मंगलवार, 22 अगस्त 2017

शिक्षा किसके दवाब में है ? शिक्षा के शत्रु कौन हैं ?


      भारतीय समाज की आयरनी यह है कि सब शिक्षा लेना चाहते हैं लेकिन शिक्षा पर सोचना कोई नहीं चाहता।शिक्षा साझा समस्या है लेकिन इस पर न कोई जनांदोलन है और न किसी तरह की सामाजिक सचेतनता नजर आती है।यहां तक कि शिक्षकों और छात्रों में भी शिक्षा की समस्याओं को लेकर कोई सचेतनता और सक्रियता नहीं है।राजनीतिकदलों ने हमेशा शिक्षा को एक मृत विषय या अप्रासंगिक विषय के रुप में  व्यवहार किया है।शिक्षितों में शिक्षा संबंधी अचेतनता बताती है कि हमारा शिक्षित समाज, राजनीतिक संरचनाएँ, संसद-विधानसभा आदि  इस विषय को लेकर कितनी अचेत हैं।
     कल दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने यह फैसला लिया कि ४०० से ज्यादा प्राइवेट स्कूलों को सरकार अधिग्रहीत करेगी क्योंकि वे स्कूल सरकार की नहीं मान रहे थे और मनमानी फ़ीस वसूल कर रहे थे। कायदे से इस तरह के फैसले अन्य राज्य सरकारों को भी लेने चाहिए।दिल्ली सरकार ने पहले निजी स्कूलों को चेतावनी दी जब उन्होंने चेतावनी नहीं मानी तो सरकार ने अधिग्रहीत करने का आदेश दिया।दिलचस्प बात यह है इस खबर को मीडिया ने कहीं पर भी प्रमुखता से न छापा और न टीवी कवरेज ही मिला।शिक्षा को लेकर जो उदासीनता है यह उसका ताजा उदाहरण है। मैंने हाल ही में अपने तीस साल के टीवी अध्ययन में पहलीबार एकमात्र एनडीटीवी पर कई दिनों तक लगातार स्कूली शिक्षा की दशा पर महत्वपूर्ण सचेतनता पूर्ण टीवी टॉक शो देखा।किसी भी टीवी ने आज तक इतना व्यापक कवरेज शिक्षा पर प्राइम टाइम में नहीं दिया।
          असल में शिक्षा का विगत सत्तर सालों में बुनियादी अर्थ ही बदल गया है , जेएनयू पर जिस तरह केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया ने हमला किया है उसने एक ही संदेश दिया है कि शिक्षा व्यवस्था को सरकारी दल का पिछलग्गू या भोंपू होना चाहिए।शिक्षा तकरीबन समूचे देश में आज सरकारी दल के पिछलग्गू के रुप में ही काम कर रही है।विभिन्न राज्य सरकारें अपने निहित स्वार्थी नजरिए के अनुकूल लोगों को नौकरी देती हैं और तदनुरूप पठन-पाठन भी होता है।
                 विगत सत्तर सालों में तीन तरह के उपयोगितावाद को शिक्षा में देखा गया है।पहला, राजनीतिक उपयोगितावाद,दूसरा,व्यापारी उपयोगितावाद और तीसरा ,नौकरीकेन्द्रित उपयोगितावाद।शिक्षा संबंधी नीति,परिप्रेक्ष्य और आधारभूत संरचनाओं के निर्माण संबंधी फैसले इन तीन तरह के उपयोगितावाद को केन्द्र में रखकर लिए जाते रहे हैं, इसने आम शिक्षितों के शिक्षा संबंधी अज्ञान में इजाफा किया है,शिक्षा सचेतनता को दोयम दर्जे की चेतना बनाकर रख दिया है।
            शिक्षा का बुनियादी काम उपयोगितावादी बुद्धि निर्मित करना नहीं है। शिक्षा का बुनियादी काम है सचेतन नागरिक बनाना।दिलचस्प बात यह है हम जब पढते-पढाते हैं तो उपभोगवादी दृष्टिकोण से काम लेते हैं। मांग-पूर्ति के नजरिए से कक्षा में प्रवेश करते हैं।पाठ्यक्रम पढाना है और पाठ्यक्रम पढना है।काम के सवाल और उनके उत्तर बताना -लिखाना मात्र मकसद रह गया है।छात्र ,शिक्षा और शिक्षक की इतनी सीमित भूमिका के कारण ही आज शिक्षा एकदम अप्रासंगिक होकर रह गयी है।इसने शिक्षक को दाता और छात्र को उपभोक्ता मात्र बनाकर रख दिया है।आज शिक्षक और छात्र शिक्षा के कल-पुर्ज़े मात्र होकर रह गए हैं।आज छात्र-शिक्षक सचेतन नागरिक नहीं रह गए, बल्कि उलटा हो रहा है , जेएनयू के छात्रों -शिक्षकों को सचेतन नागरिक होने के नाते,उनके समर्थक शिक्षकों और छात्रों को सारे देश में राष्ट्रविरोधी कहकर अपमानित किया जा रहा है।
            जेएनयू का इस व्यवस्था के साथ एक ही बात पर मेल नहीं बैठता , वे शिक्षा के उपयोगितावाद और दाता-उपभोक्ता वाले मॉडल को एकसिरे ठुकराते  हैं,यही वजह है कि जेएनयू आज केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया के निशाने पर है। जेएनयू की खूबी है कि वहाँ शिक्षित नागरिक तैयार किए जाते हैं और यही वजह है कि सत्ताधारियों को यह बात पसंद नहीं है।जेएनयू के छात्र और शिक्षक नागरिकचेतना, नागरिक हकों और संवैधानिक सोच-समझ को लेकर शिक्षित  हैं, वे दैनन्दिन राजनीति की जटिलताओं को समझने और उनका समाधान खोजने, उसके लिए संघर्ष करने की समझ रखते हैं,वे मूढमति शिक्षितजन नहीं हैं,इस मायने में वे सारे देश से भिन्न एकदम विकसित चेतनायुक्त नजर आते हैं।जेएनयू माने सचेतन नागरिक की पहचान ,यही चीज है जो सत्ताधारियों को बेचैन किए रहती है।पहले कांग्रेसी परेशान थे अब आरएसएस परेशान है।
         शिक्षा जहाँ एक ओर नागरिकबोध पैदा करे वहीं साथ ही सामाजिक यथार्थ के अन्तर्विरोधों को गहराई से जानने की दृष्टि भी दे।इन अन्तर्विरोधों को जाने बग़ैर नागरिकचेतना नहीं बनती।जेएनयू में यह दृष्टिकोण पूरे कैम्पस के माहौल में रचा बसा है।आप किसी भी विषय के  शिक्षक और छात्र हों यह परिवेश आपको शिक्षित करेगा,अन्यत्र संस्थानों में यह चीज दुर्लभ है।अन्यत्र शिक्षा संस्थानों में "शिक्षित युवा", "कमाऊ युवा" मिलेगा ,नागरिकचेतना संपन्न नागरिक कम मिलेंगे।
             
     

सोमवार, 21 अगस्त 2017

शिक्षण की स्टीरियोटाइप शैली के खतरे


       शिक्षा में लगे लोग जाने-अनजाने जिस शैली का शिक्षण के लिए इस्तेमाल करते हैं उस पर कभी घर जाकर सोचते होंगे इस पर मुझे संदेह है।शिक्षण शैली के तीन स्टीरियोटाइप पहलू हैं, पहला , प्रस्तुति की स्टीरियोटाइप शैली, दूसरा, स्टीरियोटाइप पाठ्यक्रम, तीसरा, ज्ञान का स्टीरियोटाइप दार्शनिक नजरिया,वर्ग और राष्ट्र का स्टीरियोटाइप नजरिया।पढाते समय इन तीनों ही किस्म के स्टीरियोटाइप से बचने की जरूरत है।
      शिक्षण सर्जनात्मक होता है,वह तयशुदा चीजों और बातों से शुरु तो हो सकता है लेकिन उसका लक्ष्य तयशुदा लक्ष्य को प्राप्त करना नहीं है,बल्कि तयशुदा से परे जाकर नए की खोज करना उसका लक्ष्य है,तयशुदा के बारे में सवाल खडे करना, संवाद-विवाद पैदा करना । यदि स्टीरियोटाइप फ्रेमवर्क में ही चीजें पेश की जाती  हैं तो संवाद पैदा नहीं होगा।सवाल खडे नहीं होंगे।खोज और जिज्ञासा की भावना पैदा नहीं होगी।खोज और जिज्ञासा की भावना के बिना आप आधुनिक नहीं बन पाएँगे, यही वजह है  हमारी शिक्षा पूर्व-आधुनिक मनोभावों और मूल्यों से मुक्त नहीं करती।कहने का मतलब यह कि स्टीरियोटाइप नजरिया और अभ्यास शिक्षक और छात्र दोनों को नुकसान पहुँचाता है।
         हिंदी फिल्मों में ऐसी फ़िल्में बनी हैं जो स्टीरियोटाइप को चुनौती देती हैं.मसलन् , "तारे जमीन पर" (२००७) में ऐसा शिक्षक है जो एकदम खुले दिमाग का है और पूर्वाग्रहों से रहित है।" मैं हूं ना" (२००४)फिल्म में शिक्षक -छात्र मित्रता पर जोर है।शिक्षक बोरिंग नहीं होता। "चक दे इण्डिया" (२००७)में शिक्षक की भूमिका है टीम को एकजुट करने की,"थ्रीइडियट"(२००९) में बोमन ईरानी (वीरू सहस्त्रबुद्धे ,शिक्षक का नाम) जीनियस और अहंकारी शिक्षक है, वहीं आमिर खान (रांचो)का चरित्र है जो लगातार यही बताता है कि डिग्रियाँ कहीं नहीं ले जातीं।असली ज्ञान तो क्लास रुम और किताबों के बाहर है।"ब्लैक" फिल्म में अमिताभबच्चन ( देवराज सहाय) बताता है कि शिक्षक किस तरह अर्थपूर्ण जीवन बना सकता है।इसी तरह "मोहब्बतें" फिल्म में जोर है कि शिक्षक को नरमदिल होना चाहिए तब ही वह छात्रों की संवेदनाएँ समझ सकता है।

शिक्षा में साम्प्रदायिकता और स्टीरियोटाइप

 
           आप देश में कहीं पर भी जाइए आपको विश्वविद्यालयों और कॉलेज शिक्षकों में एक बड़ा तबक़ा मिलेगा जो सहज और स्वाभाविक तौर पर साम्प्रदायिकचेतना और जातिचेतना संपन्न है । स्थानीय तौर पर अनेक मसलों पर ये लोग साम्प्रदायिक या जातिवादी नजरिए से सोचते हैं । इस तरह की चेतना कांग्रेस के जमाने में भी थी और आज भी है।लेकिन भाजपा-आरएसएस का प्रचार यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में वामदलों का , वाम विचारधारा का वर्चस्व है।आरएसएस का यह प्रचार एकदम निराधार और सफेद झूठ है।मैं जब पढता था तब और जब पढाने लगा तब भी अधिकांश शिक्षकों में साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना के मैंने जेएनयू से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक साक्षात दर्शन किए हैं।सवाल यह है शिक्षकों में यह चेतना कहाँ से आती है? हम अपनी शिक्षा और शिक्षकों को साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना से मुक्त क्यों नहीं कर पाए ? असल में हमारी शिक्षा परिवर्तन विरोधी है , परिवर्तनकामी को शिक्षा में शक की नजर से देखते हैं।
          एक अन्य बुनियादी सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज तर्क और विवेक के आधार पर चल रहे हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से चल रहे हैं ? शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तर्क,विवेक और वैज्ञानिक नजरिए से पढाते हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से पढाते हैं? अंदर की हकीकत यह है कि हम अपने विद्यार्थी को स्टीरियोटाइप पद्धति से पढाते हैं।वास्तविकता यह है कि हमारे विकास और परिवर्तन की गारंटी स्टीरियोटाइप नजरिया नहीं है। हमें यदि बदलना है और नया समाज बनाना है तो तर्क और विवेक के आधार पर चीजों को देखने,समझने और परखने के संस्कार पैदा करने होंगे।ये चीजें ही शिक्षा की सार्थकता की गारंटी हैं।
         विश्वविद्यालय और कॉलेज का नाम आते ही  पहला शब्द ज़ेहन में आता है वह है ज्ञान या नॉलेज।सवाल यह है हम ज्ञान कैसे अर्जित करते हैं ? ज्ञान कैसे संप्रेषित करते हैं ? जानना या खोज की भूख पैदा करना बेहद जरुरी है लेकिन हमारा समूचा पठन -पाठन ज्ञान की भूख पैदा नहीं करता,खोज की इच्छा पैदा नहीं करता इसके विपरीत हमने यह मान लिया है कि हमें किसी तरह डिग्री हासिल करनी है, नौकरी हासिल करनी है और इसके लिए जितना जरुरी है उतना ही पढो, रट लो और फिर काम पर निकल लो! यानी ज्ञान के साथ हमने प्रयोजनमूलक संबंध बनाया है ज्ञानकेन्द्रित संबंध नहीं बनाया है।शिक्षा में प्रयोजनमूलक दृष्टि हमें पुराने संस्कारों ,मूल्यों और संबंधों से मुक्त करने में मदद नहीं करती यही वजह है कि हम जैसे पढने आते हैं डिग्री पाने के बाद भी वैसे ही बने रहते हैं। यही दशा शिक्षकों की भी है। वे शिक्षित होकर भी अवैज्ञानिक बातें करते हैं, तर्कहीन और अविवेकपूर्ण बातें करते हैं ,अपरिवर्तित बने रहते हैं। 
       असली शिक्षा वह है जो मनुष्य को बदले, मनुष्य के अंदर बैठे पशुबोध को नष्ट करे। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम न तो बदलते हैं और न हमारे अंदर का पशुबोध मरता है बल्कि शिक्षित होने के बाद यह  प्रबल और शक्तिशाली हो जाता है।यथास्थिति बनी रहती है और इसे बनाने में स्टीरियोटाइप पठन-पाठन की केन्द्रीय भूमिका है।यही वह बुनियादी जगह है जहाँ पर साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना फल-फूल रही है।
        

