्वपूर्ण माना है आस्वाद प्रक्रिया और कविता की अर्थमीमांसा को।क्या आस्वाद के सवाल बदले हैं ?क्या आस्वाद की प्रक्रिया में बदलाव आया है ?क्या कविता वही है जो 1968 में थी? कविता के चरित्र में किस तरह का परिवर्तन आया है ? क्या 1968 में नामवरजी के जो विचार थे वे 1990 में बने रहे या बदल गए ? नामवरजी ने अभिनवगुप्त की रस संबंधित समझ का व्यापक उपयोग किया है और भरत वर्णित रसों से भिन्न शांतरस की ओर ध्यान खींचा है, लेकिन लिखा नहीं।

‘रसःजस का तस या बस?’ शीर्षक लेख में नामवरजी ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उनमें पहली बात यह कि ‘चिन्तन के क्षेत्र में पूर्वजों से उऋण होने का एक तरीका यह है कि उनकी मान्यताओं की पुनःप्रस्तुति स्वयं उनकी प्रस्तुति से बेहतर की जाए।’ इस क्रम में नामवरजी ने प्रो.अशोक रामचन्द्र केलकर के ‘प्राचीन भारतीय साहित्य मीमांसा’में प्रस्तुत रस संबंधी विचारों को पेश किया है।नामवरजी के लेख के शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न अर्थपूर्ण है। यह अनेक रास्ते खोलता है।इस लेख में केलकरजी के विचारों को जस का तस रख दिया गया है ,वहीं दूसरी ओर संभावनाओं के लिए रास्ता खुला छोड़ा गया है। नामवरजी ने लिखा है ‘बेडेकर ने रस-विमर्श की उस प्रचलित प्रवृत्ति पर प्रहार किया था,जिसमें रस की चर्चा एक ‘मनोवैज्ञानिक सिद्धांत’ के रूप में की जा रही थी।इसके विपरीत बेडेकर ने इस प्रस्थान-बिन्दु से अपनी चिन्तन-यात्रा का प्रारम्भ किया कि रस-व्यवस्था ‘कलास्वरूप शास्त्रों’का भारतीय प्रमेय है और विशिष्ट सांस्कृतिक सन्दर्भ में ही उसके सच्चे स्वरूप की पहचान सम्भव है।’(कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता,2010,पृ.11)

नामवरजी ने केलकर के विचारों को अधूरे ढ़ंग से पेश किया है उसके कारण रस पर सुसंगत नजरिया बनाने में मदद कम मिलती है।लेकिन नामवरजी की स्वयं की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं।नामवरजी ने लिखा ‘कहने की आवश्यकता नहीं कि अन्य कल्पकथाओं की तरह नाट्योत्पत्ति की इस देवासुर-कथा में भी ‘नाट्यवेद’निहित है।नाट्यवेद अर्थात् नाट्य सिद्धांत।इसलिए समस्या एक ‘मिथक’ के ऊपर दूसरा ‘मिथक’ गढ़ने की नहीं,बल्कि उसी ‘मिथक’ को उधेड़ने की है।कल्पसृष्टि एक और पुनर्निर्माण नहीं चाहती,मीमांसा माँगती है।आज की भाषा में कहें तो ‘रिकंस्ट्रक्शन’ नहीं ,’डिकंस्ट्रक्शन’।असंगतियों के बीच सुसंगति लगाने से कहीं ज्यादा जरूरी है सुसंगत प्रतीत होनेवाली रचना में छिपी हुई असंगतियों का उद्घाटन।’(वही,पृ.15)

सवाल यह है नाटक हो या यज्ञ हो,देवासुर संग्राम पर कल्पसृष्टि हो या रसों के सृजन की समस्या हो इसका लक्ष्य क्या है ?यदि हम ‘डिकंस्ट्रक्शन’ करें तो इसके केन्द्र को खोला जा सकता है। रस शास्त्र की समूची चर्चा के केन्द्र में दो बातें सबसे महत्व की हैं। पहली है चीजों को देखने और प्रस्तुत करने की पद्धति और दूसरा है लक्ष्य। दि.के.बेडेकर ने ‘प्राचीन साहित्य मीमांसा’ नामक अपनी लेखमाला में इन दो बातों को रेखांकित किया है इनमें से एक का नामवरजी ने जिक्र किया है,यानी पद्धति का जिक्र किया है लेकिन लक्ष्य को वे छिपा गए।नामवरजी ने लिखा है ‘बहरहाल यह’यज्ञ-नाट्य’देवासुर-कथा ही है और बेडेकर ने विस्तृत विश्लेषण के द्वारा दिखला दिया कि भरत-निर्दिष्ट आठ रसों का अधिष्ठान देवासुर-द्वन्द्व में स्थित है।उन्हीं के शब्दों में, “मनोविज्ञान को एकतरफ रखकर स्थायित्व का अर्थ आठ रसों के स्थिर सम्बन्ध ही लगाना चाहिए।इसी प्रकार इन आठ रसों के पीछे जाकर श्रृंगारादि रस-चतुष्टय पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।श्रृंगारादि चतुष्ट्य का पुनःश्रृंगार-वीर और रौद्र-वीभत्स ऐसा द्वन्द्व ध्यान में रखना चाहिए।यह द्वन्द्व देव और असुर द्वन्द्व का नाट्यमय रसात्मक स्वरूप है।यह निश्चित रूप से जान लेने पर भरत प्रणीत रस-व्यवस्था का सब अर्थ अच्छी तरह से लग जाता है।” ’(16-17)

रस-निष्पत्ति’ के प्रसंग में नामवरजी ने लिखा ‘इसी प्रकार ‘रस-निष्पत्ति’ की प्रक्रिया यज्ञ की प्रक्रिया के अनुसार समझाई गई है।‘रस-निष्पत्ति’ के स्वरूप की चर्चा में अन्य विद्वान जहाँ’षाडव रस’ तथा ‘पानक रस’ में उलझे रहे,बेडेकर की निर्भ्रान्त दृष्टि ‘नाट्यशास्त्र’ की इस पंक्ति पर गई-

‘शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना।’

