सोमवार, 15 मार्च 2010

अज्ञेय जन्मशती पर खास- अज्ञेय के अलगाव और मार्क्स को क्यों भूल गए नामवर सिंह




          (नामवर सिंह)
       (सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय')   
       अशोक वाजपेयी ने रविवार (14 मार्च 2010) के जनसत्ता में अपने कॉलम में नामवर सिंह के अज्ञेय के बारे में दिए गए भाषण के प्रमुख बिंदुओं को बताया है। वाजपेयी के अनुसार नामवरजी ने अज्ञेय की नाचकविता का पाठ किया और आलोचना को कई नसीहत दे ड़ालीं। पहली बात यह है कि नाचकविता आपात्काल के प्रतिवाद में लिखी भारतीय भाषाओ में लिखी श्रेष्ठतम कविता   है। अशोक वाजपेयी जानते हैं कि यह असाधारण परिस्थितियों में लिखी कविता है। पता नहीं नामवरजी ने आपात्काल का संदर्भ बताया था कि नहीं ,या फिर अशोक बाजपेयी लिखना भूल गए ?
    यह उल्लेखनीय है कि नामवरसिंह ने आपातकाल का समर्थन किया था और अज्ञेय ने विरोध किया था। यह कविता प्रत्येक जनतंत्र प्रेमी को पढ़नी चाहिए। नामवरसिंह-अशोक वाजपेयी दोनों ही आलोचना के नाम पर लंबे समय से जो कह रहे हैं वे बातें आज प्रासंगिक नहीं हैं। पता नहीं ये दोनों आलोचक अपनी ऊर्जा अप्रासंगिक बातें बताने में क्यों खर्च करते हैं।
    आज साहित्य की धारणा बदल गयी है। नामवर की आलोचना में इस बदले रुप की गूंज नहीं मिलती। अशोक वाजपेयी -नामवर सिंह जानते हैं कि यह कनवर्जन का युग है। इसमें साहित्य,विधाएं आदि का ‘ लेखन’ में कनवर्जन हो चुका है। अब सिर्फ ‘लेखन’ होता है। यह ज्याक देरिदा की राय है। इतिहास,आलोचना,कविता, कहानी, उपन्यास आदि विधाओं का अंत हो चुका है। गुरुदेव पढ़ाते रहे हैं कि गलत तर्क के आधार पर सही निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। नामवरजी अभी भी विधाओं के वर्गीकरण में रखकर देखते हैं ऐसे सारी आलोचना और नेक सलाहों की कूढ़ेदान के अलावा और कहीं जगह नहीं है।
   नामवरजी के अज्ञेय बोध की सीमाएं हैं। नामवरजी ने कभी भी अज्ञेय को ‘अलगाव’ के साहित्य के संदर्भ में नहीं देखा है। नामवरजी को ही दोष क्यों दें हिन्दी के सभी नामी-गिरामी आलोचकों ने भी अज्ञेय को साहित्य और 'अलगाव' के अन्तस्संबंध के आधुनिक फिनोमिना के रूप में नहीं देखा। हिन्दी में दो ही लेखक हैं अज्ञेय और मुक्तिबोध इन दोनों ने 'अलगाव' को गहराई में जाकर चित्रित किया।
      दुर्भाग्य की बात यह है कि 'अलगाव' को देखने की बजाय नामवर सिंह ने मुक्तिबोध में अस्मिता की खोज की। 'अलगाव' की खोज करते तो ज्यादा व्यापक समस्याओं को उद्धाटित कर पाते। यही हाल अज्ञेय का किया है। नामवरसिंह ने अज्ञेय को आधुनिकतावादी बनाकर खारिज किया और 'अलगाव' को परायी प्रवृत्ति मानकर अस्वीकार किया। सच यह है कि 'अलगाव' पूंजीवादी विकास प्रक्रिया का सकारात्मक और स्वाभाविक फिनोमिना है।
     अज्ञेय और मुक्तिबोध के संदर्भ में 'अलगाव' की जब भी चर्चा उठी है उसमें अलगाव को आधुनिक राज्य से विच्छिन्न करके देखा गया। 'अलगाव' का आधुनिक राष्ट्र के साथ गहरा संबंध है। आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ 'जीवन का निजीकरण' होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' पैदा होती है। ये सारी चीजें एक विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था की देन हैं।