रविवार, 20 अगस्त 2017

मोदीमोह के छंद से गुज़रते हुए



     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी बोलते हैं तो सवा सौ करोड़ भारतवासियों को सम्बोधित करके बोलते हैं।वे हर इलाके में प्रचलित समस्या को उठाते हैं और उसे स्थानीय भावनाओं से जोड़ते हैं।फलत:मंच पर वे राजनीतिक तौर पर सही नजर आते हैं, सुनने वाला यही कहता है  मोदीजी सही बोल रहे हैं।इस क्रम में जहाँ वे समस्या की ओर व्यापकतम जनता के तबक़ों का ध्यान खींचने में सफल हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर जनता को मंत्रमुग्ध कर लेते हैं।
      मोदी के प्रचार में मंत्रमुग्ध करना ही सबसे प्रमुख चीज है। स्थिति यह है सभी विपक्षी नेता तक उनकी भाषणकला का लोहा मानते हैं।मंत्रमुग्ध करने के बाद उनका असली खेल आरंभ होता है ।वह श्रोताओं को बहलाना-फुसलाना शुरू कर देते हैं।वे मंत्रमुग्ध भावबोध को वोट देने की मंशा से जोड़ देते हैं,भाजपा-आरएसएस के लक्ष्यों से जोड़ देते हैं।इस क्रम में जनता यह भूल जाती है कि भाजपा-आरएसएस ने वर्तमान या अतीत में क्या किया ।यही वजह है कि मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद भाजपा-आरएसएस के वर्तमान और अतीत के कर्म-कुकर्मों पर बहस ही नहीं होती, उसके जनविरोधी -साम्प्रदायिक चरित्र पर बहस नहीं होती।
     मंत्रमुग्ध करके बहलाने-फुसलाने की कला के कारण हमेशा चीजें भविष्य की ओर ठेली जा रही हैं। मोदीजी जो कुछ करेंगे वह भविष्य में सामने आएगा, वर्तमान में उसे मत खोजो।राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित करने को वर्तमान की बजाय भविष्य में ठेलना अपने आपमें सबसे बडा अविवेकवाद है।लेकिन आम जनता को यह अविवेकवाद नजर ही नहीं आता।
   मोदी और आरएसएस का सारा जोर आक्रामक प्रचार अभियान पर है जिससे वे अपनी असफलताओं को आम जनता से छिपाने में सफल रहे हैं।मसलन जो उन्होंने चुनावी वायदे किए थे उनको वे आजतक पूरा नहीं कर पाए ,लेकिन जनता इस सब पर बहस ही नहीं कर रही, वह तो मोदीमोह में डूबी है और सुंदर भविष्य का इंतजार कर रही है, आम जीवन में सामाजिक-आर्थिक तौर पर जो गिरावट आई है उस पर समाज में कहीं पर बहस नहीं हो रही और सारी जनता भविष्य के हवाले कर दी गयी है, यह मोदी के प्रचार अभियान की सबसे बडी सफलता है।
        हम सब जानते हैं कि कांग्रेस और यूपीए की जनविरोधी नीतियों से जनता परेशान थी उसने मजबूरी में , विकल्प के अभाव में भाजपा-मोदी को वोट दिया था।मोदी आम जनता की रेशनल पसंद नहीं हैं बल्कि वे मजबूरी में , विकल्प के अभाव में सत्ता में आए हैं।वहीं दूसरी ओर मोदी के प्रचार अभियान ने विकल्प बनाने में मदद की।
        प्रचार अभियान के जरिए दो तरह के लोगों को ख़ासतौर पर निशाना बनाया गया।एक तरफ भाजपा-आरएसएस के समर्थकों को निशाना बनाया गया वहीं दूसरी ओर तटस्थ  मतदाताओं को निशाना बनाया।इसके लिए बृहत्तर जन आकांक्षाओं को प्रचार अभियान के केन्द्र में रखा गया।
        मोदी के प्रचार अभियान के प्रभाव को उनको मिले वोट की तराज़ू में नहीं तोलना चाहिए, कहने उनको मात्र ३१ प्रतिशत वोट मिले हैं, लेकिन उनके प्रचार के असर को देखना हो तो यहां से देखो कि उन्होंने भाजपा और आरएसएस के बारे में जनता का नजरिया ही बदल दिया।उन्होंने जितने भी राजनीतिक एक्शन किए उसकी संगति में प्रचार मशीन को सक्रिय रखा जिसका उनको लाभ मिला।मसलन् लवजेहाद,गऊ रक्षा, जेएनयू आदि के बारे में उनके राजनीतिक एक्शन को आम लोगों में व्यापक समर्थन मिला जबकि ये तीनों मसले एकसिरे से जनविरोधी और संविधान विरोधी फ्रेमवर्क में चलाए गए।आम लोगों में इन तीनों मसलों पर या तो संघ परिवार के साथ सहमति नजर आई या फिर लोगों ने प्रतिवाद को गंभीरता से नहीं लिया।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

नायक के लिए तरसता समाज


   अजीब तर्क दिया जा रहा है वे कह रहे हैं विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है, कोई ऐसा नेता नहीं है जो मोदीजी का विकल्प हो!यह असल में उनका तर्क है जो नायक के सहारे समाज की मुक्ति के दिवा-स्वप्न देखते हैं। नायक केन्द्रित मनोदशा हमारी राजनीति की रही है उसने नायक पूजा को सबसे बड़ा बनाया है। अभावों में जीने वाले लोग हमेशा नायक में मुक्ति की खोज करते  हैं, हमारे समाज की बुनावट भी कुछ ऐसी है कि हमें नायक के बिना नींद नहीं आती, बस नायक मिल जाए तो हम चैन की नींद सोएँ! 
      सवाल यह है नायक की तलाश करके हम जाना कहाँ चाहते हैं ? किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं ? नायक पूजा की संस्कृति निर्मित करके हमने देश को शक्तिशाली बनाया या खोखला ?क्या भारत को नायक चाहिए या विकल्प में कुछ और चाहिए ? आमतौर पर वैचारिक संकट के समय नायक की तलाश सबसे ज्यादा करते हैं, हम अच्छे विचार नहीं खोजते,अच्छे मूल्य नहीं खोजते ,अच्छी नीति नहीं खोजते,उलटे नायक खोजते हैं, चाहे नायक मूल्यहीन हो।
       नायक खोजने की आदत समाज में परजीविता की गहरी जड़ों को रेखांकित करती है।हमें जब राजनीति के नायक से बोरियत होने लगती है तो हम फ़िल्मी नायक से दिल बहलाने लगते हैं।नायक की आड़ में जीने और आनंद लेने की मानसिकता बुनियादी तौर पर वैचारिक और सांस्कृतिक दरिद्रता की प्रतीक है।हमें हर हालत में नायक पूजा से बचना चाहिए।नायक पूजा हमारे आलोचनात्मक विवेक को सबसे पहले अपहृत करती है।हम मूल्यों पर बहस नहीं कर रहे, नीतियों पर संवाद-विवाद नहीं कर रहे, बल्कि नायक पर विवाद कर रहे हैं। 
     भारत में नायक का विचार अजर,अमर है।दिलचस्प बात है एक नायक के जाते ही हठात् दूसरा नायक हमारी आँखों के सामने आ बैठता है।कल तक जो नायकपूजा के रुप में इंदिरा गांधी से  नफरत करते थे वे ही नायक के रुप में नरेन्द्र मोदी की अहर्निश पूजा कर रहे हैं।मोदी में उन्होंने तकरीबन वे सारे गुण खोज लिए हैं जिन गुणों के लिए वे इंदिरा गांधी की आलोचना कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि मोदी अनेक मामलों में   इंदिरा गांधी के अनुयायी नजर आते हैं।मसलन् इंदिरा गांधी ने नक्सलवाडी आंदोलन को कुचलने के नाम पर बंगाल के युवाओं की बडे पैमाने पर हत्याएँ कीं , ठीक यही हालात कश्मीर में मोदीजी ने किए हैं,निर्दोष कश्मीरी आए दिन में मारे जा रहे हैं, १९७२-७७ केबंगाल के अर्द्ध फासी आतंक को लेकर सारे देश में बेगानापन था यहां तक कि बाबू जयप्रकाश नारायण से ज्योति बसु ने कहा कि हमारे बंगाल में जुल्म हो रहा है विधानसभा चुनावों में व्यापक धाँधली हुई है तो  बाबू जयप्रकाश नारायण को विश्वास नहीं हुआ,सन् १९७२ में बंगाल में विधानसभा चुनाव में भयानक धाँधली हुई और सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने, बंगाल में नक्सलवाडी आंदोलन से लेकर १९७७तक कई हजार वाम युवा पुलिस की गोलियों के शिकार हुए।ठीक वही पैटर्न कश्मीर और बस्तर में चल रहा है।
       मूल मुद्दा यह है कि भारत को नायक खोजने की बीमारी से कैसे छुट्टी दिलाई जाए।हम सबको नायक केन्द्रित राजनीति की बजाय जनराजनीति पर जोर देना चाहिए। जनता को शिक्षित करना चाहिए , जनता की समस्याओं को प्रमुखता से केन्द्र में रखना चाहिए। 
       हमारी राजनीति में जनता की समस्याएँ केन्द्र में नहीं रहतीं नायक केन्द्र में रहता है।नायक के केन्द्र में रहने का अर्थ है जनता की समस्याओं का चेतन जगत में अंत, हम समस्याओं पर सोचना बंद कर देते हैं, नायक के भाषण, कपड़े, मीडिया जलवे, शोहरत के झूठे क़िस्सों में समय व्यतीत करने लगते हैं। 
      मोदी के प्रचार की सबसे बडी विशेषता है कि उसने सार्वजनिक जीवन से बुनियादी समस्याओं पर बहस को गायब कर दिया है और हम सब मोदी के जश्न और शोहरत के क़िस्सों में व्यस्त हो गए हैं। नायक के रुप में मोदी के भाषण,जश्न,जलसों और शोहरत से आम जनता के जीवन में ख़ुशहाली आने वाली नहीं है, ये सारी चीजें तो मोदी मोह में बाँधे रखने की कला के नुस्ख़े हैं।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

कैंसर है मोदीमोह !




अब बेचारे बेरोज़गार गाली खाएँ।मोदीजी को बेकारी नजर नहीं आ रही , बेकारी का हल्ला करने वालों को वे बेकारों का दलाल कह रहे हैं।वे रोजगार देने वाली कोई नई स्कीम लागू नहीं कर पाए उलटे जितनी स्कीम उन्होंने लागू की हैं , नए कानून बनाए हैं ,उनसे बेकारी बढी है।इसी को कहते हैं चौपट राशि प्रधानमंत्री!
        मसलन् , पीएम ने हाल ही में एनपीए यानी बैंकों का बडी कंपनियों से क़र्ज़ा वसूल करने के लिए कानून लागू किया जिसके तहत क़र्ज़ा भुगतान न करने वाली कंपनियों से वसूली होनी थी लेकिन इस कानून के लागू होते ही इंफ़्रास्ट्रक्चर की कंपनियां आवेदन लेकर चली आईं कि वे बैंकों का क़र्ज़ा चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।परिणाम सामने हैं आम्रपाली और जेपी इंफ़्रास्ट्रक्चर को पैसा दे चुके हजारों लोगों का अपना घर बनाने का सपना चूर चूर हो गया वे करोडों के बैंक कर्ज में डूब गए,वे कह रहे हैं हम बैंकों की किश्त देने की स्थिति में नहीं हैं।इससे बैंकों का एनपीए कम होने की बजाय और बढ़ेगा ।वहीं दूसरी ओर कंपनियों का क़र्ज़ा ठिकाने लगा दिया जाएगा उनको दिवालिया घोषित कर दिया जाएगा दूसरी ओर मध्यवर्ग को न तो घर मिलेगा और न बैंकों से राहत मिलेगी । एक अन्य परिणाम यह भी निकलेगा कि भवन निर्माण में सन्नाटा गहराता चला जाएगा।हम अपील करेंगे कि मोदीमोह से निकलो यह कैंसर की तरह है।
   मोदीमोह में जो वर्ग फँसा वह मौत के मुँह में गया ।मोदी मोह में व्यापारी और दुकानदार सबसे पहले फँसे वे आज सबके सब मोदीमोह की पीडा से करो रहे हैं, इनमें सबसे पहले सोने के व्यापारी मोदी कैंसर के शिकार हुए , बाद में नोटबंदी और जीएसटी ने समूचे व्यापार को मोदी कैंसर की चपेट में ले लिया, दूसरे चरण में मोदी कैंसर ने जिओ कनेक्शन के जरिए समूचे दूरसंचार उद्योग को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया है,पतंजलि के बहाने समूचे घरेलू वस्तु बाजार कंपनियों को मोदी कैंसर के हवाले कर दिया है। पतंजलि खुलेआम मिलावटी सामान बेच रहा है ।
     युवाओं में मोदीमोह ने अविवेक और असभ्यता को वैध बनाया है।घरेलू महिलाओं में राष्ट्रवादी हिंसा और घृणा के प्रति प्रेम पैदा किया है।राष्ट्रीय फिनोमिना के रुप में मोदीमोह ने छद्म यथार्थ में जीने के संस्कार पैदा किए हैं।वहीं दूसरी ओर जनता की सुनने और समझने की क्षमता का  अपहरण कर लिया है।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

फासिज्म का नया मुहावरा



मोदी ने फासिज्म को नया रुप दिया है उसने हिंदुत्व को सर्वोपरि स्थान दिया है देश -विदेश सब जगह हिंदुत्व के फ्रेमवर्क में चीजों को पेश किया है। हिंदू मिथकों और मिथकीय पात्रों को सामान्य अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया है। हिंदू नैतिकता को महान नैतिकता बनाया है और उसके कारण  देश में हिंदुत्व का माहौल सघन हुआ है।दूसरा बडा परिवर्तन यह कि किया है उसने "सर्जिकल स्ट्राइक " या "युद्ध "इन दो पदबंधों को हिंदुत्व की नैतिकता बना दिया है।अब हर चीज के खिलाफ मोदीजी "सर्जिकल स्ट्राइक "कर रहे हैं या "युद्ध "कर रहे हैं।मसलन् , कालेधन के खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक, गंदगी के खिलाफ युद्ध , गरीबी के खिलाफ युद्ध आदि पदबंध  आए दिन सत्तातंत्र के प्रचार के रुप में कारपोरेट मीडिया हमारे ज़ेहन में उतार रहा है। वे "सर्जीकल स्ट्राइक'' या "युद्ध" के नाम पर सभी किस्म के वैचारिक मतभेदों को अस्वीकार कर रहे हैं।वे मांग कर रहे हैं कि वैचारिक मतभेद बीच में न लाएँ ।वे यह भी कह रहे हैं यह बहस का समय नहीं है ,काम करने का समय है बहस मत करो, सवाल मत करो, सिर्फ सत्ता का अनुकरण करो।
   एक जमाना था आम आदमी साम्प्रदायिक विचारों से नफरत करता था अपने को उनसे दूर रखता था लेकिन आज स्थिति गुणात्मक तौर पर बदल गयी है, आज साम्प्रदायिक विचारों से आम आदमी नफरत नहीं करता बल्कि उससे जुड़ना अपना सौभाग्य समझता है।कल तक धार्मिक पहचान मुख्य नहीं थी लेकिन आज दैनन्दिन जीवन में वह प्रमुख होउठी है, पहले जाति पूछने में संकोच करते थे आज खुलकर जाति पूछते हैं।
       आज फासिज्म वह है जो आपको पसंद नहीं है।आज आप पुरानी फासिज्म की अवधारणाओं के आधार पर उसे समझा नहीं सकते।मसलन् मोदीभक्तों और मोदी सरकार को जो पसंद नहीं है उसे वे  मानने को तैयार नहीं हैं। वे सिर्फ इच्छित बात ही सुनना चाहते हैं। अनिच्छित को इन लोगों ने फासिज्म बना दिया है।यह ओरवेलियन परिभाषा है कि जो बताती है अनिच्छित है वह फासिज्म है।

नए किस्म का फासिज्म



फासिज्म के मायने क्या हैं इस पर भारत में बहुत बहस है और इस बहस में बड़े बड़े दिग्गज उलझे हुए हैं लेकिन आजतक उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं। फासिज्म वह भी है जो हिटलरऔर मुसोलिनी ने किया , फासिज्म वह भी जो आपातकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया,फासिज्म का एक रुप वह भी है जो पीएम नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। मोदी के फासिज्म की लाक्षणिक विशेषताएँ भिन्न हैं। मोदीजी का फासिज्म विकास और गरीब के कंधों पर सवार है लेकिन इसके प्रशासन के संचालक  कारपोरेट घराने हैं।इसकी धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट ।यह अपने विरोधी को राष्ट्रद्रोही , राष्ट्र विरोधी कह कहकर कलंकित करता है,इसके पास मीडिया और साइबर मीडिया की बेशुमार ताकत है।यह ऐसी सत्ता है जो किसी की आवाज नहीं सुनती बल्कि सच यह है यदि जीना चाहते हैं तो सिर्फ उसकी आवाज़ें सुनो।मोदी के शासन में आने के बाद से अहर्निश मोदी की सुनो,मोदी के भक्तों की सुनो।दिलचस्प पहलू यह है कि इस समय मोदी और भक्तों के अलावा कोई नहीं बोल रहा ।सब लोग इनकी ही सुन रहे हैं । जनता बोल नहीं रही। वो सिर्फ सुन रही है और आज्ञा पालन कर रही है।हमारे जैसे लोग जो कुछ कह रहे हैं उसे न तो जनता सुन रही है और  न सत्ता सुन रही है सिर्फ हम ही अपनी आवाज सुन रहे हैं।हम तो सहमत को सुना रहे हैं । अपने ही हाथ से अपनी पीठ ठोक रहे हैं। जब जनता न सुने , सरकार न सुने, संवादहीनता हो तो समझो फासिज्म के माहौल में जी रहे हैं।इस माहौल को पैदा करने के लिए प्रत्यक्षत: हक छीनने , या संविधान को स्थगित करने या बर्बर हमले करने की जरूरत नहीं है।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