लकड़ी में सुप्त अग्नि मन्थन-प्रयोग से व्यक्त होती है और उस लकड़ी को ही व्याप्त कर लेती है।यज्ञ की अग्नि पुराकाल में(और परम्परा-निर्वाह के लिए आज भी)इसी विधि से पैदा की जाती थी।लकड़ी में सुप्त अग्नि को लकड़ी की ओखली में दूसरी लकड़ी की मथानी घुमाने से व्यक्त किया जा सकता है।यज्ञ-क्रिया में ऐसी ही सिद्ध अग्नि ही काम में लाते थे।एक प्रकार से देखें तो देवासुर-कथा का द्वंन्द्व यहाँ भी सक्रिय है।रस-व्यवस्था के मूल में द्वन्द्व है।बेडेकर की क्रांतिकारी खोज यही थी।’(पृ.17) कहने का आशय यह कि नाटक में ‘द्वन्द्व’ के नजरिए के जनक भरत हैं।‘दवन्द्व’ के बिना सृजन नहीं होता। यह हमारी परंपरा का सबसे मूल्यवान नजरिया है और पद्धति भी है।यह आज भी सृजन के लिए प्रासंगिक है। रही बात काठ के घर्षण से अग्नि पैदा करने की तो अग्नि तो लकड़ी में होती है।घर्षण उससे जन्म देता है।इसे तीव्र भावोर्मि कह सकते हैं,रचना के निर्माण में भावोर्मि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।जब कोई विषय लेखक को उद्वेलित करता है तब ही रचना की पहली चिंगारी फूटती है।वहीं से लेखक के भावानुभवों की सृष्टि होती है।यही चीज बाद में रचना के रूप में प्रकाश पाती है।

नामवरजी ने बेडेकर की धारणाओं का विस्तार से विवेचन करने के बाद लिखा ‘सारी युक्ति का सार यह है कि नाट्य प्रयोग न देवों की विजय प्रदर्शित करता है, न असुरों की पराजय;वह तो त्रैलोक्य का भावानुकीर्तन है।अभिनव ने इस भावानुकीर्तन का एक लम्बा-चौड़ा दर्शन पेश कर दिया है,जिसे भारतीय साहित्य मीमांसा का अमरसिद्धांत समझा जाता है।’

आगे लिखा ,‘किन्तु क्या यह काव्य- सिद्धांत ‘जर्जर’का ही दूसरा रूप नहीं है ?जो कार्य बड़े डंडे से न सधे,उसे साधने के लिए सिद्धांत का सहारा लिया जाए तो उस सिद्धांत को क्या नाम दिया जाएगा ?इस सन्दर्भ में अभिनवगुप्त के दो वाक्य उल्लेखनीय हैं।नाट्यशास्त्र के 1/70 पर अभिनवगुप्त अपनी ओर से जोड़ते हैं- एवं राज्ञा सिद्धिविघातका दण्डया इति।अर्थात् इस प्रकार राजा को नाट्य सिद्धि में विघ्न डालनेवालों को दंड देना चाहिए।नाट्यशास्त्र के 1/99श्लोक में ब्रह्मा द्वारा शान्तिपूर्वक समझाने के प्रसंग पर- नाशक्तस्य सामाङ्गीकरोति दुर्जन इति पूर्वरक्षाकरणम्।अर्थात् असक्त के साम को दुर्जन नहीं मानता इसलिए (साम से पहले)रक्षा-विधान दृढ़ कर लिया जाए।तात्पर्य यह कि ब्रह्मा के मुख से कहलाया गया ‘नाट्य दर्शन’ ‘शक्त का साम’अर्थात् ताकतवर का शान्ति-पाठ है।इस प्रकार क्या रस का दर्शन शक्ति का प्रदर्शन नहीं लगता ?आजकल जिसे ‘आइडियोलॉजी’ कहते हैं वह और क्या होती है ?क्या रस-सिद्धान्त ने शुरू से ही एक ‘आइडियोलॉजी’ अथवा ‘दिट्ठ’ की भूमिका नहीं निभाई है ।’

नामवरजी ने बेडेकर का विवेचन करने के साथ ही अंतमें यह भी लिखा , ‘आशंका सिर्फ यही है कि नया आकलन भी कहीं इसी लम्बी श्रृंखला की एक कड़ी न साबित हो ! बेडेकर ने शायद इसीलिए सभी सम्भाव्य संस्करणों को सन्दिग्ध समझा और रस को संग्रहालय में सुरक्षित रखने का प्रस्ताव रखा।इसीलिए आज भी यह प्रश्न है कि रसःजस का तस अथवा बस?’ दिलचस्प बात यह है नामवरजी रस की विचारधारा के पहलू को खोलते ही नहीं हैं और सवाल उठाकर छोड़ देते हैं। रस की विचारधारा का पहलू तब खुलता है जह हम शान्तरस के अंदर प्रवेश करते हैं।बेडेकर ने शान्तरस का जिक्र तक नहीं किया और नामवरजी जिक्र तो करते हैं लेकिन विवेचन से कन्नी काटते हैं। अभिनवगुप्त ने शान्तरस का श्रृंगार के साथ अन्तर्विरोध दिखाकर रस की विचारधारा में निहित जनविरोधी भावों को उद्घाटित किया है।सवाल यह है शान्त रस क्या है और उसे कैसे देखें ?

शांतरस पर जोर देकर अभिनवगुप्त ने असल में रस के समूचे ढ़ांचे और विचारधारा को निशाना बनाया है। अभिनवगुप्त जिस समय लिख रहे थे उस समय समाज में कला,साहित्य,संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रों में ह्रासशील प्रवृत्तियां चरम पर थीं।रस की सृष्टि और संरचना ने ह्रासशील प्रवृत्तियों को जमकर बढ़ावा दिया,कलाएं सामाजिक उन्नति की बजाय समाज में अवरोध पैदा करने का काम कर रही थीं।रसों की संरचना और विचारधारा पर विचार करें तो पाएंगे कि रसों में गहरा अंतर्विरोध है।मसलन्,रति है तो वैराग्य भी है।रसों में एक-दूसरे के विरोधी भावों का होना यह दरशाता है कि रसों का चरित्र अंतर्विरोधपूर्ण और ह्राशशील है,यह चित्तवृत्तियों का शमन नहीं करता बल्कि उनको तनावयुक्त बनाता है।यह संभव नहीं है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए उत्साहित भी हो और शत्रु से डरे भी।लेकिन इस तरह के अंतर्विरोध रसों में हैं।रसों में अंतर्निहित अंतर्विरोधों की अभिनवगुप्त ने नाटयशास्त्र की अभिनवभारती टीका में विस्तार से चर्चा है।