     प्राचीनकाल में अलगाव का आदर्शकवि कालिदास है और अलगाव का आदर्श रस श्रृंगार रस का साहित्य है। अलगाव का जिस तरह का महिमामंडन कालिदास के यहां है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं है। कालिदास ने ऐसे नायक को पेश किया जो सर्वगुण सम्पन्न है। आनंद में मगन है। आनंद को व्यक्त करता है। कालिदास के पात्र जो कुछ करते हैं अपने लिए करते हैं। कालिदास के नायक प्रेम करते हैं अपने लिए ,युद्ध करते हैं अपने लिए, अकेले ही सारी मुसीबतों का सामना करते हैं। एक तरह से समूची सृष्टि के साथ संघर्ष करते हैं।

     प्राचीनकालीन समाज में रची गई रचनाओं को अलगाव के साथ सबसे पहले जोड़कर कार्ल मार्क्स ने देखा था। इसका आरंभ कार्ल मार्क्स ने अपनी डाक्टरेट थीसिस से किया था और बाद में अन्य रचनाओं में इसका विकास किया। मार्क्स ने एपीक्यूरियन कवियों को 'रोम के नायक कवि' की संज्ञा दी थी। यही स्थिति हमारे कालिदास की है।
   मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी आलोचकों ने कालिदास की रचनाओं में सामयिक संस्कृति और समाज की बहुत खोज की है किंतु कभी अलगाव की अवधारणा की रोशनी में रखकर विचार नहीं किया।
    कालिदास ऐसा कवि है जिसका सभी चीजों से संघर्ष होता है और सभी चीजें नायक के साथ युद्ध करती नजर आती हैं। कालिदास के पात्र आरंभ से ही अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए संघर्ष करते हैं और आनंद लेते हैं। अपने लिए संघर्ष करना और आनंद मनाना यही अलगाव की धुरी है। वे स्वयं के प्रति कठोर हैं, इनके सामने प्रकृति अपनी सारी अच्छाईयां खो देती है, अच्छाईयों के लिए शब्द अधूरे लगते हैं। अच्छाईयों के लिए शब्द नहीं मिलते।
      एपीक्यूरियन कवियों का नारा था ''वार ऑफ ऑल अगेंस्ट ऑल।'' यानी ''सबके खिलाफ और सबके लिए जंग।'' यही नारा भारत के प्राचीन कवियों का भी था। प्राचीन कवियों के यहां जीवन और आनंद के बीच अंतराल नहीं था।      सारी चीजें शरीर में केन्द्रित थीं। शरीर प्रमुख विमर्श था।
   श्रृंगार रस का समूचा विमर्श शरीर और आनंद का विमर्श है। रस का सारा विमर्श शरीर को केन्द्र में रखता है। नख-शिख वर्णन में उसे सहज ही देखा जा सकता है। नायक का शरीर कैसा है, आंखें कैसी हैं, पीड़ा कैसी है, चिन्ताधारा कैसी है और नायक जब चिन्ता में घिरा होता है तो कैसे कृशकाय हो जाता है और जब नायक युद्धरत होता है तो उसकी भंगिमाएं,शारीरिक सौष्ठव किस तरह का होता है ? इसी तरह नायिका जब कृति में आती है तो सारी ऊर्जा उसके शरीर के सौंदर्य वर्णन पर ही खर्च की गई। कहने का तात्पर्य यह कि प्राचीन कवि 'स्व' और शरीर से बेहद प्यार करता है।
     प्राचीन महाकाव्यों में निज के बहाने शरीर और उसके आनंद की सृष्टि पर जोर है। शरीर का विमर्श अलगाव का विमर्श है। भगवान के बारे में भी जब कवि रूपायन करने बैठा तो शरीर ही प्रमुख विषयवस्तु था। शरीर,स्व,आनंद और निजता ये चार चीजें हैं जो अलगाव के कारण कृति के केन्द्र में आयीं। अन्तर्विरोधों के बिना इन चारों चीजों का विकास संभव नहीं है। लेखक के अस्तित्व की परिस्थितियां उसका जीवन से अलगाव पैदा करती हैं। अलगाव के कारण लेखक बाहरी चीजों को आत्मसात करता है और अपने अलगाव को अभिव्यक्त करता है। इस क्रम में वह अपने अस्तित्व के रूपों से स्वायत्त नजर आता है। परम नजर आता है। मार्क्स के शब्दों में यह 'अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता' है।