सोनिया गांधी का मतलब



         पिछले तीन सालों से देश में जो कुछ चल रहा है उसके प्रतिवाद के संदर्भ में सोनिया गांधी की राजनीतिक भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो उठी है।सोनिया गांधी ने मोदी की आँधी में जिस तरह लोकसभा का चुनाव जीता और नियोजित ढंग से कांग्रेस के मूल स्वभाव को बदलने की दिशा में  कदम उठाए हैं वे इस बात को पुष्ट करते हैं कि सोनिया गांधी देश की राजनीति में सामान्य नेत्री नहीं हैं।सोनिया गांधी में कांग्रेस को जोड़े रखने की क्षमता है।साथ ही देश के विकास का एजेण्डा भी तय करने की क्षमता है। यह सच है कांग्रेस को जितना आक्रामक होना चाहिए वह उतनी आक्रामक नजर नहीं आ रही लेकिन यह भी बडा सच है कि कांग्रेस के नए कलेवर के निर्माण के लिए सोनिया गांधी का नेतृत्व में बने रहना भी जरूरी है। पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा राजनीतिक हमले सोनिया गांधी झेलती रही हैं लेकिन उन्होंने कभी उफ़ तक नहीं की। उन्होंने जितनी बार बोला है देश के सच को बयां किया है।लोकतंत्र के लिए वह नेता मूल्यवान होता है जो सच बोलता है, सोनिया गांधी सच बोलती हैं और सच में जीती हैं यह उनकी सबसे बडी ताकत है।
         सोनियागांधी के चरित्र हनन की जिस तरह कोशिशें हुई हैं उससे उनके व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पडा उलटे वे ताकतवर होकर निकली हैं। सोनिया गांधी कम बोलती हैं लेकिन प्रासंगिक बोलती हैं। वे नियमित संसद जाती हैं वहाँ बैठकर सारी बहस सुनती हैं, इसके विपरीत मोदीजी संसद में न्यूनतम समय भी नहीं बैठते। संसद उनके लिए फालतू चीज है। मोदी के लिए संसदीय परंपराओं और संवैधानिक मान्यताएँ अवसरवादियों के खेल की तरह है वहीं सोनिया के लिए ये प्राणवायु हैं।

भारत के मुसलमान दुनिया के मुसलमानों से भिन्न हैं

      


भारत में हिंदुओं और मुसलमानों ने अन्य समुदायों के साथ मिलकर स्वाधीनता संग्राम लड़ा, संसदीय जनतंत्र चुना, भारत के अधिकांश मुसलमानों ने भारत विभाजन को अस्वीकार करके भारत में रहकर लोकतंत्र के विकास में भूमिका निभाने का फैसला किया । लोकतंत्र का मार्ग मुसलमानों का चुना मार्ग है ,यह साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा निर्मित मार्ग नहीं है। बल्कि साम्प्रदायिक ताकतें तो एकजुट भारत के खिलाफ १९४७ के पहले भी थीं और १९४७ के बाद भी रही हैं। 
        भारत के मुसलमानों ने हमेशा भारत के संविधान को माना और संसदीय लोकतंत्र को पुख्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।भारत के मुसलमानों ने कभी साम्प्रदायिकता के आधार पर न तो वोट दिया और न कभी साम्प्रदायिक नेताओं को संसद और विधानसभा में चुनकर भेजा ।इसके बावजूद मुसलमानों के विकास के लिए लोकतंत्र में जिस तरह की सुविधाएँ और समान अवसर होने चाहिए  मनमोहन सरकार के पहले तक किसी सरकार ने उनका ख्याल नहीं किया । 
पहलीबार सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद विस्तार से पता चला कि आजादी के चालीस साल बाद भी मुसलमानों के सामाजिक  -शैक्षणिक-आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। यहां तक कि वामशासन वाले पश्चिम बंगाल में तो सबसे ज्यादा खराब थे।इसलिए यह कहना कि मुसलमानों के लिए कांग्रेस और वाम ने महत्वपूर्ण काम किए हैं यह सही नहीं है। पहलीबार सच्चर कमीशन ने हमारे सिस्टम में निहित मुसलिम विरोधी भावों को उजागर किया।इसके बाद यूपीए सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में १५सूत्री कार्यक्रम लागू किया। आरएसएस के मुसलिम विरोधी प्रचार से अप्रत्यक्षतौर पर कांग्रेस और वाम कहीं न कहीं प्रभावित रहे हैं , मुसलिम तुष्टीकरण का उन पर संघ का आरोप बेबुनियाद है।सच्चाई यह है कि अधिकांश मुसलमान बहुत ही खराब अवस्था में आज भी रह रहे हैं। मुसलिम तुष्टीकरण का नारा लगाकर आरएसएस हमेशा मुसलमानों के हकों पर हमले करने की कोशिश करता रहा है।
       भारत के मुसलमान बाकी दुनिया के मुसलमानों से वैचारिक तौर पर भिन्न रहे हैं, यह वैचारिक भिन्नता आधुनिककाल में ही नहीं दिखती बल्कि मध्यकाल में भी दिखती है। बाकी दुनिया के मुसलिम शासकों और भारत के मध्यकालीन मुसलिम शासकों के विचारों में बुनियादी अंतर है,इसके कारण आधुनिककाल में भी मुसलमानों में अंतर चला आया, बाद में आधुनिककाल के मुसलिम विचारकों और स्वाधीनता सेनानी मुसलमानों में बाकी समाज के साथ मिलकर उदारतावाद को मज़बूत बनाने और देश में उदारतावाद का माहौल बनाने का फैसला किया, यह परंपरा बाकी दुनिया में मुसलिम देशों में नजर नहीं आती। 
    दूसरी बात यह कि मुसलमानों का भारत में एक ही विचारधारा की ओर रूझान कभी नहीं रहा, उनमें उदार,धार्मिक,क्रांतिकारी और अनुदारवादी किस्म के लोग और संगठन  रहे हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को एक ही विचारधारा के दायरे में रखकर नहीं देखना चाहिए।मुसलमानों में भी विचारों की बहुलता है।अफसोस की बात यह है कि हम मुसलमानों को न तो जानना चाहते हैं और न उनके यथार्थ को देखना चाहते हैं।उलटे आरएसएस के प्रचार को सच मानकर चलते हैं। सच यह है मुसलमानों के यथार्थ जीवन को लेकर आरएसएस कुछ नहीं जानता ,वह साम्राज्यवादी ताकतों के मुसलमान विरोधी प्रचार माल को ही हमारे सामने परोसता रहता है।
        आरएसएस और उसके भोंपू मीडिया में चल रहे मुसलिम रूढिबद्ध प्रचार अभियान को एकसिरे से ठुकराने की जरूरत है।मुसलमान भी इस देश के नागरिक हैं, उनके सुख-दुख भी हिंदुओं जैसे होते हैं, वे सतह पर भिन्न हो सकते हैं लेकिन अंदर से तो भारतवासी हैं। सवाल यह है ऊपर की धार्मिक पहचान को हम क्यों अहमियत देते हैं ? मुसलमान तो मनुष्य हैं जैसे हिंदू मनुष्य हैं।हम सभी लोगों को मनुष्य के रुप में देखें। कोई यदि अपने को हिंदू कहे या मुसलमान, हमें उसके प्रति मित्रता और भाईचारे का भाव रखना चाहिए।
         यह सच है देश में इस समय सत्ता का आतंक और भय छाया हुआ है लेकिन इस भय को मित्रता और शिरकत से तोड़ सकते हैं। राजनीतिक खेमेबाज़ी से यह चीज हासिल नहीं हो सकती।