भरत वर्णित 8रसों के इस समूचे ढ़ांचे से बाहर निकले बिना रस के प्रति नए नजरिए और नई भूमिका का विकास संभव नहीं है। यह आयरनी है कि अभिनवगुप्त की रस संबंधी आलोचना को संस्कृतकवियों और आलोचकों ने गंभीरता से ग्रहण नहीं किया। भरत के यहा रस के अंतर्विरोध से निकलने का उपाय है एक रस से निकलो और दूसरे की शरण लो।इसके लिए ‘ऐकाधिकरण्य’ की पद्धति के प्रयोग पर जोर दिया,ऐकाधिकरण्य का अर्थ है एक आश्रय से सम्बन्ध होना।अभिनवगुप्त ने लिखा है भय और उत्साह का एक आश्रय में सहभाव दूषित होता है।किन्तु उनके आश्रय बदल देने से उनका विरोध जाता रहता है।इसके लिए एकाश्रयत्व में निर्दोष और नैरंतर्य पर जोर दिया गया।इससे रसो में व्याप्त अंतर्विरोधों का समाधान नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है अभिनवगुप्त ने नागानन्द का उदाहरण दिया है और उसके संदर्भ में श्रृंगार और शांत रस के अंतर्विरोध का विश्लेषण करते हुए शांतरस की स्थापना की है।अभिनवगुप्त के मूल्यांकन यह वह बिंदु है जहां पर भोगवाद,पुंसवाद और रस के अंतस्संबंध को वे निशाना बनाते हैं।इस अंतस्संबंध को समझाने के लिए उन्होंने सांख्य दर्शन के दो तत्वों ‘चित्तवृत्ति का प्रसार’ और ‘लिङ्गशरीर’ की अवधारणा का इस्तेमाल किया है। वे विस्तार के साथ नागानन्द की कथा का विवेचन करते हैं और इन दोनों धारणाओं का खुलासा करते हैं।

साहित्य में श्रृंगार को रसराज कहा गया और उसका साहित्य में वर्चस्व था।अभिनवगुप्त ने इस वर्चस्व को चुनौती देने के लिए शांतरस की सृष्टि की।श्रृंगार और शांत के अंतर्विरोध पर जोर डाला।श्रृंगार रस का मूलाधार है तृष्णा ,जबकि शांतरस का मूलाधार है तृष्णाक्षय।तृष्णाक्षय में जो आनंद है वह किसी और में नहीं है। रसों की भूमिका रही है तृष्णा पैदा करने की और अभिनवगुप्त ने इसी को आधार बनाकर समूची सामंती व्यवस्था और श्रृंगार रस का विरोध किया। तृष्णाक्षय आज के युग के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण तत्व है।यह सामाजिक विकास का सकारात्मक तत्व है।भरत के 8रसों में तृष्णा जगाकर रसनिष्पति होती है जबकि अभिनवगुप्त के शांतरस में तृष्णाक्षय के जरिए रसनिष्पत्ति और आनंद की सृष्टि की है। श्रृंगारादि रसों के जरिए विषयाभिलाष पैदा किया जाता था उसका अभिनवगुप्त ने विरोध करते हुए विषयाभिलाष के निर्वेद पर जोर दिया है,उस निर्वेद में अभूतपूर्व आनंद होता है।निर्वेद ही शांतरस का स्थायीभाव है। जब उसका परितोष आस्वाद में हो जाता है तभी शान्तरस होता है।ठेस भाषा में इसे वैराग्य यानी नागरिकचेतना कहते हैं।

रसों के विकल्प के रूप में वैराग्य यानी नागरिकचेतना की वकालत वस्तुतःदरबारी सभ्यता-संस्कृति और उनके साथ जुड़े कलारूपों का निषेध है,यह संयासवाद नहीं है।यह लोकचेतना है। तृष्णा और लोकचेतना या नागरिकचेतना में अंतर्विरोध है। उल्लेखनीय है जनभाषा के लेखकों ने श्रृंगारादि रसों और काव्य के नियमों के आधार पर काव्यसृजन का भी विरोध किया था।काव्यसृजन के नियम और रस ये दोनों एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।अभिनवगुप्त ने रसों के मूलाधार पर प्रहार करते हुए जब तृष्णाक्षय की स्थापना की तो उन्होंने वस्तुतःलोक कामना से साहित्य को जोड़ने पर जोर दिया। रसों का आधार तृष्णा होने के कारण भरत वर्णित 8रसों पर आधारित समूचा साहित्य क्रमशःलोक से कटता चला गया । अभिनवगुप्त जब श्रृंगार का विरोध कर रहे थे तो वस्तुतःसाहित्य को नागरिकचेतना से जोड़ने पर जोर दे रहे थे। उन्होंने लिखा है-

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतःषोडशीं कलाम्।।

यानी लोक में कामना से जो सुख प्राप्त होता है और जो स्वर्गीय महान् सुख होता है,वे दोनों प्रकार के सुख तृष्णाक्षय से उत्पन्न होनेवाले सुख का सोलहवाँ भाग भी नहीं होते। इस प्रसंग में भरत के पक्षधरों का मानना है भरत ने शान्त को कभी अस्वीकार नहीं किया,बल्कि भरत के यहां तो शांन्तरस सभी रसों के मूल में रहता है।सभी रसों की शान्तावस्था ही शान्त रस कहलाती है।असल में मामला इतना सरल नहीं है। अभिनवगुप्त ने रेखांकित किया है कि रसों के पक्षधर और भरत के यहां रस के आने के पहले शांतरस रहता है उसके बाद अन्य रस पैदा होते हैं। यानी तृष्णाभाव के पहले शान्त भाव रहता है और रसों के जरिए उस भाव को नष्ट करके तृष्णाभाव पैदा होता है,इसके विपरीत अभिनवगुप्त के नजरिए से तृष्णाभाव को नष्ट करके शान्तरस पैदा होता है।यानी वीतराग या वैराग्य वह है जहां तृष्णा का विध्वंस हो जाय। सवाल यह है क्या आज के उपभोगतावादी समाज में हमें शांतरस चाहिए या नहीं ? अथवा रस चाहिए ? नामवरजी जब रस की हिमायत करते हैं तो वे शान्तरस में निहित इस समूचे दृष्टिकोण को भूल जाते हैं। “कविता के नए प्रतिमान’ में कहने के लिए वे नगेन्द्र की आलोचना करते हैं लेकिन वस्तुतः वे नगेन्द्र के साथ ही खड़े रहते हैं। नगेन्द्र के नजरिए में रस-सिद्धान्त शाश्वत और सार्वभौम सिद्धान्त है वहीं नामवरजी के लिए भरत की रस संबंधी धारणा में प्रसंगानुकूल प्रतिमान मिल जाते हैं।इस प्रसंग में वे रस के आंतरिक तत्वों की विवेचना करके नगेन्द्र के मत का खंडन करते हैं लेकिन वैचारिकतौर पर दोनों एक ही धरातल पर खड़े रहते हैं।यहां तक कि 1990 में भी उनके बुनियादी विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आता।

