रविवार, 24 मई 2015

अफसरसाहित्यकार के प्रतिवाद में


आजकल अफसरलेखक को हिन्दी साहित्यवाले सम्मान देते हैं। अफसरलेखक की भूमिका को वे गंभीरता से विश्लेषित नहीं करते,जन सरोकारों के संदर्भ में उसकी भूमिका को खोलकर नहीं देखते। इसने साहित्य के जन सरोकारों को प्रदूषित किया है, संघर्षशील कतारों को कमजोर किया है। 
एक जमाना था हिन्दी में जन सरोकारों से जुड़े साहित्यकार महत्वपूर्ण माने गए, बाद में ऐसा दौर आया कि अफसरसाहित्यकार ही साहित्य के सितारे बन गए। अशोक बाजपेयी को इस परंपरा को स्थापित करने का श्रेय जाता है।
आज साहित्यकारों में अफसरसाहित्यकारों के इर्दगिर्द जमघट लगा रहता है, ये अफसरसाहित्यकार साहित्य को कुछ नहीं दे पाए हैं,हां, एक काम जरुर हुआ है कि साहित्य में अफसरों की आदतें आ गयी हैं।
साहित्यकारों में वे सारी तिकड़में आ गयी हैं जो अफसर में होती हैं,तिकड़मी और ऊपर के कनेक्शनवाला मजेदार साहित्यकार पैदा हुआ है जो साहित्य में मजे ले रहा है और साहित्य को मजमे की तरह इस्तेमाल करके विनिमय कर रहा है।
अफसरसाहित्यकारों के पास एक अच्छी खासी जमात सरकारी तंत्र और राजनेताओं की है इसने साहित्य को सत्ता के तंत्र का पुर्जा बनाकर रख दिया है।
सवाल यह है कि साहित्यकार की भूमिका को समग्रता में देखें या अंश में देखें ? कहां से देखें ? साहित्यकार को समग्रता में देखना सही होगा इससे साहित्य में आए अफसरों और प्रशासनिक अधिकारियों ,कुलपति,कुलाधिपति आदि की बीमारियों से साहित्य को बचाने में मदद मिलेगी।
एक जमाना था लेखक हुआ करता था, बाद में कार्यकर्ता -लेखक आया, लेकिन इसके बाद अफसरलेखक ने साहित्य के क्षितिज को अपने कब्जे में ले लिया है। अफसरलेखक आज महान लेखक है! यह वह व्यक्ति है जिसके सामाजिक सरोकार सत्ता से अभिन्न रुप से जुड़े हैं और यह अपनी संगत,शोहरत,संपर्क आदि के जरिए साहित्य जगत को प्रभावित कर रहा है। इसे साहित्य में करप्शन का गोमुख भी कह सकते हैं। साहित्य की प्रतिवादी भूमिका,नागरिक की प्रतिवादी भूमिका आदि को विकृत करने में अफसरसाहित्यकार की विगत 40सालों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...