रविवार, 30 जुलाई 2017

क्रांतियाँ बेकार नहीं जातीं -


                 
    विश्व विख्यात इतिहासकारों में एरिक हॉब्सबाम अग्रणी हैं।उनके लेखन की विशेषता है इतिहासलेखन को विशेषज्ञों के अध्ययन-अध्यापन के दायरे से बाहर लाकर जनोपयोगी बनाना,साधारण पाठक के लिए बोधगम्य बनाना। साधारण पाठक और इतिहासकार इन दोनों के बीच इतिहास को किस तरह जनप्रिय बनाया जाए इसी बुनियादी लक्ष्य को सामने रखकर उन्होंने 4प्रमुख किताबें लिखीं,वे हैं,1.क्रांति का युग,2.पूंजी का युग,3. साम्राज्य का युग और 4.अतिरेकों का युग।इन चारों किताबों के अनुवाद संवाद प्रकाशन,मेरठ ने छापे हैं। हमारी समीक्षा के केन्द्र में ´पूंजी का युग´ नामक किताब है।अंग्रेजी में यह ´एज आफ कैपीटल´नाम से प्रकाशित है।
     एरिक हॉब्सबाम ने´´पूंजी का युग´´(इतिहास 1848-1875) में लिखा ´बुर्जुआ समाज की विजय जितनी विज्ञानके अनुकूल थी,उतनी कला के लिए नहीं रही।´ यह सच है बुर्जुआ समाज के जन्म के साथ विज्ञान के क्षेत्र में सबसे तेजगति से विकास होता है लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि लेखकों-कलाकारों के अंदर व्यक्तिवादी मूल्यों के विकास के कारण साहित्य को नित नई ऊँचाईयों को स्पर्श करने का मौका मिला,इसके अलावा छापे की मशीन के आने के साथ ही साहित्य का लोकतांत्रिकीकरण हुआ। रचना के केन्द्र में मनुष्य आया और ईश्वर की विदाई हुई।कमोबेश यह प्रक्रिया हर देश में बुर्जुआ समाज के उदय के साथ घटित हुई।साहित्य और कला के मध्यकालीन मूल्यों की जगह नए आधुनिक कला मूल्यों का जन्म हुआ।
      एरिक हॉब्सबाम की कृति ´पूंजी का युग´कई मायनों में महत्वपूर्ण है।इस किताब में ´पूंजी´ को आधार बनाकर आधुनिककालीन राजनीतिक-आर्थिक और कलागत परिवर्तनों की व्याख्या पेश की गयी है।यह किताब आधुनिककाल का वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य बनाने में मददगार साबित हो सकती है। इस पुस्तक का अनुवाद वंदना राग ने किया है,अनुवाद बेहतरीन है और पढ़ते हुए लगता ही नहीं है कि यह पुस्तक अनुदित है।हिंदी पत्रिका जगत की मुश्किल यह है कि विश्व विख्यात लेखकों की वैचारिक किताबें हिंदी में खूब छप रही हैं लेकिन उन पर चर्चा या उनके मूल्यांकन या पुस्तक समीक्षा के काम को साहित्यिक पत्रिका के संपादक उपेक्षा की नजर से देखते हैं।जबकि इस तरह की वैचारिक किताबों के बारे में व्यापक  चर्चा होनी चाहिए। इससे हिंदी के विचार-जगत और पाठक जगत को विश्व के वैचारिक विमर्श के साथ जोड़ने और आलोचना में छाई अवधारणाहीन बहसों से बचने में मदद मिल सकती है।
     इस किताब का सबसे रोचक पहलू है ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ तत्कालीन क्रांतियों के संबंध की खोज।´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ अज्ञात जर्मन लेखकों के नाम से 24फरवरी 1848 जर्मन में प्रकाशित होता है।बाद में इसे अंग्रेजी,फ्रेंच,इटालियन आदि अनेक भाषाओं में अनुदित करके छापा गया। हॉब्सबाम ने लिखा ´यह कहना सही होगा कि इसके राजनैतिक आग्रहों का जर्मन क्रांतिकारियों के छोटे तबके से बाहर बहुत कम प्रभाव रहा.अलबत्ता1870 के बाद प्रभाव बढ़ा.कुछही हफ्तों में और मैनीफेस्टो के प्रकाशन के कुछ ही घंटों बाद,मसीहाओं की आशाएं,आशंकाएं सब साकार होने को आईं.फ्रांसीसी राजशाही को बग़ावत के बाद सत्ता से अपदस्थ कर दिया गया.गणतंत्र राज्य की घोषणा कर दी गई और यूरोपीय क्रांति का आग़ाज हो गया।´
  ´आधुनिक दुनिया के इतिहास में कई महत्वपूर्ण क्रांतियां हुई हैं.कई क्रांतियां इससे अधिक सफल रही हैं.मगर जंगली आग की तरह इस तीव्रता से चारों ओर फैलने वाली,सरहदों, राज्यों, देशों और महासागरों के पार जाने वाली क्रांतियां कम ही हुई हैं´ दिलचस्प बात यह है 24 फरवरी को ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´प्रकाशित होता है और उसी दिन फ्रांस ने गणतंत्र राज्य की घोषणा की। हॉब्सबाम ने लिखा है ´दो मार्च तक क्रांति दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी,छह मार्च बवेरिया,ग्यारह मार्च बर्लिन,तेरह मार्च वियना और तत्काल ही हंगरी,अठारह मार्च मिलान और फिर इटली में फैल गई।´उल्लेखनीय है उन दिनों सबसे तेज संचार व्यवस्था  राथ्सचाइल्ड बैंक की थी ,वह भी पेरिस से वियना तक खबर पांच दिन से कम में नहीं पहुँचाती थी,लेकिन उससे भी तेज गति से क्रांति की आग चारों ओर फैल गयी।उन दिनों कुछ ही हफ्तों में यूरोप के दस से ज्यादा देशों में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ ही क्रांति हो गई।उस क्रांति के असर से कोई भी सरकारी तंत्र अपना अस्तित्व नहीं बचा पाया।अन्य क्षेत्रों में भी इसके निश्चित प्रभाव दिखाई दिए।हॉब्सबाम कहते हैं कि गंभीर अर्थों में यह वैश्विक क्रांति थी।इस क्रांति ने 1848 में यूरोप के विकसित और पिछड़े दोनों ही किस्म के देशों को प्रभावित किया।हालांकि यह क्रांति सबसे व्यापक थी लेकिन यह सबसे कम सफल साबित हुई.इसके घटित होने के 6माह के बाद ही यह भविष्यवाणी की जा सकती थी कि इसकी विश्वव्यापी असफलता निश्चित है.लगभग 18 महीनों बाद सिर्फ़ एक को छोड़ सारी अपदस्थ सत्ताएं वापस,दोबारा सत्ता पर काबिज़ हो चुकीं थीं। हॉब्सबाम के अनुसार ´1848 की क्रांतियां विलक्षण ढ़ंग से इस किताब से अपना रिश्ता जोड़ती हैं।´ एक क्रांतिकारी किताब के रूप में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´की सामाजिक-राजनीतिक ताकत का इससे एहसास होता है।हॉब्सबाम ने लिखा ´1848 की क्रांतियों के लिए व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है और राज्य,जनता तथा भौगोलिक क्षेत्रों की अलग पड़ताल ज़रूरी है।यहां यह संभव नहीं।फिर भी उन सभी लोगों में कुछ बातें सामूहिक रूप से थीं.यह समझा जा सकता है.सिर्फ़ यह नहीं कि उनके घटित होने का समय एक था,बल्कि यह भी कि उनका एक साझा मिज़ाज था और एक साझा शैली थी.वह एक रहस्यमय-यूटोपियन माहौल था और उससे मिलता-जुलता आडंबरपूर्ण वक्तृत्व था´, ´शुरूआती दौर में स्वतंत्र होने का एहसास,जबर्दस्त आशा और आशावादी भ्रम.यह लोगों का वसंत था-और ठीक वसंत की तरह,स्थायी नहीं था इसलिए दीर्घायु नहीं हो पाया।´इन सभी क्रांतियों की प्रमुख साझा बात थी ´कि वे सब विजयी हुए फिर जल्द ही पराजित हुए´,´शुरूआती दिनों में ज़्यादातर क्रांति के क्षेत्रों की सरकारें या तो पूरी तरह ध्वस्त हुई हैं या असमर्थता की शिकार हुईं.सारी सरकारें बिना चुनौती के समर्पण कर गईं।अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय में क्रांतियों ने अपनी पहलकदमी खो दी।´ अगस्त 1849 तक फ्रांस को छोड़कर सभी देशों में क्रांति मृतप्रायः हो गई। ´सारे पुराने सत्ताशाली अपनी सत्ताओं पर विराजमान हो चुके थे,कई जगहों पर पहले की अपेक्षा और शक्तिशाली अंदाजों में,क्रांतिकारी निर्वासित हो इधर-उधर बिखर गए थे.सारे संस्थागत बदलाव,सारे राजनैतिक और सामाजिक स्वप्न,जो1848 के वसंत में देखे गए थे,वे सारे के सारे नेस्तनाबूत हो चुके थे।´
      ´पूंजी के युग´ ने कला और साहित्य के क्षेत्र में जिन चीजों को जन्म दिया वे पहले के किसी भी युग में संभव नहीं थीं।यह सच है आधुनिककाल के पहले बहुत कुछ बेहतरीन साहित्य और दर्शन लिखा गया,उच्च कोटि के स्थापत्य और कला रूपों का निर्माण हुआ।लेकिन उन सबके बनाए मानकों और मूल्यों के दायरे और लेखकीय दायित्वों को आधुनिककाल में लेखक ने नए सिरे से परिभाषित किया। ´पूंजी के युग´ की केन्द्रीय विशेषता है हर चीज को बार-बार परिभाषित करना ।यहां तक कि तयशुदा चीजों,परिभाषाओं,संबंधों आदि को भी बार-बार परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है,इसने साहित्य में ´समकालीनता´की धारणा को जन्म दिया।पहले साहित्य तो था लेकिन ´समकालीनता´ की धारणा नहीं थी।पहले लेखक नैसर्गिक भाव से लिखता था अब उसमें नया तत्व जुड़ा ´समकालीनता´।नए युग की रूचियां,स्वाद और मूल्य  ´समकालीनता´से प्रभावित थे।यह सच है कि कलाओं और साहित्य में गुणवत्ता के लिहाज से गिरावट आई,लेकिन ´उपन्यास´विधा के जन्म ने साहित्य के समूचे संसार को ही बदल दिया।
     ´पूंजी के युग´की महानतम साहित्यिक उपलब्धि है उपन्यास।हॉब्सबाम ने उपन्यास के बारे में लिखा ´साहित्य-उपन्यास के माध्यम से पोषित हुआ।यह एक ऐसा फार्म था जो बुर्जुआ समाज के उद्भव एवं अंतर्द्वद्वों से मुठभेड़ कर अपनी बात सक्षम ढ़ंग से रख रहा था।´ उल्लेखनीय है पुराने विधा रूपों नाटक,काव्य,महाकाव्य आदि में नए बुर्जुआ समाज को अभिव्यक्ति करने की साहित्यिक क्षमता ही नहीं थी,उपन्यास के जन्म के साथ पूर्व के सभी विधारूपों के चरित्र में उपन्यास की संगति में बदलाव आए।उल्लेखनीय है उपन्यास ,साहित्य की विभिन्न विधाओं में से एक विधा नहीं है।बल्कि यह विधाओं का राजा है।उसने अपने जन्म के साथ यह घोषणा की कि पहले से प्रचलित विधाएं अपने चरित्र को बदलें और उपन्यास की संगति में अपना विकास करें,जो विधा यह नहीं कर पाएगी वह अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है।सन् 1848 के बाद शहरों और भवनों की संरचनाओं और स्थापत्य में बदलाब आया।भवन निर्माण कला को राजसी और आध्यात्मिक भवन कला के दायरे बाहर लाया गया।अब स्थापत्य कला के क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष और नागरिकबोध संपन्न इमारतों का जन्म हुआ। पहले वाले भवन पुराने किलों और राजसी वैभव के प्रतीक हुआ करते थे लेकिन नए भवन –स्थापत्य के केन्द्र में इसके लिए कोई जगह ही नहीं थी।
     हॉब्सबाम के अनुसार ´वियना शहर के पुराने किलों और दीवारों को 1850 के वर्षों में ढहा दिया गया और उससे उपजी ख़ाली जगहों में शानदार चक्करदार सड़कें बनाकर उनके पास बड़े भवनों को निर्मित कर दिया गया।वे कौन -से भवन थेॽ वे क्या थे ॽ एक स्टॉक एक्सचेंज(विनिमय-बाज़ार) का प्रतिनिधि था,दूसरा धर्म का (वोतिवखीशें),तीन उच्च शिक्षण संस्थान ,नागरिक सुविधा और सार्वजनिक मसलों से जुड़े प्रशासनिक भवन थे जैसे शहर की नगरपालिका,न्यायपालिका तथा संसद के महल, और लगभग आठ थिएटर संग्रहालय,शिक्षण-संस्थान आदि थे।´
     यह असल में बुर्जुआजी के विनीत भाव की अभिव्यक्ति का युग भी है।इस प्रक्रिया में बाजार भी बदला,नए किस्म के बाजार का जन्म हुआ।नए विस्तृत और वैभवशाली बाजार ने जन्म लिया।19वीं सदी में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों ने इन सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।जनोत्पादन और जनोपभोग को नई ऊँचाईयां मिलीं।हर स्तर पर ये दोनों प्रवृत्तियां नजर आने लगीं।जनोत्पादन के कारण हर चीज सस्ते और पुनरूत्पादित रूप में सामने आई।पुनरूत्पादन की तकनीक ने साहित्य,पत्रकारिता,शिक्षा आदि में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।इन क्षेत्रों का लोकतांत्रिकीकरण हुआ।साथ ही कलाओं और साहित्य में अवमूल्यन के तत्व का भी प्रवेश हुआ।पहले कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन नहीं होता था लेकिन नए युग में तेजी से कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन होने लगा।तकनीकी विकास ने साहित्य और कला के आभामंडल को छिन्न-भिन्न कर दिया।पहले लेखक राज्याश्रित था,उसके ही सहारे आजीविका के लिए जिंदा था लेकिन नए ´पूंजी के युग´में वह ´पूंजी´पर आश्रित था,´पूंजी´के नियमों से संचालित था।हॉब्सबाम ने लिखा है ´कला अपने स्वरूप में वैभवशाली और धन का उपार्जन करने वाली थी।सर्जनात्मक प्रतिभा जन-मानस को आकर्षित करती थी और स्तरहीन भी नहीं थी´, ´हम उन लोगों को खोज सकते हैं,जो बुर्जुआ समाज के प्रतिरोध में खड़े  या उन्हें हतप्रभ करने की योजना बना रहे थे।या उन लोगों को भी जो ग्राहक खोजने में असफल रहे। यह विशेषतया फ्रांस में हुआ।´
    ´पूंजी के युग´ में एक नए किस्म के कलाबोध,जीनियस और व्यक्तिगत-उद्यम को जन्म दिया।हॉब्सबाम के अनुसार ´इस दौर में स्त्री-पुरूष वस्तुओं से सुविधासंपन्न हो रहे थे और साथ ही सम्मान भी पा रहे थे।राजसत्ताओं,रजवाड़ों और कुलीन-वर्ग के समाज में कलाकार सज्जा प्रदान करनेवाला व्यक्ति ही नहीं था,बल्कि स्वयं सज्जा का पर्याय बन राजदरबार में उपस्थित रहता था अथवा महंगी विलासिता प्रदान करने वाली वस्तुओं का देयकर्ता होता था,जैसे केश-सज्जा करनेवाले,पोशाक बनानेवाले जिनकी आवश्यकता फ़ैशनेबल लोगों को बनाए रहती थी।बुर्जुआ समाज के लिए वह ´जीनियस´(विलक्षण) था,जो दरअसल व्यक्तिगत उद्यम का ग़ैर-वित्तीय संस्करण था।वह एक ऐसा ´आदर्श´था जो भौतिक सुख-सुविधा को ताज मुहैय्या कराता था और साथ ही आध्यात्मिक  मूल्यों को भी जिलाए रखता था।´
    ´पूंजी के युग´में कला की नई समझ पैदा हुई,जिसके तहत कहा गया कि कला को संपूर्ण मांगों का पूर्तिकर्ता होना चाहिए।पारंपरिक धर्म की जगह पढ़े-लिखे स्वतंत्र लोगों के बीच उसने अपने लिए जगह हासिल कर ली।इस वर्ग को हम मद्यमवर्ग के रूप में जानते हैं।यह इस युग का नया वर्ग था।इसके अलावा नए वर्ग के रूप में मजदूरवर्ग सबसे ताकतवर वर्ग के रूप में  जन्म लेता है।साहित्य में इन दोनों वर्गों की पक्षधरता,जीवनदृष्टि और चित्रण को लेकर सबसे ज्यादा लिखा गया।इस तरह के लेखन में बुर्जुआ और मजदूरवर्ग के आत्मविश्वास से भरपूर नजरिए का जमकर चित्रण हुआ। ´आत्मविश्वास´ इस दौर की सबसे बड़ी लेखकीय पूंजी है।
    ´पूंजी के युग´ में सृजन के हर क्षेत्र में एक ही प्रश्न छाया हुआ था ,वह था ´यह आखिर है क्या ´,यह इस युग का जायज सवाल है।इसके ही गर्भ से यथार्थवाद का जन्म हुआ। ´यथार्थ´ और ´जीवन´ को लेकर साहित्य और अन्य कला रूपों में सबसे ज्यादा वैचारिक-सर्जनात्मक बहसें हुईं। ´शाश्वत साहित्य´ की धारणा का अंत हुआ, ´साहित्य´की नई धारणा का उदय हुआ,साहित्य का मतलब ही है परिवर्तन,समाज और साहित्य की अंतर्क्रियाओं को समझने की ओर ध्यान गया और यह मान लिया गया कि जिस तरह समाज प्रतिक्षण बदलता है वैसे ही साहित्य भी बदलता है।इसी प्रकार पहले लेखक महत्वपूर्ण था लेकिन ´य़थार्थवाद´के युग में लेखक को हल्का बनाया गया और ´य़थार्थवाद´को प्रमुख और वजनी बनाया गया।पुराना साहित्य अतीत से जोड़ता था,नए युग का साहित्य भविष्य से जोड़ता है,यह बुनियादी अंतर हरेक कला रूप में अभिव्यंजित हुआ।
     सन् 1848 का कला और साहित्य पर राजनैतिक दृष्टि से असर यह हुआ कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना कला संभव ही नहीं थी।इस दौर में ´जो आंखें देखती हैं´,नारे के तहत साहित्य और फोटोग्राफी के बीच एक नए रिश्ते की शुरूआत हुई।वास्तविकता भी यही थी कि ’पूंजी के युग´की नायिका है फोटोग्राफी और नायक है उपन्यास।ये दोनों मिलकर समूचे समाज को वृहत्तर स्तर पर प्रभावित करते हैं।इस दौर के बारे में हॉब्सबाम ने लिखा ´बदलाव,तकनीकी ईजादों ,तथा विषयवस्तुओं को लेकर समकालीनता नए अर्थ गढ़ती है।´ इस प्रक्रिया में रचना में एक नए गुण का समावेश होता है वह है ´वर्तमान´।अब कला,साहित्य, राजनीति,दर्शन आदि को ´वर्तमान´की कसौटी पर रखकर परखा जाने लगा।साहित्य और जीवन, कला और जीवन, दर्शन और जीवन के बीच मौजूद महा-अंतराल का इसने अंत कर दिया।
पुस्तक का नाम- पूंजी का युग
लेखक-एरिक हॉब्सबाम
अनुवाद-वंदना राग
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन,मुंबईःमेरठ।  
(इंद्रप्रस्थ भारती मेंप्रकाशित)

जेएनयू में भाजपा का आतंकराज


           जेएनयू में भाजपा-आरएसएस के आतंक और उत्पीड़न के नए युग की शुरूआत हो चुकी है। मोदी सरकार  आने के साथ यह तय कर लिया गया था कि जेएनयू और खासकर वहाँ के छात्रसंघ को हर हालत में ध्वस्त किया जाएगा,इसके लिए सबसे पहले वामपंथ के साथ जेएनयू को जोड़ा गया, जेएनयू को देशद्रोहियों और आतंकियों के साथ जोड़ा गया,इस लाइन पर सारे देश में आरएसएस ने मीडिया अभियान चलाया, दूसरे चरण के तौर पर फ़रवरी २०१६ की घटना को षड्यंत्र करके बडे इवेंट के रुप में सजाया गया और उसके सारे विस्तृत एक्शन प्लान को बनाकर केन्द्र सरकार,दिल्ली पुलिस ,संघ की साइबर वाहिनी और आरएसएस मुख्यालय के संयुक्त तत्वावधान में चलाया गया,इसके लिए लठैतों के रुप में वकीलों और पूर्व सैनिकों की मदद भी ली गयी।उस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष सहित कई छात्रों पर राष्ट्रद्रोह के झूठे मुक़दमे भी लगाए गए।उसके समानान्तर  विश्वविद्यालय के अंदर छात्रों और शिक्षकों का एक समूह तैयार किया गया जिसका काम है जेएनयू के बारे में अफ़वाहें फैलाना, जेएनयू के अकादमिक चरित्र और कैंपस के परिवेश को प्रदूषित करना,छात्र-छात्राओं को बदनाम करना,जेएनयू की परंपराओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को ध्वस्त करना और उपकुलपति जगदीश कुमार की तानाशाही का समर्थन करना।
         आरएसएस के जेएनयू मॉडल में निशाने पर पहले दिन से जेएनयू छात्रसंघ है।किसी न किसी बहाने से विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ पर रोज हमले कर रहा है, बडी संख्या में आंदोलनकारी छात्रों पर शांतिपूर्ण जुलूस निकालने,धरना देने आदि के लिए बडी मात्रा में जुर्माने लगाए जा रहे हैं , छात्रों के रजिस्ट्रेशन खारिज किए जा रहे हैं,छात्रों को शांतिपूर्ण प्रतिवाद करने से रोका जा रहा है। 

     फ़रवरी २०१६ की घटना के समय कन्हैया कुमार और उनके साथियों को दण्डित करते समय यह कहा गया कि इन लोगों ने देशद्रोही नारे लगाए इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई की गयी, लेकिन आज तक देशद्रोही नारे लगाने से संबंधित प्रमाण जेएनयू प्रशासन ने पेश नहीं किए, दिल्ली पुलिस ने कन्हैया कुमार और दूसरे छात्रनेताओं पर देशद्रोह का झूठा मुक़दमा लगाया था उसके प्रमाण भी आजतक दिल्ली के अदालत में पेश नहीं किए,यहां तक कि आज तक चार्जशीट तक  दाखिल नहीं की ।इस तरह के आतंक के बाद भी पिछले जब छात्रसंघ के चुनाव हुए तो जेएनयू के छात्रों ने वाम संगठनों के नेतृत्व में आस्था व्यक्त की और आरएसएस के अखिल विद्यार्थी परिषद और उनके दुमछल्ले जाति छात्र संगठनों को बुरी तरह परास्त किया।इस पराजय को जेएनयू प्रशासन ने अपनी निजी पराजय समझा और तब से मौजूदा छात्रसंघ पर अकारण हमले तेज कर दिए गए, जेएनयू में एमफिल् पीएचडी के दाख़िले बंद कर दिए गए,यह काम किया गया यूजीसी के सर्कुलर के बहाने, जबकि जेएनयू में एमफिल् पीएचडी दाख़िले के स्वतंत्र नियम हैं जिनके आधार पर वहाँ दाख़िले होते हैं।जेएनयू के इतिहास में यह पहलीबार हुआ कि एमफिल् पीएचडी में अविवेकपूर्ण आधार पर प्रचलित दाख़िला नीति को बदल दिया गया।इससे जेएनयू के अकादमिक चरित्र को भारी नुकसान पहुँचा, सैंकडों प्रतिभाशाली छात्रों को जेएनयू में शोध करने से वंचित कर दिया गया।
             मौजूदा छात्रसंघ के नेताओं पर अकारण मोटा जुर्माना लगाया गया और जुर्माना अदा न करने की अवस्था में उनके नियमित रजिस्ट्रेशन को बाधित करके उनके नियमित छात्र के रुप में पढने के अधिकार को छीन लिया गया।ये वे नेता हैं जिन्होंने न तो वीसी को गाली दी, न कैंपस में हिंसा की और न देशद्रोहियों के पक्ष में नारे लगाए।इनका अपराध यह था कि इन्होंने कैंपस में वीसी ऑफ़िस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। यानी जेएनयू में अब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना भी अपराध है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसके कारण जेएनयू में फिर से अशांति पैदा कर दी गयी है ,छात्रनेताओं के खिलाफ इस तरह की दण्डात्मक कार्रवाई के निशाने पर आने वाले छात्रसंघ चुनाव हैं, प्रशासन चाहता है कि जेएनयू के छात्र वामपंथियों को वोट न दें, आरएसएस का बुनियादी तर्क यही है कि जेएनयू की अशांति की जड़ में वामसंगठन हैं अत:उनको वोट मत दो । यदि वामसंगठनों के नेताओं को जिताओगे तो जेएनयू प्रशासन उनको काम नहीं करने देगा , दाख़िले से वंचित करेगा।ऐसी अवस्था में जेएनयू के छात्रों को तमाम राजनीतिक मतभेद भुलाकर जेएनयू प्रशासन और आरएसएस के खिलाफ एकजुट संघर्ष चलाना चाहिए। इस तरह के दमन और उत्पीड़न का एकमात्र प्रत्युत्तर है शांतिपूर्ण एकजुट संघर्ष।जेएनयूएसयू मार्च ऑन!