अभिनवगुप्त ने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान खींचा है वह है रस का चरम।सवाल है क्या रस का चित्रण करते हुए उसको चरम तक चित्रित करें ? भरत चरम तक चित्रण के पक्षधर हैं लेकिन अभिनवगुप्त ऐसा नहीं मानते.शान्तरस के पक्ष,विपक्ष,स्थायीभाव आदि का अभिनवभारती टीका में विस्तार के साथ विश्लेषण किया है। मसलन् रौद्र रस का चरम तो हत्या है लेकिन उसकी प्रस्तुति से बचा जाना चाहिए,प्रतीत हो कि हत्या हो गयी। इसलिए “प्रतीति” और “प्रतीयमान अर्थ” इनका बड़ा महत्व है।इसी प्रकार भरत ने वीररस के तीन उपभेदों का जिक्र किया है,ये हैं, दानवीर,धर्मवीर और युद्धवीर। इसी प्रसंग में अभिनव ने कहा है कि दयावीर को शान्तरस का प्रभेद तब मान सकते हैं जब उसमें सब प्रकार के अहंकार का अभाव हो। यदि उत्साह के साथ अहंकार आ जाता है तो दयावीर को शान्तरस का प्रभेद नहीं मान सकते।इसी तरह कुछ लोग शान्तरस को वीभत्सरस में समाहित करके देखते हैं लेकिन अभिनवगुप्त ने इसका भी खंडन किया है।क्योंकि शान्तरस का मूलाधार या स्थायीभाव घृणा नहीं है। वह तो व्यभिचारी भाव है। अंत में सबसे बड़ी बात जो शान्तरस से जुड़ी है वह है उसका लक्ष्य।भरत वर्णित 8रसों का लक्ष्य है आनंद और रस की सृष्टि करना,लेकिन शांतरस का लक्ष्य है मोक्ष प्रदान करना। 8रसों के लिए पुरूषार्थ की जरूरत है लेकिन शान्तरस के लिए लोकनिष्ठा और नागरिकचेतना होनी चाहिए।

रस के प्रसंग में बुनियादी सवाल यह है कि रस किसके लिए ?आनंद के लिए या दुख के लिए ?नाटक किसके लिए आनंद के लिए या दुख के लिए ? रस को मानें या न मानें लेकिन कलाओं के प्रसंग में यह सवाल तो हमेशा उठा है कि कलाओं का लक्ष्य क्या है ?रसों की जब सृष्टि हुई तब भी यह प्रश्न केन्द्र में था ,नामवरजी इस सवाल से कन्नी काटकर निकल जाते हैं।इस प्रसंग में आर.बी,पाटणकर की कृति ‘सौंदर्य मीमांसा’ में विस्तार के साथ विचार किया है। पाटणकर मराठी साहित्य के प्रमुख आलोचक हैं और उनकी कृति ‘सौंदर्य मीमांसा’ को साहित्य अकादमी ने 1975 में पुरस्कृत भी किया है।नामवरजी ने बेडेकर के बहाने रस की सृजन प्रक्रिया के सवालों पर विचार किया है लेकिन रस का संबंध तो आस्वाद से है और कला के क्षेत्र में सृजन प्रक्रिया से ज्यादा व्यापक फलक आस्वाद प्रक्रिया का है।आस्वाद प्रक्रिया के सवाल कला-साहित्य के बुनियादी सवाल हैं उनसे हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक भागते रहे हैं।रस हमारे ऐंद्रिय सुख से जुड़ा है।यही विमर्श का प्रमुख बिंदु है जिसके जरिए रचना के विमर्श को अमूर्तन में ले जाने से रोक सकते हैं।

नाटक या कला या साहित्य का लक्ष्य है ‘आनंद’,और रस का भी लक्ष्य है ‘आनंद’। ‘आनंद’ के बिना कला रूप अपना विकास नहीं करते।‘आनंद’ से हमें ‘सुख’ मिलता है यही वजह है कि ‘आनंद’ और ‘सुख’ को पर्यायवाची समझना चाहिए। मराठी साहित्य में भी अनेक बड़े विद्वानों ने ‘आनंद’ और ‘सुख को पर्यायवाची माना है। नाट्यशास्त्र में यह भी माना गया है कि रचना में वैयक्तिक दुख और सुख का अनुभव करने से रसनिष्पत्ति में बाधा पड़ती है।

नाट्यशास्त्र पर विचार विमर्श के दौरान अमूमन अभिनवगुप्त लिखित भाष्य का बार-बार जिक्र होता है। अभिनवगुप्त ने नाट्यशास्त्र के रचे जाने के सात-आठ सौ वर्ष के बाद ‘अभिनव-भारती’ नामक टीका लिखी.इसे सबसे प्रामाणिक टीका माना जाता है।अपनी टीका में अभिनवगुप्त ने अनेक बातें अपनी कही हैं उन बातों का भरत के नाट्यशास्त्र से कोई संबंध नहीं है। इस पहलू को टी.जी.माईणकर ने “दि थियरी ऑफ संधीज ऐंड संध्यंगाज”(1960) नामक कृति में विस्तार के साथ रेखांकित किया है।रा.भा.पाटणकर ने सवाल भी उठाया है कि क्या ‘सुख’ को सौंदर्यानुभव का आवश्यक घटक माना जा सकता है ? दूसरा प्रश्न यह कि ऐसा सुख लौकिक है या अलौकिक है ? क्या रचनाएं भावनाओं पर प्रभाव ड़ालती हैं ? अथवा कलास्वाद का भावना और भावनात्मकता से संबंध है ?क्या रचना पढ़ते समय भाव जागृति होती है ?भावना और भावनात्मकता को क्या भावनात्मक मनोदशाओं या मूड से अलग रखा जा सकता है ?मनोदशाएं कितनी अवधि तक टिकी रहती हैं ?क्या इस सबका भावनात्मक स्वभाव वैशिष्ट्य से संबंध जुड़ता है? पाटणकर के अनुसार ‘भावनात्मक स्वभाव वैशिष्ट्य प्रायःजीवन-भर हमारा साथ देते हैं।वे हमारे व्यक्तित्व का भाग बनते हैं।जब हम किसी व्यक्ति को ,निराशावादी और दूसरे को आशावादी कहते हैं,तब हमारे मन में उन मनुष्यों के स्वभाव वैशिष्ट्य ही होते हैं।लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि निराशावादी मनुष्य सारे समय के लिए म्लान पड़ा रहता है और आशावादी सदैव उछल-कूद करता रहता है।’(सौंदर्य- मीमांसा,पृ.238)