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

जय श्री राम और खोखले हम


       जय श्री राम, जै माई जी की, राधे राधे, जय श्री कृष्ण , राजाधिराज की जय आदि सम्बोधन सूचक नारे हैं।ये खोखले नारे हैं।ये जिन प्रतीकों-मिथों से जुड़े हैं उनमें सामाजिक सक्रियता पैदा करने की क्षमता नहीं है।

आधुनिककाल और आधुनिक समाज में जब इन नारों के जरिए नमस्कार-प्रणाम करते हैं तो अवचेतन में बैठे धार्मिक मन को अभिव्यक्त करते हैं।इससे यह भी पता चलता है आप आधुनिक नहीं बने हैं।

आधुनिक बनने के लिए आधुनिक सम्बोधनों का इस्तेमाल करना चाहिए,उससे आधुनिक संवेदनशीलता और अनुभूति के निर्माण में मदद मिलती है।

मसलन्, जब हलो कहते हैं तो आधुनिक मन को व्यक्त करते हैं लेकिन ज्योंही फोन पर राधे राधे कहकर सम्बोधित करते हैं तो धार्मिक चेतना को व्यक्त करते हैं।

जय श्री राम का नारा कोई क्रांतिकारी नारा नहीं है, कोई ऐसा नारा नहीं है जिसके कारण देश प्रगति की दिशा में छलांग लगाकर चला गया हो,बमबटुकों को यहनारा पसंद है।

बुनियादी तौर पर यह अर्थहीन नारा है, खोखला नारा है।इसमें कुछ करने की क्षमता का अभाव है। यह परजीवी समाज का नारा है।इसका न तो लोकतंत्र से संबंध है और न विकास से संबंध है, और न इसका रामाश्रयी धार्मिक परंपरा से संबंध है।यह बाबरी मसजिद विध्वंस के दौर में चर्चित हुआ नारा है। इसका ऐतिहासिकता,धर्म,परंपरा और भाईचारे से तीन -तेरह का रिश्ता है।



यह नारा जितनी बार लगा है उसने नागरिक की अस्मिता को क्षतिग्स्त किया है और व्यक्ति की बजाय धर्म की पहचान को उभारा है।इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रतिगामिता और कुंठा की अभिव्यक्ति है।

उठो और जागोःसंवैधानिक मान्यताएं खतरे में हैं

         बिहार के घटनाक्रम को मात्र भ्रष्टाचार का मामला न समझें।नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार कई स्तरों पर संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं को नष्ट करने का काम कर रही है।अफसोस की बात है आम लोगों को यह नजर ही नहीं आ रहा।हो सकता है लालू यादव के परिवार ने भ्रष्टाचार किया हो लेकिन उससे लड़ने और निबटने के लिए महागठबन्धन को तोड़ना तो गले नहीं उतरता।

महागठन्धन जब बना था तब भी बिहार और लालू के परिवार में भ्रष्टाचार था,लेकिन एक अंतर था,महागठबंधन का निर्माण साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था।उसके उद्देश्यों में कहीं पर भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं है।लेकिन बिहार में चीजें जिस तरह संचालित की गयी हैं, न्यायपालिका की देश में जिस तरह खुली अवहेलना हो रही है, संसदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर जिस तरह हंगामे किए जा रहे हैं,मीडिया को सत्य और विवेक की हत्या के लिए जिस तरह नग्नतम रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है वह अपने आपमें विरल घटना है।

बिहार में जदयू का महागठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ सरकार बनाना ,कोई साधारण घटना नहीं है।यह घटना संकेत है कि संसदीय लोकतंत्र और जनादेश की हमारे नेताओं में कोई इज्जत नहीं है। उल्लेखनीय है इस तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन बिहार हर मामले में अजूबा है,इसबार समूचे जनादेश को ही पलट दिया गया । बिना दल-बदल के समूचे जदयू का स्वैच्छिक भाव से राजनीतिक मन परिवर्तन करके रख दिया गया है। मात्र कुछ एफआईआर के बहाने, कुछ छापों के बहाने यह सब हुआ है।इसका अर्थ यह भी है कि मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक किसी के मन में जनादेश को लेकर कोई वचनवद्धता नहीं है।

असल में मोदीजी ने समूची राजनीति में पैसे और सत्ता की भूमिका को महानतम बना दिया है।इस भूमिका को आमलोगों के जेहन में उतारने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। मोदी फिनोमिना की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब भाजपा कहीं पर आंदोलन नहीं करती, सिर्फ मीडिया हमले करवाती है, संगठित प्रचार अभियान चलाती है और उसके बाद लक्ष्य को निशाना बनाकर गिरा देती है।भाजपा की समूची रणनीति यह है कि हर हालत में भाजपा और मोदी का वैचारिक-प्रशासनिक वर्चस्व मानो।इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद और मीडिया के हठकंड़ों का खुलकर प्रयोग हो रहा है।

भाजपा-मोदी का वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक बात आम लोगों के जेहन में उतारी जा रही है कि ´मोदी सही और बाकी गलत´,मोदी की मानो,चैन से रहो।मोदी की मनवाने के लिए पहले प्यार से घूस देकर फुसलाया जाता है, बाद में मीडिया के कोड़े लगवाए जाते हैं,अंत में प्रशासनिक हमले होते हैं।मसलन्,यदि आप विपक्ष में हैं तो पहले भाजपा कोशिश करती है कि आप उसके साथ चले जाएं,यदि साथ नहीं जाते तो दल-बदल कराया जाता है, दल-बदल से भी मामला न संभले तो मीडिया हमले कराकर बदनाम किया जाता है, तब भी न संभले तो सीबीआई-आईडी आदि के छापे और मीडिया से अहर्निश बदनामी करके हर एक्शन को देशहित, ईमानदारी की रक्षा में,जनता की सेवा में समर्पित कर दिया जाता है।इस समूची प्रक्रिया में सत्य क्या यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता ,सिर्फ मीडिया में जो बताया गया है वह महत्वपूर्ण रह जाता है।मीडिया के जरिए दिमागों की इस तरह की नाकेबंदी ने हमारे सोचने-समझने और स्वतंत्र रुप से फैसले लेने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी है।अब हम मीडिया में जो कहा जा रहा है उसे सत्य, न्याय, जनहित आदि के पैमानों पर नहीं परखते अपितु हमारी आदत हो गयी है कि मीडिया में जो कहा जा रहा उसे आँखें बंद करके मानने लगे हैं।

मोदी की मीडिया रणनीति की धुरी है ´घृणा´,कल तक हम मुसलमानों से नफरत कर रहे थे, विभिन्न किस्म के प्रचार अभियानों के जरिए इसे जेहन में उतारा गया,बाद में लवजेहाद के जरिए,कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ,घृणा के तत्व के आधार पर कांग्रेस विरोधी प्रचार संगठित किया गया, घृणा के आधार पर पाकविरोधी, आतंकविरोधी प्रचार चलाया गया और अब घृणा के आधार पर ही तेजस्वी यादव और उनके परिवारीजनों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया गया। घृणा के आधार पर मोदी विरोधियों पर हमले किए जा रहे हैं।´घृणा´के आवरण के रूप में भ्रष्टाचार विरोध का इस्तेमाल किया गया, लेकिन मूल चीज है ´घृणा´।कहने का आशय यह कि ´घृणा´के बिना मोदी से प्यार पैदा नहीं होता। मोदी के गुण क्या हैं, मोदी ने कौन सा अच्छा काम किया है, ये चीजें मोदी प्रेम का आधार नहीं हैं बल्कि ´घृणा´ही मोदी प्रेम का आधार है। इस ´घृणा´को हम हर मसले पर मीडिया प्रस्तुतियों में सक्रिय भूमिका अदा करते सहज ही देख सकते हैं। मसलन् , मीडिया वाले गऊ गुंडई से लेकर तेजस्वी प्रकरण तक इसे साफतौर पर देख सकते हैं।यानी ´घृणा´का इतने व्यापक मॉडल के रूप में भारत में प्रयोग विगत ढाई हजार सालों में कभी नहीं देखा गया।हमारे यहां ´घृणा´थी लेकिन नैतिक रूप में। एक वैचारिक अस्त्र के रूप में मोदी ने इसका आविष्कार करके देश को गहरे संकट में डाल दिया है।अब हम गलत में मजा लेने लगे हैं,गलत हमें अच्छा लगने लगा है।यह ´घृणा´के मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।´घृणा´के मॉडल की विशेषता है सभी किस्म के तर्क और विवेक का अंत। मोदी के व्यक्तित्व के सामने आज हम इस कदर अभिभूत हैं कि किसी भी चीज को वास्तव रूप में देखना ही नहीं चाहते।वास्तव से नफरत करने लगे हैं।





मंगलवार, 25 जुलाई 2017

आरएसएस को जेएनयू पर गुस्सा क्यों आता है -



जेएनयू पर एकबार फिर से बमबटुकों के हमले शुरू हो गए हैं। फ़रवरी 2016 के बाद यह हमलों का दूसरा चरण है।जेएनयू वीसी ने आरएसएस के नेतृत्व के आदेश के बाद ही टैंक लगाने का प्रस्ताव रखा है।वीसी के बयान के बाद संघ के साइबर टट्टू सोशलमीडिया में अहर्निश दौड़ रहे हैं और जेएनयू को गरियाने में लगे हैं। हम कहना चाहते हैं कि जेएनयू सच में महान है वरना बार -बार संघ हमले न करता। जेएनयू महान वाम की वजह से नहीं है, बल्कि विवेकवादी उदार अकादमिक परंपरा के कारण महान है।
      संघ अपनी नई टैंक मुहिम के बहाने जेएनयू के बारे में  यह धारणा फैलाने की कोशिश कर रहा है कि जेएनयू को मानवताविरोधी और राष्ट्रविरोधी संस्थान के रूप में कलंकित किया जाय।पहले हम यह जान लें कि जेएनयू को ये लोग नापसंद क्यों करते हैं? देश में और भी विश्वविद्यालय हैं उनको बदनाम करने की कोई मुहिम नहीं चल रही, क्योंकि वे सब संघ और टैंक कल्चर के क़ब्ज़े में हैं ! 
    आरएसएस की जेएनयू के प्रति घृणा का प्रधान कारण है जेएनयू के शिक्षक-छात्र संबंध।जेएनयू में देश के अन्य विश्वविद्यालयों के जैसे शिक्षक -छात्र संबंध नहीं हैं। यहां अधिकांश शिक्षक अपने छात्रों को मित्रवर मानकर बातें करते हैं।ज़्यादातर शिक्षकों के अकादमिक आचरण में पितृसत्तात्मकता नजरिया नहीं है।यहां वे शिक्षक होते हैं गुरू नहीं।यह वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से जेएनयू अन्य विश्वविद्यालयों  से अलग है। 
   दूसरी बडी चीज है सवाल खड़े करने की कला , यह कला यहां के समूचे माहौल में है।यहां छात्र सवाल करते हैं साथ ही "खोज" के नजरिए को जीवन का लक्ष्य बनाते हैं।कक्षा से लेकर राजनीतिक मंचों तक कैंपस में सवाल करने की कला का साम्राज्य है , यह  दूसरा बडा कारण है जिसके कारण जेएनयू को आरएसएस नापसंद करता है।आरएसएस को ऐसे कैंपस चाहिए जहाँ छात्रों में सवाल उठाने की आदत न हो , खोज करने की मानसिकता न हो।उल्लेखनीय है जिन कैंपस में सवाल उठ रहे हैं वहीं पर संघ के बमबटुकों के साथ लोकतांत्रिक छात्रों और शिक्षकों  का संघर्ष हो रहा है। 
       आरएसएस ऐसे छात्र -शिक्षक पसंद करता है जो हमेशा "जी जी "करें और सवाल न करें !आरएसएस वाले अच्छी तरह जानते हैं कि जेएनयू के छात्र वामपंथी नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं जेएनयू के अंदर संघ की शिक्षकों में एक ताकतवर लॉबी है।इसके बावजूद वे जेएनयू के बुनियादी लोकतांत्रिक चरित्र को बदल नहीं पा रहे हैं।यही वजह है  वे बार -बार हमले कर रहे हैं।इन हमलों के लिए नियोजित ढंग से मीडिया का दुरूपयोग कर रहे हैं।राष्ट्रवाद और हिंदुत्व तो बहाना है।असल में जेएनयू के लोकतांत्रिक ढाँचे और लोकतांत्रिक माहौल को नष्ट करना है। संघ को लोकतांत्रिक माहौल से नफरत है उसे कैंपस में अनुशासित माहौल चाहिए जिससे कैंपस को भोंपुओं और भोंदुओं का केन्द्र बनाया जा सके।
     जेएनयूछात्रसंघ और छात्रसंघ का संविधान तीसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज है जिसे आरएसएस नष्ट करना चाहता है। जेएनयू अकेला विश्वविद्यालय है जहाँ छात्रसंघ पूरी तरह स्वायत्त है ,छात्रसंघ के चुनाव स्वयं छात्र संचालित करते हैं,छात्रसंघ के चुनाव में पैसे की ताकत की बजाय विचारों की ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। छात्रों को अपने पदाधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार है।छात्रसंघ किसी नेता की मनमानी के आधार पर काम नहीं करता बल्कि सामूहिक फैसले लेकर काम करता है।छात्रसंघ की नियमित बैठकें होती हैं और उन बैठकों के फैसले पर्चे के माध्यम से छात्रों को सम्प्रेषित किए जाते हैं। छात्रसंघ के सभी फैसले सभी छात्र मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। विवादास्पद मसलों पर छात्रों की आमसभा में बहुमत के आधार पर बहस के बाद फैसले लिए जाते हैं।ये सारी चीजें छात्रों ने बडे संघर्ष के बाद हासिल की हैं इनके निर्माण में वाम छात्र संगठनों की अग्रणी भूमिका रही है।जाहिरातौर पर आरएसएस और बमबटुकों को इस तरह के जागृत छात्रसंघ से परेशानी है और यही वजह है बार बार छात्रसंघ पर हमले हो रहे हैं। इसके विपरीत आरएसएस संचालित छात्रसंघों को देखें और उनकी गतिविधियों को देखें तो अंतर साफ समझ में आ जाएगा।
        जेएनयू में टैंक कल्चर के प्रतिवाद की परंपरा रही है। टैंक कल्चर वस्तुत: युद्ध की संस्कृति को अभिव्यंजित करती है। जेएनयू के छात्रों का युद्धके प्रतिवाद का शानदार इतिहास रहा है।इस्रायल के हमलावर रूख के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर वियतनाम युद्ध के प्रतिवाद तक, अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर तियेनमैन स्क्वेयर पर चीनी टैंक दमन के प्रतिवाद तक छात्रों के सामूहिक प्रतिवाद की जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा रही है।जेएनयू के छात्रों को मानवतावादी नजरिए से सोचने-समझने और काम करने की प्रेरणा वहाँ के पाठ्यक्रम से मिलती रही है जिसे आरएसएस पसंद नहीं करता।