दिलचस्प बात यह है कि अभिनवगुप्त जब रस पर विचार कर रहे थे तो उनके नजरिए के केन्द्र में “सुख” या “आनन्द” नहीं था बल्कि “मोक्ष” था। यही वजह है कि लिखा ‘मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरूषार्थनिष्ठत्वात् सर्वरसेभ्यःप्रधानतमः।’ कहने का आशय यह कि शान्तरस का फल मोक्ष होता है जो कि सबसे बड़ा फल है।अतएव इस रस की निष्ठा पुरूषार्थ में भी सबसे अधिक होनी चाहिए।

रस पर विचार करते समय तीन तत्वों की खूब चर्चा होती है।1.स्थायीभाव,2.व्यभिचारी या संचारी भाव और 3.सात्त्विक भाव।कई आलोचकों ने इस विवेचन के लिए मनोविज्ञान का सहारा लिया है। इस समूचे प्रसंग में यही कहना समीचीन होगा कि स्थायी भावों का संबंध रंगमंच से है,दृश्य अभिनय में इनकी भूमिका है।वाच्य में इनकी भूमिका नही होती। रा.भा,पाटणकर ने लिखा है स्थिरभावों के लिए भावनात्मक भाषा की जरूरत होती है जिसे अभिनय में बेहतर ढ़ंग से व्यक्त किया जा सकता है।मसलन्,क्रोध का वर्णन करने से वह व्यक्त होगा ?उसका वर्णन किया जा सकता है।यह सही है।लेकिन जिस अर्थ में दाँत,ओंठ चबाना,मुट्ठियाँ भींचना,आँखें लाल होना आदि के जरिए क्रोध व्यक्त होता है उस अर्थ में किसी कृति के जरिए क्रोध व्यक्त नहीं होगा।भावनात्मक भाषा का स्थान वर्णनात्मक भाषा नहीं ले सकती। नाटक में भावों को वाच्य के स्तर पर नहीं दिखाया जाता बल्कि उसकी अभिव्यंजना करनी होती है। नाटककार भावों की अभिव्यंजना के लिए विभावादि का उपयोग करता है।यहाँ भावों का वर्णन नहीं होता।भावों की अभिव्यंजना साधी जाती है। इसलिए नाटक में भाव व्यंजक भाषा और विभावादि का इतना महत्त्व है।यदि विभावादि का नाटक में महत्व है तो यह तय है ये चीजें दृश्य अभिनय के माध्यमों के प्रसंग में आज भी प्रासंगिक हैं। हमारे साहित्यालोचकों की मुश्किल यह है कि वे नाटक को केन्द्र में रखकर लिखे शास्त्र को काव्य आदि विधाओं पर लागू करके उसकी प्रासंगिकता पर विचार करते रहे हैं ,खासकर नामवरजी ने भी इस कृति पर काव्यादि के संदर्भ में ही विचार किया है जो सही नहीं है। दृश्यमाध्यम की सैद्धांतिकी पर लिखी धारणाओं को मुख्य रूप से दृश्यमाध्यमों के संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए।

रस के विवेचन के क्रम में एक सवाल यह भी उठा है कि रस का किस वर्ग के साथ संबंध था ? रस के जो वर्गीकरण 8रसों में भरत ने किए उसके पीछे क्या कोई वर्गीयदृष्टि थी या फिर मनमौजी ढ़ंग से वर्गीकरण कर दिया गया था। वर्गीयदृष्टिकोण के सवाल पर इसलिए भी विचार करना चाहिए क्योंकि रसों के सामाजिक आधार को तय करने में मदद मिलेगी। रस का गहरा संबंध दरबारी सभ्यता के साथ था और रस कभी भी गैर-अभिजनवर्ग के उपभोग की चीज नहीं था.इसलिए जितनी भी बार रस पर बहस हुई है तो वह उसकी प्रशंसा और गुणों पर ही केन्द्रित रही है। उसके वर्गीय चरित्र को लेकर चर्चाएं नहीं हुई हैं। रस के समाज से कटे होने का बड़ा कारण यह था कि यह जन्म से अभिजन का शास्त्र रहा है।अभिजन के वैचारिक वर्चस्व को स्थापित करने का शास्त्र रहा है,यही वजह है आमजन ने कभी भी रसों को अपनी काव्याभिव्यक्ति या नाट्याभिव्यक्ति का आधार नहीं बनाया।

रस को दरबारी लेखकों ने अपनी रचनाओं में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया और अभिजनों की अभिरूचि निर्मित करने के लिए उसके तमाम उपकरण निर्मित किए। इसके कारण रस के अंदर एक खास तरह की अगतिशीलता या अपरिवर्तनीयता भी है। फलतः रस के मूल अवधारणात्मक ढ़ांचे में कोई परिवर्तन सैंकड़ों सालों नहीं हुआ। रस में अभिरूचि के स्तर पर सौंदर्यबोधीय विभाजन भी है जो लंबे समय से अपरिवर्तनीय है.इसका अर्थ है कि रस में ज्ञान का विकास नहीं हुआ।यह सच भी है कि नाट्यशास्त्र में वर्णित रसों के बारे में नई चीज तब आई जब अभिनवगुप्त ने अभिनव भारती नामक टीका लिखी,लेकिन रस की पूर्वधारणाओं को पूरी तरह खारिज करने की उनकी भी हिम्मत नहीं हुई।