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

नए राष्ट्रपति का उदय और संघ की नई रणनीति-

         रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के साथ ही आरएसएस का देश के सर्वोच्च का शिखर पर पहुँचने का सपना पूरा हो गया।यह संघ का बाल स्वप्न था। इस सपने में अनेक अंतर्विरोधी चीजें शामिल हैं। इनको सिलसिलेबार ढ़ंग से समझें। पहली बात यह कि कोविंद का राष्ट्रपति बनना ,दलित वोटबैंक राजनीति में कोई मदद नहीं करेगा।क्योंकि इस पदपर दलित को बिठाकर कांग्रेस को कोई दलित वोट नहीं मिला।दूसरी बात यह कि कोविंद के राष्ट्रपति बनने के पहले से ही सुरक्षित सीटों पर भाजपा की बेहतर स्थिति रही है।इसलिए आरक्षित सीटों में 19-20 का अंतर ही आएगा।
एक अन्य भय पैदा किया जा रहा है कि भारत का संविधान अब सुरक्षित नहीं है। यह भय निराधार है। भारत में मौजूदा स्थिति में आरएसएस का लक्ष्य संविधान नहीं है बल्कि सत्ता है और सत्ता की विभिन्न संरचनाओं को वे अपने अनुसार चलाने की कोशिश करेंगे। संविधान परिवर्तन करना इनके बूते के बाहर है और यह फिलहाल लक्ष्य नहीं है।
आरएसएस की मौजूदा मुहिम को दक्षिणपंथी क्रांति कहना समीचीन होगा।यह ऐसी क्रांति है जिसके बनियान और अंडरबियर आरएसएस के हैं और ऊपरी सभी कपड़े कांग्रेसी हैं। मोदी सरकार पूरी निष्ठा के साथ नव्य आर्थिक नीतियों को लागू कर रही है।इससे यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि संघ के लोग देशी नीति को लागू करने में विश्वास करते हैं।आरएसएस ने अपने स्वदेशी जागरण मंच के जरिए जितनी भी घोषणाएं की थीं उन सबको मोदी सरकार के जरिए कब्रिस्तान पहुँचा दिया है।
कोविंद के सत्तारूढ़ होने से आरएसएस की धर्मनिरपेक्षताविरोधी इमेज को कुछ हद तक साफ करने में मदद जरूर मिलेगी। आरएसएस के लोग केन्द्र की सत्ता में लंबी पारी खेलने के मूड में हैं। लेकिन मोदीजी के निजी रूख और नजरिए ने आरएसएस की लंबी पारी खेलने की आशाओं पर वैसे ही पानी फेर दिया है जैसे मनमोहन सिंह ने गांधी परिवार के सत्तारूढ़ होने के सपनों पर पानी फेरा था।
कोविंद-नायडू-सुमित्रा महाजन ये तीनों उस इलाके से आते हैं जहां आरएसएस कमजोर है।मोदीजी ने चालाकी के साथ मजबूत इलाकों के नेताओं को संवैधानिक पदों पर नहीं आने दिया है।इससे आरएसएस की लंबी पारी खेलने की संभावनाएं धूमिल हो गयी हैं।
दूसरी एक बात और वह यह कि समाज और मीडिया में हिंदू राष्ट्रवाद के प्रधान एजेंडा बन जाने के बाद विकास का एजेंडा गायब हो गया है।जबकि 2014 का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया था,लेकिन 2019 में विकास नहीं हिंदू राष्ट्रवाद प्रधान मसला होगा और वैसी स्थिति में 2019 में मोदीजी की वापसी संभव नहीं है। मोदी के बाद सिर्फ दो विकल्प होंगे ,पहला देश फिर से उदारतावाद की ओर लौटे या मोदी से ज्यादा कट्टरपंथी को शासनारूढ़ करे।


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व्यापारीवर्ग बनाम नरेन्द्र मोदी के पंगे

नरेन्द्र मोदी को सत्ता पर बिठाने में देश के व्यापारियों और कारपोरेट घरानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।यह वर्ग विगत तीन सालों में मोदी सरकार की नीतियों के कारण किसी न किसी रुप में परेशान है,असंतुष्ट है और धीरे धीरे विभिन्न समूहों के तौर पर सड़कों पर प्रतिवाद के लिए निकल रहा है।मसलन्, विगत बजट के समय स्वर्ण व्यापारियों ने दो महिने तक आंदोलन किया, इधर विभिन्न स्तरों पर मांस के व्यापारी विरोध करते रहे हैं,नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों के मालिकों में गहरा असंतोष पैदा हुआ है।सबसे दिलचस्प है जीएसटी के विरोध में व्यापारियों का एक दिन का राष्ट्रीय बंद और उसके बाद कपड़ा व्यापारियों का सघन होता आंदोलन।ये सारी चीजें इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि मोदीजी को जो वर्ग सत्ता में लेकर आया उसी वर्ग के साथ अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए हैं।

दिलचस्प बात यह है व्यापारियों के जन- आंदोलन हो रहे हैं, विशाल रैलियां हो रही हैं,इस तरह की रैलियां हाल-फिलहाल के वर्षों में नजर नहीं आईं। मसलन् सूरत इन दिनों अशांत है।सूरत की अशांति को सामान्य रुटिन अशांति के रूप में न देखें। बल्कि उसे व्यापक फलक पर रखकर देखें कि किस तरह व्यापारियों के विभिन्न समूहों में मोदी सरकार के खिलाफ प्रतिवाद जन्म ले रहा है।वहीं दूसरी ओर मजदूरों-किसानों के आंदोलन भी हो रहे हैं। इन सबके कारण एक नए किस्म का प्रतिवादी राजनीतिक माहौल जन्म ले रहा है।



अनेक राजनीतिक विशेषज्ञ हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि मोदीजी 2019 में लौटकर फिर से सत्ता में आ रहे हैं। ये विशेषज्ञ भूल रहे हैं कि 2014 में मोदी के खिलाफ कोई असंतोष नहीं था बल्कि आशाएं जुड़ी हुई थीं।लेकिन 2019 तक मोदी के खिलाफ समाज के हर स्तर पर व्यापक असंतोष पैदा होगा,यह अनिवार्य है।कम से कम व्यापारियों के विभिन्न रूपों में हो रहे प्रतिवादों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।व्यापारी समुदाय यदि बार बार प्रतिवाद कर रहा है तो यह तय है समाज में अशांति बहुत गहरे जा घुसी है,इस अशांति को मीडिया प्रबंधन के जरिए संभालना संभव नहीं है।इंतजार करें जमीन पक रही है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदीजी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति

        मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है



मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



शनिवार, 1 जुलाई 2017

ठंडे समाज की सिहरन


       तमाम ठंड़े दिमाग के लोग यही कह रहे हैं मोदीजी उपकार करेंगे!आरएसएस देश का मान-सम्मान ऊँचा करेगा।दुनिया में जहां पर भी आरएसएस जैसे संगठनों के लोग सत्ता में आए हैं सरकार ,समाज और देश का मस्तक गर्व से ऊँचा ही हुआ है ! इसलिए आरएसएस के प्रति शत्रुभाव रखने की जरूरत नहीं है ! दंगों में लोगों का मारे जाना, गऊ रक्षकों के हाथों निर्दोष लोगों की हत्या,कश्मीर में चल रहा उत्पीड़न असल में उत्पीड़न नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक काम है जिसे इस देश को हर हालत में और खुशी खुशी संपन्न करना चाहिए ! हमें ठंड़े रहकर चीजों को देखना चाहिए। ठंड़े रहकर ही समाधान खोजने चाहिए।हमें ठंड़े रहकर जीने की कला हिमालय से सीखनी चाहिए।कितना ठंड़ा है और कितना ऊँचा है ! कितना निर्जन है !ठंड़ा समाज,ठंड़ा दिमाग और निर्जन समाज और हिमालय जैसी शांति और ठंड़क ही है जो भारत को महान बनाती है ! उसके मान-सम्मान में इजाफा करती है।

ठंड़ा रहना,ठंड़ा सोचना और सिहरन में काँपते रहना यही है 21वीं सदी के भारत का सच।आप ठंड़े हैं तो सुरक्षित हैं ! ऐसे बनो कि कभी पिघलो मत।चाहे जितनी चिंताएं दिखाई दें,आदमी तकलीफों में डूब जाए लेकिन ठंड़े रहो! गुलफाम रहो!गुलाम रहो!

कल्पना करो बार-बार उन ऐतिहासिक क्षणों के बारे में मोदी सरकार क्यों याद दिला रही है ॽ उन नेताओं के नामों और कामों का स्मरण क्यों कर रही है जिनके जमाने में समाज गर्म था ॽउन क्षणों में मोदी सरकार क्यों मौजूद दिखना चाहती है जो समाज के गर्म क्षण थे।

सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ तो समाज गर्म था,पटेल ने विभिन्न रियासतों का भारत में विलय कराया था तब भारत गर्म था।आम जनता के मन में आशा और उमंगों की हिलोरें उठ रही थीं ,समाज में गर्म हवाएं चल रही थी, हर आदमी बेचैन था।यानी आज के ठंड़े माहौल से पुराने वाले माहौल की विलोम के रूपमें ही तुलना संभव है।कांग्रेस सत्ता के शिखर पर थी संसद में छाई हुई थी,आरएसएस संसद के बाहर था, लेकिन कल कांग्रेस संसद के बाहर खड़ी थी, कल आरएसएस ने संसद को घेरा हुआ था,सन् 47 में वे मुखबिर थे,आज वे देश के संरक्षक हैं,पहले वे गांधी के परमशत्रु थे ,आज वे गांधी के परमभक्त हैं! सन् 47 में कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन आज वे राजनीतिक प्रक्रिया के बाहर खड़े हैं। सन्47 के समाज में गर्म ऊर्जा थी,सन्2017 के समाज में सारी ऊर्जा ठंड़ी पड़ी है।गर्म समाज और ठंडे समाज में यही अंतर है।गर्म समाज ने सुई से लेकर परमाणु बम तक सब चीजों का निर्माण किया,ठंड़े समाज ने मात्र एप का निर्माण किया।विज्ञापनों का निर्माण किया।गर्म समाज के पास कुर्बानी का जज्बा था,ठंड़े समाज के पास आराम के साथ जीने,परजीवी की तरह रहने की आदत है।गर्म समाज सोचता था ,ठंड़ा समाज भोक्ता है।

ठंड़े समाज की स्प्रिट के साथ सन्47 की स्प्रिट की तुलना करना बेवकूफी है।आप चाहकर भी वह स्प्रिट पैदा नहीं कर सकते।सन्47 में सारा देश संसद में था,सारे मत-मतान्तर संसद में थे,लेकिन सन्17 में तो सिर्फ एक ही मत संसद में था,गैर-मोदी मत-मतान्तरों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया।याद रखो ठंड़े समाज में हरकत नहीं होती।ठंडा शरीर हरकत नहीं करता।जो हरकत नहीं करता वह समाज का निर्माण नहीं करता।हिमालय से भारत नहीं, भारत बनता है हिमालय को तोड़कर ! हिमालय प्रगति का प्रतीक नहीं है बल्कि हिमालय को बदलना ही प्रगति है।अफसोस की बात है हम ठंड़े होते जा रहे हैं!हिमालय होते जा रहे हैं!हिमालय बनने या ठंड़े समाज बनने का अर्थ है सभ्यता को,समाज को,दिमाग को प्रकृति को गिरवी रखना,तय करो किस ओर हो हिमालय की ओर या मनुष्यता की ओर ! मनुष्यता की सारी उपलब्धियां वे हैं जो उसने हिमालय को तोड़कर हासिल की हैं,लेकिन ठंड़े समाज का अंग बनकर आप उपलब्धियां हासिल नहीं कर सकते लेकिन हिटलर हासिल कर सकते हैं !





शुक्रवार, 30 जून 2017

गुलाम संविधान को नहीं मानते


                नए दौर का सबसे खतरनाक पहलू है कि गुलाम विचारधारा में यकीन रखने वाले हमारे देश के उदारतावादी संविधान को नहीं मानते।वे संविधान प्रदत्त नैतिकता को ठुकराते हैं।एक जमाना था ब्रिटिश गुलामी से मुक्त होने के लिए देश में स्वाधीनता की आकांक्षा थी, गुलामी से मुक्त होने के लिए स्वाधीनता ,स्वतंत्रता और उदारतावाद को हमने गले लगाया, उससे जुड़े मूल्यों और नैतिकता को अपना कंठहार बनाया।लेकिन आपातकाल के बाद पैदा हुए युवावर्ग में देश के लिबरल संविधान के प्रति, उससे जुड़ी नैतिकताओं के प्रति नफरत पैदा हुई ,इस नफरत की जड़ में है धर्म और जाति आधारित गुलाम विचारधाराएं।

आपातकाल के बाद पैदा हुए समाज में युवा का आतंक है, आक्रामकता है,राजनीति में जिसका चमकता हुआ चेहरा नजर आ रहा है,यह वह युवा है जिसके पास किसी भी किस्म के लोकतांत्रिक मूल्यों और हकों के लिए संघर्ष करने का कोई अनुभव नहीं है। इसे सारी लिबरल मान्यताएं बिना संघर्ष के मिली हैं।यह युवा अपने निहित स्वार्थों में इस कदर डूबा है कि उसे लोकतांत्रिक मनुष्य, लोकतांत्रिक समाज और लोकतंत्र के निर्धारक मूल्यों और नैतिकता से ऩफरत है।वह अपनी जाति और अपने धर्म की श्रेष्ठता और उनकी सर्वोपरि भूमिका के नशे में डूबा है।हर चीज को जाति और धर्म के पैमाने पर कसकर देख रहा है।यहां तक कि संविधान को भी जाति और धर्म के पैमाने पर परखकर देख रहा है।कायदे से जाति और धर्म की श्रेष्ठता पर उसे शर्म आनी चाहिए,लेकिन जाति और धार्मिक पहचान के रूप उसे इस कदर पसंद हैं कि उनके अलावा वह कोई चीज सुनने को तैयार नहीं है। यह वह युवा है जिसे बिना कोई संघर्ष किए सभी लोकतांत्रिक हक मिले हैं,लेकिन वह लोकतांत्रिक हकों, लिबरल संविधानजनित मूल्यों और नैतिकता को ठेंगे पर रखता है।हर चीज को जाति और धर्म की भीड़चेतना के आधार पर तय करना चाहता है।फलतः लोकतंत्र को इसने भीड़तंत्र में तब्दील कर दिया है।आप जरा टीवी इमेजों में जाति और धर्म के नाम पर उठे आंदोलनों को देखिए और उनमें शिरकत करने वालों की उम्र देखिए तो पाएंगे कि इनमें अधिकांश युवा हैं।

राममंदिर आंदोलन,असम आंदोलन,आरक्षण विरोधी आंदोलन आदि से यह युवा अपनी नई अ-लोकतांत्रिक पहचान के साथ समाज में दाखिल होता है। उल्लेखनीय है इन आंदोलनों में आरएसएस की केन्द्रीय भूमिका थी। समग्रता में इन सभी आंदोलनों के जरिए एक ही संदेश गया है ´हम संविधान को नहीं मानते´ ,´संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकता को नहीं मानते।´इन आंदोलनों में शामिल युवाओं को संविधानप्रदत्त हकों का लाभ मिला लेकिन इन लोगों ने संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकताओं को मानने से इंकार किया। वे अपने को विभिन्न नामों से संबोधित करने में रुचि रखते हैं लेकिन ´लोकतांत्रिक´ या ´नागरिक´ कहलाने में इनकी कोई रुचि नहीं है,मसलन्, वे कहते हैं ´हम भारतीय हैं´,´हम भारतीय मुसलमान हैं´,´हम हिंदू हैं´,´हम ईसाई हैं´,´हम दलित हैं´,आदि, लेकिन वे अपने को लोकतांत्रिक या नागरिक कहने से परहेज करते हैं।लोकतंत्र में रहना, लोकतांत्रिक उदार संविधान के हकों का उपभोग करना और लोकतांत्रिक पहचान के ´नागरिक´ रूप में अपने को न देखना,यह सबसे बड़ी कमी है।इस कमी को हमारा देश जिस दिन पूरा कर लेगा उस दिन वह संविधान का सम्मान करना सीख जाएगा।

नागरिक की पहचान हमें गुलाम पहचान के रूपों से मुक्त करती है, एक बड़ा परिवेश देती है,नए लोकतांत्रिक असंख्य विकल्पों को जन्म देती है। लोकतांत्रिक आत्म-सम्मान पैदा करती है। आयरनी यह है हम नागरिक के गौरव में जीने की बजाय जाति और धर्मगत पहचान के आत्म-सम्मान में जीना पसंद करते हैं।इससे समाज में लोकतंत्र कमजोर हुआ है और उससे फासिज्म को मदद मिली है।आज जो युवा मोदी-मोदी का नारा लगा रहा है,यह वही युवा है जिसके अंदर जाति और धर्म की गुलाम पहचान कूट-कूटकर भरी हुई है।वह गुलामी में मस्त है और निरंकुश की तरह व्यवहार कर रहा है।