रस पर दार्शनिक तौर पर आदर्शवादी दर्शन का असर था जिसके कारण रस की व्याख्याएं तो हुईं लेकिन मूलगामी परिवर्तन नहीं हुआ। अभिनवगुप्त के पहले तक तकरीबन 1000साल तक आठ रस ही प्रचलन में रहे,अभिनवगुप्त ने कहा कि नया रस शान्तरस हो सकता है। लेकिन अभिनवगुप्त के बाद तो फिर से रस जगत में सन्नाटा पसरा हुआ है। इससे पता चलता है कि रसों के उपभोक्ता के रूप में अथवा सर्जक के रूप में या रस के लेखक के रूप में जो लोग काम करते रहे हैं उनमें नई अवधारणाएं निर्मित करने की क्षमता ही नहीं थी,इस दृष्टि से रस एक तरह का बांझ शास्त्र है। उसमें नए को रचने की क्षमता नहीं है। जबकि कायदे से रस के ढ़ांचे से नाभिनालबद्ध वर्ग को नए के खोज की दिशा में प्रयास करना चाहिए लेकिन यह न हो सका।सवाल रस की व्याख्या का नहीं है बल्कि रस को बदलने का है रस जैसा है उसे वैसा ही रखने का अर्थ है कि रस की अपरिवर्तनीयता को मानना।जबकि सच यह है कि रस की उत्पत्ति जब हुई तब से लेकर आज तक तकरीबन दो हजार साल का लंबा सफर गुजर चुका है इसके बावजूद हमने नए की खोज का काम आरंभ नहीं किया है। रस का संरचनात्मक ढांचा इस तरह का है कि उसमें नए की खोज नहीं कर सकते।वह अपरिवर्तनीय उत्पादन संबंधों से बंधा है।

रस में एक खास किस्म का यांत्रिक संरचनात्मक ढ़ांचा है जिसमें रंगमंच काम करता रहा है।इसमें बाह्य हस्तक्षेप की संभावनाओं का अभाव है। रस हमारे पुराने प्राचीनकालीन सामूहिक कलात्मक अनुभवों का हिस्सा है। स्थिर भाव,स्थिर दर्शक और अगतिशील अभिनेता ये तीन इसके संरचनात्मक साथी हैं। फलतःइसकी ह्रासशील सामंती समाज में आकर भूमिका पहले की तुलना में और भी खराब हुई।

सवाल यह है कि रस को आधार बनाकर कोई मुक्तिकामी या परिवर्तनकामी नाटक क्यों नहीं लिखा गया ?रस का चूंकि नाटक के क्षेत्र में इस्तेमाल होता था अतःरस ने सार्वजनिक स्पेस और निजी स्पेस का विकास क्यों नहीं किया ? मध्यकाल में नाटक या रंगमंच हमारे समाज में जनमंच क्यों नहीं बन पाया ?समस्त नाटक उन्हीं वर्गों पर लिखे गए जो दरबारी सभ्यता से जुड़े थे।रस में विभिन्न किस्म के भावों का वस्तुगत वर्गीकरण मिलेगा और मंचन में इनकी वस्तुगत प्रस्तुतियों पर ही जोर रहा।वस्तुगत प्रस्तुतियां समाज के ऊपर आवरण डाले रखने का काम करती हैं,इस तरह की प्रस्तुतियों के कारण समाज की नाटक में यथार्थ प्रस्तुति नजर नहीं आती।समाज पर छदम आवरण पड़ा रहता है.इस तरह की प्रस्तुतियां शोषित और शोषक के बीच के संबंध को छिपाए रखती हैं।दबे-कुचले लोगों और अभिजन के बीच के अंतर्विरोधों को छिपाए रखती हैं।प्रस्तुतियों में मिथकीयचरित्रों के वर्चस्व की वजह से नाटकों के जरिए युगीन समाज को समझना बेहद मुश्किल है।यानी रसों के आधार पर ऐसा साहित्य रचा गया जो सतह पर देखने में सुंदर था लेकिन अंदर से प्राणहीन था।वह रहस्यों के आवरण में बंधा था।

रस को यदि मोक्ष का शास्त्र बनना है तो उसकी पहली सीढ़ी है नाटक में यथार्थ विषयों का प्रवेश हो।रस के नायक के तौर पर कथानक में सामान्यजन की प्रतिष्ठा हो।ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा हो जो समाज में हाशिए के लोग कहलाते हैं। यह विलक्षण संयोग है कि रसकेन्द्रित नाटकों का समूचा चरित्र सवर्णवादी है। कथानक के मूल पात्र सवर्ण हैं और वे कथानक की धुरी हैं। असवर्ण पात्र सिर्फ दिल बहलाने के लिए दाखिल होते हैं। वे सारवान गतिविधियों में शामिल नहीं होते।

भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ में रस की चर्चा रंगमंच के प्रसंग में है लेकिन कालांतर में काव्यशास्त्रियों और आलोचकों ने इसे साहित्य की विभिन्न विधाओं और खासकर काव्य के मूल्यांकन के संदर्भ में विस्तार दे दिया। इसने रसों के बारे में सबसे ज्यादा विभ्रम खड़े किए।रसों का संबंध यदि नाटक से है और नाटक का संबंध अभिनय से है,अभिनय का भाल-भंगिमाओं से और भाव-भंगिमाओं का सामयिक यथार्थ से संबंध है इस नजरिए से देखें तो नाटक-रस और यथार्थ के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी।लेकिन हमने पद्धति पुरानी चुनी,हम रसों की धारणाओं की मीमांसा कर रहे हैं और उसके आगे देखने को तैयार नहीं हैं। इसके बाद तो रस और बस ही निकलेगा !

रस,भाव-भंगिमाएं और यथार्थ के रिश्ते में रसमीमांसकों ने रसों पर खूब काम किया लेकिन यथार्थ के साथ उसके अन्तस्संबंध को छोड़ दिया।फलतःरसमीमांसा में भाष्य ही प्रमुख हो गए,व्याख्याएं ही प्रमुख हो गयीं।इस प्रसंग में वाल्टर बेंजामिन याद आते हैं ,वह कहते हैं भाव-भंगिमाएं तो यथार्थ में होती हैं।वे तो आज के यथार्थ में अवस्थित हैं।मसलन्,आपको ऐतिहासिक नाटक लिखना है तो अतीत की घटना का वहीं तक निर्वाह करना है जहां तक उसे आज की भाव-भंगिमाओं के साथ संयोजित करके पेश करने में सफलता मिले।इसका मतलब यह भी है कि ऐतिहासिक नाटक में अनुकरणात्मक भाव-भंगिमाएं तब तक अर्थहीन होती हैं जब तक वे भाव-भंगिमा की साधारण प्रक्रिया का उद्घाटन न करें।ये भंगिमाएं एक्शन की हो सकती हैं या फिर एक्शन का अनुकरण हो सकता है।यदि भाव-भंगिमाओं की पुनरावृत्ति होती है तो वे कृत्रिम रूप ग्रहण कर लेती हैं। वस्तुगत तौर पर देखें तो हमारी भाव-भंगिमाएं अत्यन्त उदार माहौल में बनती-बिगड़ती हैं।अगर कोई व्यक्ति सामाजिक भूमिका के दौरान भाव-भंगिमाओं में हस्तक्षेप करता है या उनका इस्तेमाल करता है तो उसे ज्यादा से ज्यादा सर्जनात्मक ढ़ंग से भाव-भंगिमाओं को सृजित करने की जरूरत पड़ती है।

भरत के नाट्यशास्त्र में रंगमंच और रस के अन्तस्संबंध को जिस तरह विश्लेषित किया उसमें पाठकेन्द्रित रसनिष्पत्ति पर जोर है और उससे रस का सर्जनात्मक विकास नहीं होता। यह दृष्टिकोण ठहरे हुए समाज में तो ग्राह्य है लेकिन जो समाज गतिशील है और ,वहां यह संबंध अप्रासंगिक हो जाता है, यही वजह है रसशास्त्र अगतिशील अवस्था में तो ध्यान खींचता है लेकिन समाज ज्यों ही विकास की अगली दशा में दाखिल हुआ उसकी ओर अधिकांश लेखकों का ध्यान ही नहीं गया अथवा जिन लेखकों ने रसकेन्द्रित होकर लिखा उनको अप्रासंगिकता का सामना करना पड़ा।

रस में आए ठहराव का एक बहुत बड़ा कारण है उसकी समाजनिरपेक्ष परिकल्पना और अवधारणाएं। समाज निरपेक्ष अवधारणाएं उन नाटकों में सही प्रतीत होती हैं जिन नाटकों का कोई सामाजिक लक्ष्य नहीं होता,जो मात्र मनोरंजन या आनंद के लिए लिखे गए हैं। अभिनवगुप्त ने जब भरत वर्णित रसों से भिन्न शान्तरस को स्थापित किया तो उनके जेहन में यही धारणा रही होगी।रस का काम है लोकचेतना से जोड़ना,यानी नाटक में पात्रों की सामाजिक भूमिका में बार-बार व्यवधान पैदा किया जाय,व्यवधान के लिए ही ज्यादा से ज्यादा गानों की जरूरत महसूस की गयी।रस के प्रसंग में भरत जिस रंगमंच की परिकल्पना पेश करते हैं वहां पाठ के विस्तार पर जोर है . उसी पर केन्द्रित अभिनय पर जोर है।लेकिन अभिनेता का काम पाठ को मंच पर हू-ब-हू उतारना नहीं है बल्कि उसका काम है हस्तक्षेप करना,व्यवधान पैदा करना,क्रमभंग करना।कलाकार रससृष्टि करे इसके लिए जरूरी है कि वह भाव-भंगिमा और परिस्थितियों के द्वंद्वात्मक संबंध को उदघाटित करे।इसी क्रम में अभिनेता के एटीट्यूट और पाठ के प्रति उसके रवैय्ये से बहुत कुछ तय होगा।इस प्रसंग में सबसे महत्वपूर्ण है पाठ पर अभिनेता का अधिकार।पाठ को अभिनेता जितनी गहराई में जाकर आत्मसात करेगा उतना ही बेहतर सृजन कर पाएगा।इसके कारण ही वह दर्शक के साथ बेहतर संबंध भी बना पाएगा।

भरत ने नाट्यशास्त्र में नाटक में रस की भूमिका पर ही मूलतः केन्द्रित किया है। उनके लिए रस और उसकी रंगमंचीय प्रक्रिया ही महत्वपूर्ण है। नाट्यशास्त्र की समूची व्याख्या इसी पहलू के इर्दगिर्द घूमती है।इसके जरिए जहां एक ओर नाटक की समीक्षा का पेट भरा गया वहीं काव्यशास्त्र के नाम पर आलोचना की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश की गयी।इससे शास्त्र तो निर्मित हुआ लेकिन रंगमंच समृद्ध नहीं हुआ।रंगमंच की समृद्धि के लिए जरूरी है नाटक खेले जाएं,अफसोस है कि नाट्यशास्त्र के प्रभाववश नाटक कम खेले गए,लिखे खूब गए।नाटक खेले गए होते तो रंगमंच का शास्त्र आज अभावग्रस्त न होता। सवाल उठता है जहां नाट्यशास्त्र रचा गया वहां नाटक की आधुनिक समीक्षा का विकास क्यों नहीं हो पाया ? जिस क्षेत्र में नाट्यशास्त्र रचा गया उस क्षेत्र में नाटक कम क्यों खेले गए?

भरत का नाट्यशास्त्र अभिनेता को दर्शक से भिन्न इकाई के रूप में देखता है।दर्शक से अभिनेता को काटकर देखने के कारण हमारे यहां रंगमंच दुर्दशाग्रस्त हुआ।दर्शक से अभिनेता को काटने का अर्थ है शरीर से प्राण निकाल लेना।जींवंत रंगमंच तब ही संभव है जब अभिनेता और दर्शक का संबंध बना रहे।फलतःसंस्कृत साहित्य में विधा रूप में नाटक है लेकिन फॉर्म से ज्यादा उसकी कोई भूमिका नहीं है।विधागत रूप से ज्यादा उसकी कोई भूमिका नहीं है।यह ऐसा नाटक है जो पाठ केन्द्रित है, लेकिन उसमें सामयिक सामाजिक परिस्थितियों की अभिव्यंजना कहीं पर भी नजर नहीं आती।यह ऐसा नाटक है जिसका रचयिता दरबारी है।इस तरह नाटक पूरी तरह दरबारी ताकतों के नियंत्रण में है। इसी संदर्भ में यह सवाल उठता है कि नाटक पर किसका नियंत्रण है ? संयोग की बात है कि संस्कृत नाटकों पर राज्य एपरेटस का नियंत्रण था और उसकी ओर कभी समीक्षकों ने ध्यान ही नहीं दिया। इस प्रसंग में दूसरी समस्या यह पैदा हुई कि आलोचकों ने नाटक को साहित्य की अन्य विधाओं के साथ जोड़ दिया। हम सब जानते हैं नाटक दृश्य माध्यम है जबकि अन्य विधाएं दृश्यमाध्यम नहीं हैं।वे श्रव्यमाध्यम हैं। इसलिए काव्य या साहित्य के साथ नाटक को जोड़कर देखना सही नहीं है,नाटक के शास्त्र को काव्यालोचना बनाना उचित नहीं है।