बिना इज्जत के लोग


          आधुनिक युग की पहचान यह है कि मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रहती।वह अपनी आँखों के सामने ही अपनी इज्जत खोता है।आमतौर पर आधुनिककाल में त्रासदी के सभी नायकों के साथ यह हुआ है। आधुनिक युग का महानायक है किसान और व्यक्ति के रूप में, एक वर्ग के रूप में उसकी इज्जत इस युग में जिस तरह नष्ट हुई है,उस पर जितने लांछन और आरोप लगे हैं,उसकी निजी और सामाजिक तौर पर जितनी क्षति हुई है वह अकल्पनीय है। यही हाल मजदूरों का है।यह एक तरह से मनुष्यता के पीड़ा का युग है।शिक्षित लोग लगातार जिस तरह का आचरण कर रहे हैं वह अपने आपमें शिक्षा और शिक्षित दोनों को शर्मसार करने के लिए काफी है। पहले कहा गया कि शिक्षा व्यक्ति को मनुष्य बनाती है, बेहतर मनुष्य बनाती है लेकिन व्यवहार में यह देखा गया कि शिक्षितवर्ग के लोग बड़ी संख्या में बर्बरता कर रहे हैं,मसलन्, दहेज हत्या और हत्या के आंकड़े उठाकर देखें तो पाएंगे दहेज के नाम पर लड़कियों की हत्या और उत्पीड़न में शिक्षितों की केन्द्रीय भूमिका है।दहेज हत्या की अधिकतर घटनाएं शिक्षितों में घटी हैं। इनकी तुलना में अशिक्षितों और गरीबों में यह समस्या नहीं के बराबर है।असल में विवाह करने वालों के बीच संपत्ति जितनी होगी,बर्बरता और उत्पीड़न की मात्रा भी उतनी ही ज्यादा होगी।यही हाल अपराध के बाकी क्षेत्रों का है वहां भी शिक्षित अपराधियों की भरमार है।

यही स्थिति मध्यवर्ग के दूसरे पेशेवर तबकों की है उनमें भ्रष्टाचार इनदिनों चरम पर है,कायदे से शिक्षित को ईमानदार भी होना चाहिए। लेकिन मुसीबत यह है कि हमारी शिक्षा ईमानदार नहीं बनाती, दुनियादार बनाती है।व्यवहारवादी बनाती है। इसके कारण शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है जो अपने पेशेवर दायित्वों के प्रति गैर जिम्मेदार है।मसलन्, भ्रष्ट अफसरों के आंकड़े देखेंगे तो आंखें फटी रह जाएंगी,सबसे बेहतरीन नौकरशाह आईएएस-आईपीएस माने जाते हैं लेकिन हालात यह हैं कि इनमें भ्रष्टाचार और घूसखोरी चरम पर है ईमानदार अफसरों की संख्या दिनोंदिन घट रही है। एक जमाना था वे सबसे ईमानदार अफसरों में गिने जाते थे आज स्थिति यह है कि वे सबसे बेईमान हैं।

उल्लेखनीय है भ्रष्ट आईएएस-आईपीएस अफसरों की संख्या तेजी से बढ़ी है।ईमानदार अफसर गिनती के रह गए हैं।दिलचस्प बात है जो ईमानदार है वह ईमानदारी के कारण पीड़ित है,सरकार उसके प्रति निर्दयता से पेश आती है,उसे स्थिर होकर काम ही नहीं करने देती।मैंने कुछ दिन पहले अपने एक आईपीएस मित्र से पूछा कि इतने दिनों से नौकरी कर रहे हो क्या कमा लिया,कितना नगद बैंकों में जमा है तो बोला ज्यादा नहीं मात्र 170 करोड़ रूपये कमा पाया हूं।मैं मन ही मन सोच रहा था कि प्रोफेसर के नाते उससे पगार मेरी ज्यादा रही है ,मैं बमुश्किल कुछ लाख रूपये बैंक में अब तक जमा कर पाया हूँ और इस बंदे ने इसी दौरान 170 करोड़ कमा लिए।यही हाल और भी बहुत से अमीर दोस्तों का है,सबके सब शिक्षित हैं,बातें ऐसी करेंगे कि आपको निरूत्तर कर दें।लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में वे इस कदर अव्वल हैं कि लगता ही नहीं है उन पर शिक्षा का कोई असर हुआ है।मैं जब यह कहता हूं कि आधुनिक युग में मनुष्य की कोई इज्जत नहीं रही तो इस दरअसल व्यवस्था के संदर्भ में मनुष्य के भ्रष्ट रूपों को देखकर ही कह रहा हूं। आधुनिककाल के ऐसे क्षण की कल्पना करें ,जिसमें हम रह रहे हैं, इसमें कोई बड़ा जनांदोलन नहीं हो रहा,सभी दल निरर्थक होकर रह गए हैं।

इसके समानांतर देखें गुलाम विचारधारा, विजेता बन जाएगी।हिंदुत्व की विचारधारा जो आज विजेता नजर आ रही है उसकी जड़ें आधुनिक समाज के विघटन की प्रक्रिया में निहित हैं।हिंदुत्व की विचारधारा आधुनिककाल में मुक्ति की विचारधारा नहीं है।बल्कि यह गुलामी की विचारधारा है।सामान्य लोग तेजी से गुलाम विचारधारा की गोद में दौड़-दौड़कर जा रहे हैं।



उल्लेखनीय है पुरानी परंपरागत हिंदू विचारधारा हो या नई आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा हो उसका मानसिक-सामाजिक गुलामी से गहरा संबंध है, इस संबंध की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।यह दौर गुलामी की विचारधारा के उभार का है।अब संविधान की व्याख्याएं हिंदुत्व की संगति में की जा रही हैं,संविधान की वे बातें नहीं मानी जा रहीं जो संविधान निर्माताओं ने कही हैं बल्कि वे बातें मानने पर जोर है जो हिंदुत्व कह रहा है। संविधान और हिंदुत्व के बीच में सह-संबंध बनाने और संविधान की हिंदुत्व सम्मत नई व्याख्याओं पर मुख्य रुप से जोर दिया जा रहा है।यह नए खतरे की घंटी है।

हम कितने असहाय हैं !


          संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुकेहैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।

फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक विचारों,अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।

फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।

´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं,उसके नाम पर किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं।

पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ के विचार को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे।



फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है।मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद इसकी बुनियाद है।अविवेकवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे।

गुरुवार, 29 जून 2017

जुनैद की हिमायत में


               आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस –भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा –आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ

कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´।



-´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

बुधवार, 28 जून 2017

जुनैद के हत्यारों की तलाश में

        जुनैद मारा जाए या अखलाक मारा जाए,एक वर्ग ऐसा है जो इन सब हत्याओं से बेखबर-निश्चिंत है।उनके तर्क सुनेंगे तो गुस्सा आने लगेगा।वहीं दूसरी ओर आरएसएस वालों के तर्क सुनेंगे तो वे पलटकर कहेंगे आप इस समय बोल रहे हैं, मुसलमान मारे जा रहे हैं तब क्यों नहीं बोल रहे थे, फलां-फलां समय फलां –फलां मारा गया तब आप चुप क्यों थे, आपने हल्ला क्यों नहीं किया।आप उनको कहेंगे कि देखिए यह पैटर्न है हत्या का ,और अब तक 22 मुसलमान मौत के घाट उतारे जा चुके हैं, तो वे कहेंगे हम इसमें क्या करें,हत्या हुई है तो कानून अपना काम करेगा,कानून को काम करने दें।कानूनी तंत्र जो कहे और जो करे उसकी मानें।आप ज्यादा बोलेंगे तो वे एक लंबी फेहरिश्त बताने लगते हैं और कहते हैं सैंकड़ों सालों से मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा है उस समय के बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते।

कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक हिंसा की जब भी कोई घटना होती है और आप संवाद करना चाहें तो साम्प्रदायिक लोग बहस को अतीत में ले जाते हैं, गैर-जरूरी ,अप्रासंगिक मसलों की ओर ले जाते हैं।इस क्रम में वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं,बार-बार वैज्ञानिक समझ और नजरिए को निशाना बनाते हैं,कम्युनिस्टों पर हमले करते हैं।

असल में साम्प्रदायिकता की बुनियादी लड़ाई मुसलमान या ईसाईयों से नहीं है बल्कि प्रगति की अवधारणा से है। वे प्रगति को सहन नहीं कर पाते। विचारों से लेकर जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति को वे सहन नहीं कर पाते। यह सच है विगत 70साल में देश में प्रगति हुई है। अनेक कमियों के बावजूद प्रगति हुई है और यही प्रगति असल में आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के निशाने पर है।

हममें से अधिकतर लोग हिन्दुत्व की विचारधारा को शाकाहारी विचारधारा के रुप में देखते हैं। लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिकता या हिंदुत्व एकदम नॉनवेज विचारधारा नहीं है,बिना हिंसा के इसे चैन नहीं मिलता।सतह पर हिन्दुत्ववादी विचार बड़ा भोला-सीधा लगता है लेकिन आचरण में पूरी तरह अविवेकवादी है।समाज में अविवेकवादी होना पशुता की निशानी है लेकिन हमने कभी इस रुप में देखने की कोशिश ही नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि कारपोरेट घरानों या बुर्जुआजीके प्रति आम जनता में जितना गुस्सा बढ़ता है ठीक उसके समानांतर आरएसएस जैसे संगठन आक्रामक रुप में खड़े हो जाते हैं।बुर्जुआजी जब बेचैन,निराश और पराजय के दौर से गुजरता है तब ही आरएसएस जैसे संगठन प्रगतिशील विचारों,मजदूरों-किसानों के हितों पर हमला बोलते हैं,इसी अर्थ में मैंने कहा था कि संघ को प्रगति से नफरत है। वे मुसलमान से नफरत नहीं करते वे प्रगति और प्रगतिशील विचारधारा और प्रगतिशील वर्गों से नफरत करते हैं और कारपोरेट घरानों की वैचारिक-राजनीतिक सेवा करते हैं।

नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ सारे देश में जिस समय सबसे ज्यादा गुस्सा था,मनमोहन सिंह के खिलाफ देश में आंधी चल रही थी,कारपोरेट घराने और उनके विचारक जनता में अलग-थलग पड़ चुके थे ठीक उसी समय सांड की तरह आरएसएस सामने आता है और सभी किस्म के प्रगतिशील विचारों को पहला और आखिरी निशाना बनाता है और यही वह चीज है जो गंभीरता से समझने की जरूरत है।सवाल यह है आरएसएस इतना ताकतवर क्यों बना ॽ उसके कामकाज और राजनैतिक एक्शन किसकी वैचारिक मदद करते हैं ॽ



हम सब लगातार समाज में विवेकवाद का प्रचार प्रसार कर रहे हैं और चाहते हैं कि विवेकवाद को आम जनता के आम-फहम विचार की तरह पेश किया जाए,यह चीज बुर्जुआजी को नापसंद है और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर आरएसएस हमला करता है,आरएसएस के हमलों की धुरी है अविवेकवाद। इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आरएसएस को यदि किसी चीज की जरूरत है तो वह है अविवेकवाद।वे अपनी सांगठनिक और वैचारिक क्षमता के विकास और विस्तार के लिए अविवेकवाद का बहुआयामी इस्तेमाल करते हैं।आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि देश को अविवेकवाद की आंधी से कैसे बचाएं।

जुनैद नहीं भारत की हत्या के प्रतिवाद में

         छह दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक एक गिरफ्तारी हुई है।जबकि वे बीस से अधिक थे और उन सबके हाथों में चाकू थे,वे चाकू लिए ही ट्रेन में दाखिल हुए थे,संयोग की बात थी कि जुनैद अपने भाईयों के साथ उस ट्रेन में था।कोई तर्क जुनैद की हत्या को वैध नहीं बना सकता,लेकिन मजाल है कि भाजपा के लोगों के मुँह पर शिकन पड़ी हो,वे गम में हों !

प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सबको मालूम है लेकिन कोई जुनैद के घर नहीं गया। हरियाणा के मुख्यमंत्री भी जुनैद के घर नहीं गए।कम से कम मानवता और संवेदनशीलता के नाते जुनैद के घर शोक व्यक्त करने जा सकते थे,ट्विटर पर एक-दो पोस्ट लिख सकते थे।लेकिन पीएम,सीएम,मुख्यमंत्री किसी के पास जुनैद की मौत पर शोक व्यक्त करने का समय नहीं है।

बेशर्मी की हद देखो कि टीवी चैनलों में जुनैद की हत्या को वर्गीकृत कर रहे हैं और बता रहे हैं यह तो यात्रियों के बीच में सीट पर बैठने का झगड़ा था।सत्ता में बैठे लोग यह देखने को तैयार नहीं है कि देश में चारों ओर घृणा की विचारधारा की जहरीली हवा चल रही है और उस हवा को चलाने में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की केन्द्रीय भूमिका है। हम सब जानते हैं साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद के नाम पर जब भी जहां पर भी प्रचार आरंभ होता है ,जब आम जनता उसमें भाग लेने लगती तो सबसे पहले राजसत्ता और उसके तंत्र ठंड़े पड़ जाते हैं,पुलिस-सेना के हाथ-पैर फूल जाते हैं,दिमाग सुन्न हो जाता है,अनेक मामलों में तो सत्ता के तंत्र स्वयं भी उस जहरीले प्रचार का अंग बन जाते हैं और आम जनता पर साम्प्रदायिक-पृथकतावादी ताकतों के साथ मिलकर हमला करने लगते हैं।आज ठीक देश की यही अवस्था है।सारा देश मुसलिम विरोधी प्रचार में डूबा हुआ है। मुसलिम विरोध को स्वाभाविक बनाकर हम सबके मन में उतार दिया गया है।

आज वास्तविकता यह है कि मोदीसरकार रहे या जाए मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार समाज से सहज ही जाने वाला नहीं है।इसका प्रधान कारण है साम्प्रदायिकता के खिलाफ केन्द्र और राज्य सरकारों का खुला समर्पण।देश के विभिन्न इलाको में इस समर्पण को साफ तौर पर देखा जा सकता है।मुसलिम विरोधी साम्प्रदायिक जहर महज सामान्य प्रचार या राजनैतिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि यह असामान्य राजनैतिक कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य है समाज को,लोगों के दिलो-दिमाग को साम्प्रदायिक आधारों पर विभाजित करना,साम्प्रदायिक तर्कों को सहज,बोधगम्य बनाना और आम लोगों के दिलो-दिमाग में उतारना।इस काम में आरएसएस पूरी तरह सफल हो चुका है। आज उसकी साम्प्रदायिक विचारधारा की पकड़ में सारा देश है।हर आदमी है।चाहे वह किसी भी दल का हो।

जो लोग सोचते हैं साम्प्रदायिक विचार मुझे नहीं उसे प्रभावित कर सकते हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। साम्प्रदायिक विचार सबको प्रभावित कर सकते हैं,वे जिस गति ,आक्रामकता और स्वाभाविक रूप में आ रहे हैं उससे हर कोई प्रभावित होगा,वे भी प्रभावित हो सकते हैं जो उसके शत्रु दिख रहे हैं।

साम्प्रदायिकता का मुसलिम विरोधी जहरीला प्रचार तमाम किस्म के कॉमनसेंस विश्वासों,कपोल-कल्पित कहानियों और धारणाओं के जरिए फैलाया जा रहा है। जुनैद की हत्या सतह पर उन 20गुंडों ने की है जिनके पास चाकू थे,लेकिन असल में उन चाकुओं में धार और उनको चलाने का बहशियाना भावबोध तो मुसलिम विरोधी प्रचार ने निर्मित किया था।जुनैद के कातिल पकड़े जाएं यह जरूरी है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि मुसलिम विरोधी जहरीले प्रचार अभियान के खिलाफ बिना किसी किन्तु-परन्तु और बहानेबाजी के हम सब एकजुट हों,उसके खिलाफ जमकर लिखें,बोलें,आंदोलन करें।असल में जुनैद के हत्यारे हमारे अंदर प्रवेश कर चुके हैं। वे जुनैद को नहीं हम सबको रोज चाकुओं से मार रहे हैं,हमें साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने से रोक रहे हैं।



जुनैद मुसलमान नहीं था।वह भारतीय नागरिक था।साम्प्रदायिक ताकतें सतह पर मुसलमान को मारती दिखती हैं लेकिन वे असल में नागरिक को मार रही होती हैं,नागरिक हकों पर हमले कर रही होती हैं,संविधान के परखच्चे उडा रही होती हैं।उनके सामने पीएम,सीएम,न्यायपालिका बौने हैं।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