भरत ने नाट्यशास्त्र की जो परिकल्पना पेश की उसमें पाठ तैयार करना महत्वपूर्ण है,नाटक का सार्वजनिक प्लेटफॉर्म तैयार करना लक्ष्य नहीं है। रंगमंच का सार्वजनिक प्लेटफॉर्म बनाना लक्ष्य होता तो नाट्यशास्त्र की विचारधारात्मक भूमिका भी होती लेकिन नामवरजी नेउसकी व्यापक विचारधारात्मक भूमिका खोज ली।जो कि गलत है। भरत के लिए नाटक रसव्यंजना की विधा है, नाटक उनके लिए विश्व को व्यंजित करने का मंच नहीं है।वे अभिनय की कलात्मक व्याख्या पेश करते हैं लेकिन अभिनय तो कलात्मक व्याख्या नहीं है।अपितु यथार्थ नियंत्रण है।भरत के यहां पाठ ही निर्धारक है लेकिन अभिनय में पाठ निर्धारक नहीं है,वहां से आरंभ जरूर होता लेकिन वहां तो यथार्थ का सृजन करना लक्ष्य होता इस क्रम में ब्याज में पाठ का दायित्व पूरा हो जाता है साथ में अभिनय भी हो जाता है। कहने का अर्थ है अभिनेता कठपुतली नहीं होता।वह पाठ की देन नहीं है, बल्कि सृजन की देन है।

भरत जिस रंगमंच की परिकल्पना करते हैं उसके प्रसंग में सवाल उठता है कि दर्शक जब नाटक देखने जाता है तो क्या उसे नाटक के बारे में पहले से जानकारी होती है ? प्राचीन और मध्यकाल में जिस तरह के महाकाव्यात्मक नाटक लिखे गए उनमें मूल कथानक की दर्शक को पहले से जानकारी हुआ करती थी। इस प्रसंग में बर्तोल्त ब्रेख्त का इस स्मरण करना समीचीन होगा,उनका मानना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर केन्द्रित नाटकों में रंगकर्मी को यह लाईसेंस दिया जाना चाहिए कि वह अपने महान निर्णय कुछ इस तरह पेश करे कि लगे कि वे इतिहास की मुख्यधारा के अनुरूप हैं।साथ ही “ऐसा भी हो सकता था ,वैसे भी हो सकता था”,इस फ्रेमवर्क को न भूले।उसका अपनी रचना से वैसा ही संबंध होना चाहिए जैसा नृत्य शिक्षक का अपने शिष्य से होता है।उसका पहला लक्ष्य होता है उसके बंधनों को जहाँ तक संभव हो ढ़ीला करे।उसे ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक रूढियों से मुक्त करे।ब्रेख्त का मानना है परिस्थितियों को स्वयं बोलने दो,इसी से वे एक-दूसरे से द्वंद्वात्मक मुठभेड़ करती हैं।नाटक के तत्व तार्किक ढ़ंग से एक-दूसरे के खिलाफ संघर्ष करते हैं।

अभिनवगुप्त ने जब भरत वर्णित 8रसों से भिन्न नौवां शान्त रस पेश किया तो प्रकारान्तर से रसों के लक्ष्य पर ही प्रश्न लगाया।भरत का लक्ष्य था आनंद की सृष्टि करना,इसके विपरीत अभिनवगुप्त का लक्ष्य था वैराग्य यानी लोकचेतना पैदा करना। शान्तरस को पेश करके अभिनवगुप्त ने रसों की प्रामाणिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया था।साथ ही रसविशेषज्ञ की भूमिका पर को सवालों के दायरे में खड़ा कर दिया।उनके लिए रसविशेषज्ञ या क्रिटिक की आलोचना में चली आ रही वरीयता का भी कोई महत्व नहीं था।रसविशेषज्ञों की राय साहित्य में लगातार अप्रासंगिक बनी रही,इसका प्रधान कारण है रस का समाज से कटा होना।रस के नाम पर या काव्यशास्त्र के ज्ञाता या विशेषज्ञ के नाम पर जो आलोचक सामने आया वह समाज से पूरी तरह कटा हुआ था।यही वजह है कि उसका समाज पर कोई असर नहीं हुआ।

भरत के नाट्यशास्त्र में पारदर्शिता पर जोर है लेकिन इसे सरल प्रस्तुति न समझा जाए।पारदर्शिता वस्तुतःसरलता का विलोम है।पारदर्शिता में निर्माता की वास्तविक कलात्मक क्षमता का उदघाटन होता है।भरत के लिए दर्शक की भूमिका मात्र देखने तक है,वे इसके आगे सोचते ही नहीं है।यह ऐसा दर्शक है जो नाटक देखने पर ही कुछ क्षण के लिए सोचता है। इस तरह के नाटक का लक्ष्य जनता के भावों,विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करना नहीं है। संस्कृत नाटकों में चिन्तनशील हीरो नहीं मिलेगा।बल्कि विस्मयकारी हीरो मिलेगा।संस्कृत नाटकों में जो कथानक होता है वह परिस्थितियों को खोलने पर जोर नहीं देता।परिस्थितियां वहां सिर्फ संदर्भ के रूप में ऊपर से चिपकायी हुई प्रतीत होती हैं।नाटककार परिस्थितियों को जब तक खोलता नहीं है तब तक वह समाज का उदघाटन नहीं कर पाता। समाज का उदघाटन किए बगैर यह संभव ही नहीं है सामाजिक परिवर्तन हो।











































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