नवजागरण और शूद्रों की मुक्ति के सवाल


          भारतीय नवजागरण पर जब भी बहस होती है तो दलितों या शूद्रों की मुक्ति के सवालों पर बहस नहीं होती,यह मान लिया गया कि दलितों की मुक्ति का आरंभ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के आने के बाद होता है। ज्योतिबा फुले दलित मुक्ति के मिशन की नींव रखते हैं,लेकिन इस पर पूरा शास्त्र बाबासाहेब ने ही बनाया।
     दलित मुक्ति का सवाल जहां एक ओर दलितों की मुक्ति से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर यह सवाल फुले-आम्बेडकर के सत्ता विमर्श से जुड़ा है। इन दोनों को अंग्रेजों के शासन से कोई गंभीर शिकायत नहीं है। ये दोनों ही तत्कालीन सत्ता से हमदर्दी रखते हैं। सवाल यह है क्या दलितों की मुक्ति पूंजीवाद में संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श में वैकल्पिक नजरिए से शामिल हुए बगैर दलित के लिए संघर्ष करना संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श दलितों को मुक्ति देता है
    नवजागरण बुर्जुआ संवृत्ति है।यह आधुनिकता के प्रकल्प का अंग है,इसे क्रांतिकारी प्रकल्प नहीं समझना चाहिए।यदि नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के नजरिए को देखेंगे तो यह मूलतःआधुनिकतावादी आंदोलन है।इसी तरह बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का समग्र नजरिया बुर्जुआ है और उसकी धुरी है आधुनिकता।पुराने किस्म के दलित की बजाय आधुनिक दलित की खोज और निर्माण उसका केन्द्रीय लक्ष्य है।यह नजरिया दलित को पुराने सामंती शोषण से मुक्त तो करता है लेकिन दलितों में शोषणमुक्त समाज का नजरिया नहीं बनाता।पूंजीवाद से मुक्ति का सपना पैदा नहीं करता।
यही वजह है 20वीं शताब्दी में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ही दलित मुक्ति के केन्द्र में है।इस धारणा ने कई स्टीरियोटाइप सरलीकरणों को जन्म दिया है।पहला,दलित मुक्ति का एकमात्र रास्ता वही है जिसको आम्बेडकर व्यक्त करते हैं।दूसरा,शिक्षा से जातिप्रथा नष्ट हो जाती है,तीसरा,दलितमुक्ति के लिए आरक्षण जरूरी है,चौथा,पूंजीवाद के विकास के साथ जातिप्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी,जाति शोषण नष्ट हो जाएगा।पांचवां,महानगरीय जीवन जातिप्रथा खत्म कर देता है। ये पांचों चीजें आधुनिकता के प्रकल्प का हिस्सा है। इन सरलीकरणों के पीछे आस्थाएं ही प्रमुख रूप से काम करती रही हैं।आस्था केन्द्रित होने के कारण नवजागरण और दलित पर बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसका यथार्थ से कम संबंध है,इसमें इच्छित लक्ष्यों और इच्छित तर्कों के आधार पर इच्छित सामाजिक यथार्थ की सृष्टि करने में भारत के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग सफल रहा है।
     नवजागरण और शूद्र के अन्तस्संबंध के प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि नवजागरण वस्तुतःदलितमुक्ति का प्रकल्प नहीं है।बल्कि यों कहें तो सही होगा कि नवजागरण के दलित मुक्ति के बुनियादी लक्ष्यों से  गहरे अंतर्विरोध हैं।
   जाति कहां है -
        जाति के समान कोई चीज नहीं है जिसके साथ जाति का विनिमय नहीं हो सके। जाति का किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है,यह व्यवस्था या सिस्टम है,इसको आप पूरा छोड़ें तब ही जाति से मुक्ति संभव है,जाति में से किसी अंश को रख लो,अथवा उस जाति का वह गुण ले लो या निचली जाति से ऊँची जाति में या अ-सवर्ण से सवर्ण जाति में चले जाने से जाति खत्म होने वाली नहीं है।अंशों में विनिमय के जरिए जाति खत्म नहीं होगी।जाति तो जाति है उसका विनिमय नहीं कर सकते।वह बेहद ठोस भौतिक शक्ति है, उसके साथ भेदभावभरी व्यवस्था के साथ विनिमय संभव नहीं है।जाति ठोस है,उसके विचार चंचल हैं,इसलिए जब भी जाति बदलती दिखती है तो असल में जाति नहीं बदलती उसके विचार बदलते हैं,जाति तो जस की तस बनी रहती है।विचारों के विनिमय से जाति नहीं बदलती।विचार बदलते हैं,जाति असल में शोषण का एक रूप है,जो बड़ी बारीकी से हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन में व्याप्त हो गयी है।हम जब जाति सुधार की बातें करते हैं तो अधिक से अधिक जाति के बुरे विचार को निकाल फेंकने की बातें करते हैं।इससे जाति नष्ट नहीं होती।

    जाति कोई सामाजिक समूह नहीं है,सामाजिक समूह के रूप में जाति को देखेंगे तो सही निष्कर्ष नहीं निकलेंगे।जाति को सामाजिक समूह के रूप में देखेंगे तो हमें अधिक से अधिक उसके ऊपरी ढाँचे को बदलने की इच्छा पैदा होगी,हम ऊपरी ढाँचे को बदल देंगे,लेकिन इससे जाति की आत्मा नहीं बदलेगी।छूआछूत,ऊँच-नीच,निचली जाति,ऊँची जाति, मनु व्यवस्था या अन्य व्यवस्थाएं या संवैधानिक व्यवस्थाएं अपने आपमें जाति को खत्म नहीं कर सकतीं,क्योंकि सभी किस्म के संवैधानिक उपाय जाति के ऊपरी कलेवर को बदलते हैं,उसकी आत्मा को स्पर्श नहीं करते।असल में जाति की आत्मा विनिमयरहित है।जाति के एक विचार को खत्म करेंगे,तो तुरंत दूसरा विचार उसकी हिमायत में उठ खड़ा होगा।हम करीब से उन जातियों को देखें जहां पर जाति का ऊपरी तौर पर खात्मा हो गया है लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई है। मसलन्,पश्चिम बंगाल में जातिप्रथा खत्म हो गयी है लेकिन उसकी जगह शोषित-शोषक के नए संबंधों ने जन्म ले लिया है,उन संबंधों को सहज ही घर-घर जाकर देख सकते हैं। कहने का आशय यह कि जाति तो शोषण का पुराना आदिम रूप है,वह हम सबकी आदतों,संस्कारों,चाल-चलन,रीति-रिवाज आदि में घुस आया है,वह सिर्फ समुदाय के रूप में ही मौजूद नहीं है बल्कि उसने दृष्टिकोण में जगह बना ली है।यही वजह है जाति के समान और कोई जगत नहीं है।
      जाति में रहने और जाति के मार्ग पर चलने का अर्थ है कि इसमें पैर जमाकर चल ही नहीं सकते, यह बेहद रपटन भरा मार्ग है।पुराने समाज में जाति के समान कोई चीज मौजूद नहीं है, आज भी जाति के समान कोई चीज नहीं है,जाति से किसी चीज की तुलना नहीं कर सकते,यह अतुलनीय है।इसने जीवन के हर क्षेत्र को अपने दायरे में शामिल कर लिया है।जाति के लिए समाज का हर आईना छोटा है,जाति हमारे विजन में इस कदर घर किए हुए है कि हम उसके बिना कोई चीज देख ही नहीं सकते।जाने-अनजाने जाति हमारे नजरिए  को प्रभावित करती है,वहां से हमारे ज़ेहन में शोषण के लक्षण व्यंजित होते रहते हैं।
    जाति को हमें सिस्टम की तरह देखना चाहिए।सिस्टम की तरह देखेंगे तो इसके आर्थिक आधार को भी देख पाएंगे।जाति कोई मानसिक अवस्था या विचार मात्र नहीं है।कहने के लिए जाति के ही आधार पर हर तरह का कार्य-व्यापार चलता रहा है।लेकिन जाति को आज इसके जरिए किसी चीज का विनिमय नहीं कर सकते।जाति के इस दौर में तीन और क्षेत्र सामने आए हैं वह है राजनीति,न्याय और साहित्य।इन तीनों क्षेत्रों में जाति के आधार पर देखने,विनिमय करने की बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं लेकिन मुश्किल यह है जाति को आधार बनाकर ज्योंही संप्रेषण करेंगे,संप्रेषण खत्म हो जाएगा।इसका प्रधान कारण यही है कि जाति को आधार बनाकर कोई बात नहीं की जा सकती, जाति की किसी से तुलना संभव नहीं है, किसी से विनिमय संभव नहीं है। क्योंकि जाति का जाति के बाहर कोई अर्थ नहीं है,जाति तब तक ही अर्थवान या प्रासंगिक है जब तक जाति के दायरे में रहकर विचार करते हैं। जाति की राजनीति तब तक चमकदार नजर आती है जब तक वह जाति केन्द्रित रहे,उसी तरह दलित साहित्य की केटेगरी तब तक प्रासंगिक है जब तक दलित के लेखन को जाति के आधार पर देखा जाय,उसके बाहर इनकी प्रासंगिकता नहीं है।जाति की इस सीमा को हमेशा ध्यान में रखें।
    जाति की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह अपने में हर चीज को समाहित करने की क्षमता रखती है।जो लोग जाति के आधार पर सोचते हैं वे हर चीज को जाति के आधार पर ही देखते हैं,चाहे राजनीति हो या न्याय हो या साहित्य या कला रूप हों,इन सब पर बातें करते समय हमेशा हर चीज को खींचकर जाति में समाहित कर लेते हैं।जब वे किसी चीज को जाति के आधार पर देखते हैं तो फिर उसमें से इच्छित अंतर्वस्तु भी निकाल लेते हैं। वे इस इच्छित अंतर्वस्तु को यथार्थ में रूपान्तरित नहीं कर पाते। उसके भिन्न अर्थ को देख नहीं पाते।
      जाति की तीसरी सबसे बड़ी विशेषता है उसके अंदर केटेगरी या कोटियों की अनिश्चितता है।मसलन्,जो जाति यूपी में आरक्षित केटेगरी में आती है,जरूरी नहीं है वह बंगाल या अन्य जगह आरक्षित केटेगरी में हो। यही वजह है जाति का भिन्न –भिन्न इलाकों या समुदायों में अलग ढ़ंग का विकास और चरित्र नजर आता है।इससे जाति की काल्पनिकता या विभ्रम सामने आते हैं।
     जाति को केन्द्र में रखकर जितना भी विमर्श निर्मित हुआ है उसके केन्द्र में प्रतीकों की भाषा है। इस भाषा ने जाति को वस्तुओं के संसार में एक वस्तु बना दिया है।फलतःवह अनुमान और अनुकरण पर चलती रही है,और आज भी चल रही है।उसके काल्पनिक और वास्तविक रूप में भेद करना असंभव है। मसलन्, एक ओर शूद्र अतिगरीब मिलेंगे तो दूसरी ओर आईएएस भी मिलेंगे,आप तय नहीं कर सकते कि यथार्थ में शूद्र क्या है सच यह है जाति पर अधिकांश बहस अनुमानाधारित है,जबकि दावे किए जाते हैं कि वह यथार्थ पर आधारित है।दिक्कत तब आती है  जब आप एक ही साथ अतिगरीब शूद्र और आईएएस शूद्र को सामने रखकर देखते हैं।इससे हमारे अनुमान में निहित अ-व्यवस्था का उद्घाटन होता है।
   ज्योंही यथार्थ और विवेकवाद इन दो तत्वों का जाति के मूल्यांकन के प्रसंग में इस्तेमाल करते हैं तो जाति हमें ठोस रूप में स्थिर नजर आने लगती है, इस तरह दिखने लगती है कि उसका किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है। जाति के सिद्धांत के दायरे में तो जाति प्रासंगिक लगती है लेकिन ज्योंही जाति के सिद्धांतों के बाहर निकलोगे तो जाति अ-प्रासंगिक नजर आने लगेगी।
   सवाल यह है जाति पुराना सिस्टम है,नया आधुनिक सिस्टम पूंजीवाद है।क्या जाति का पूंजीवाद के साथ विनिमय संभव है क्या पूंजीवाद में जातियों का लोप हो जाएगा जी नहीं,पूंजीवाद में जातियों का लोप नहीं हो सकता।उल्टे जातियों के विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार पूंजीवाद ने खोले हैं। नवजागरण आने के बाद जातियों की संख्या बढ़ी है, घटी नहीं है।जातियों के नाम पर सुख,सुविधा,कानून आदि सबमें इजाफा हुआ है,जातियों का विभिन्न नई जातियों में नाम परिवर्तन हुआ है लेकिन जाति का लोप नहीं हुआ है। जातियों के लिए नई परिधियां तय कर ली गयी हैं,नए आधार तय कर लिए गए हैं।इससे जाति के सिस्टम में अनिश्चितता और बढ़ी है।मसलन्, आज से सौ साल पहले व्यक्ति को जिस जाति के सदस्य के रूप में जानते थे वह आज उस जाति से निकलकर भिन्न जाति में शामिल हो चुका है।ऐतिहासिक तौर पर जाति के नाम का बदलना बताता है जाति में नाम बदलने,नियम बदलने,स्वयं ही अपने को नष्ट करके नए रूप में पेश करने की विलक्षण क्षमता है।इसके कारण जाति अपने को बार-बार प्रासंगिक और नए मूल्यबोध से जोड़ने में सफल हो जाती है।फलतः वह अपने को नष्ट करने में असफल रहती है।इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि जाति हर बार नया विभ्रम और अनिश्चितता  निर्मित करती है।इसका अर्थ यह भी है जाति खत्म होती नजर नहीं आती बल्कि आर्थिक तौर पर और भी ज्यादा ताकतवर नजर आती है। समग्रता में देखें तो जाति के लिए मूल्य और कानून अपवाद हैं ,विभ्रम यानी इल्युजन बुनियादी नियम है,फलतः जाति हमेशा समाज में बनी रहती है।मसलन्, आप जाति के नाम पर सब कुछ पा सकते हैं ,सब कुछ पाने के बाद भी जाति से आप मुक्त नहीं होते तो हम यही कहेंगे कि जाति के साथ किसी भी चीज का विनिमय संभव नहीं है। मसलन्, जाति के नाम पर शिक्षा,रोजगार,सामाजिक हैसियत आदि सब मिल जाता है,इसके बाद भी जाति नहीं छूटती।इसका अर्थ यह भी है कि जाति सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित सिस्टम है जिसे आप नियम, कानून, रोजगार,शिक्षा आदि प्रदान करके भी खत्म नहीं कर सकते।बल्कि उलटे इनसे जाति के और भी पुख्ता हो जाने की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।
   जाति पर बहस के दौरान असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीन कोटियों में जाति विमर्श सामने आया है।इन तीनों तत्वों या कोटियों को यदि जाति के परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाएगा तो यह तय है ये तीनों तत्व लौट-फिरकर वापस केन्द्र में आ जाएंगे।क्योंकि इन तीनों में अनुकरण पैदा करने की विलक्षण क्षमता है।ये अंतहीन चक्राकार रूप में घूमते रहते हैं।कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए,लग रहा था अब किसान कर्ज मुक्त हो गया है,लेकिन कुछ ही सालों में किसान फिर कर्जगीर हो गया।इन किसानों में दलित जातियों का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।इसी तरह दलित के उत्पीड़न को लेकर जितने भी सख्त कानून बना लो,उत्पीड़न पुनःलौटकर आ जाता है। तमाम कानून बनाने के बावजूद दलितों का उत्पीडन खत्म नहीं हुआ है,यही हाल औरतों के उत्पीड़न का है।असल में असमानता,कर्ज और उत्पीड़न ये तीन कोटियां ऐसी हैं जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी बनी रहती हैं, इनके जरिए यथार्थ के साथ विनिमय नहीं कर सकते। इनके जरिए यथार्थ नहीं बदल सकते,इनके जरिए कोई नई चीज पैदा नहीं कर सकते।

     असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीनों के आधार पर जब भी कोई परिप्रेक्ष्य खड़ा किया जाएगा वह अंततःअसफल होगा।मसलन्, यह माना गया कि भूमिहीनों को जमीन बांट देने से गांवों में असमानता घटेगी,भूमिहीन किसान ताकतवर बनेगा,पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू किया गया,लेकिन दो दशक के बाद पता चला कि भूमिहीन किसान जमीन के पाने के बावजूद असमानता,अभाव,कर्ज के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाया,उसकी पामाली घटने की बजाय बढ़ गयी।उसे जिन चीजों से बचाने के लिए जमीन दी गयी थी उन चीजों से जमीन उसकी रक्षा नहीं कर पायी।

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