     मार्क्स ने प्राचीन काल में अलगाव का उत्पत्तिपरक रूप में विश्लेषण करते हुए ' पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' और '' अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता'' की चर्चा की थी,यह चर्चा नकारात्मक रूप में की थी, मार्क्स के अनुसार आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ यह धारणा नकारात्मक नहीं रह जाती बल्कि सकारात्मक हो जाती है। सकारात्मक शक्ति बन जाती है। सकारात्मक का अर्थ है 'वास्तव' और 'अनिवार्य'। इसके लिए किसी नैतिक स्वीकृति की जरूरत नहीं है। इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति का आधुनिक राष्ट्र में 'आत्मकेन्द्रित' रूप में विकास होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता ' के लिए आधुनिक राष्ट्र स्वाभाविक परिस्थितियां पैदा करता है।
अलगाव की धुरी है 'आत्मकेन्द्रिकता' । इसका आधार है '' सबके खिलाफ और सबके लिए जंग'' की धारणा। इस धारणा के आधार पर आंतरिक वैधता ,प्रकृति के सार्वभौम नियमों की वैधता और आंतरिक अनुभूति को महत्वपूण माना गया। कार्ल मार्क्स ने '' क्रिटिक ऑफ दि हेगेलियन फिलोसफी ऑफ राइट'' (1843) में हेगेल के अलगाव संबंधी नजरिए की विस्तार के साथ समीक्षा करते हुए आधुनिक राष्ट्र का पुराने समाज की परिस्थितियों के साथ अंतर किया। आधुनिक समाज व्यक्ति को अपने साथ एकीकृत नहीं करता, कुछ तो यह संयोग की बात है और कुछ व्यक्तिगत प्रयासों के ऊपर भी निर्भर करता है।
   मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सुख भोगता है। राजनीतिक अर्थ में बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपने को राष्ट्र से पृथक् कर लेता है। अपनी निजी अवस्थाओं को राष्ट्र से अलग कर लेता है। यही वह बिंदु है जहां उसकी मनुष्य के रूप में महत्ता सामने आती है। यों भी कह सकते हैं कि राष्ट्र के सदस्य के रूप में महत्ता सामने आती है। समुदाय के सदस्य के रूप में और मानवीय निर्धारणकर्त्ता के रूप में महत्ता उद्धाटित होती है। इसी तरह व्यक्ति के अन्य गुण भी सामने आते हैं और वे उसके अस्तित्व को निर्धारित करने में मदद करते हैं।
   मार्क्स के अनुसार मनुष्य का व्यक्ति के रूप में अस्तित्व बुनियादी तत्व है। बुर्जुआ समाज में व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत अस्तित्व ही अंतिम सत्य है। बाकी सब चीजें जैसे श्रम,गतिविधियां बगैरह इसके साधन हैं। मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में वास्तव आदमी निजी व्यक्ति (प्राइवेट इण्डिविजुअल) होता है। यह ऐसा व्यक्ति है जो मूलत: बाहरी और भौतिक है।
     कार्ल मार्क्स की अलगाव की धारणा का सुनियोजित विकास ''दि मेनुस्क्रिप्टस ऑफ 1844' में होता है। इस कृति में मार्क्स उन तमाम धारणाओं को विकसित करते हैं जो '' क्रिटिक ऑफ हेगेलियन फिलोसफी ऑफ राइट'' में पहले व्यक्त की गई थीं।
    अलगाव के बारे में कार्ल मार्क्स को विस्तार के साथ पेश करने का प्रधान मकसद इस तथ्य की ओर ध्यान खींचना है कि अज्ञेय ने जिस अलगाव और व्यक्तिनिष्ठता को अपने उपन्यासों में अभिव्यक्ति दी है वह आधुनिक बुर्जुआ समाज का सकारात्मक तत्व है ,दुर्भाग्य की बात यह है कि इसे नकारात्मक तत्व मानकर अज्ञेय के उपन्यासों की गलत व्याख्याएं की गई हैं। दूसरी बात यह कि अज्ञेय के यहां भारतीय लोकतंत्र सकारात्मक फिनोमिना है। हमें देखना चाहिए कि कितने प्रगतिशील आलोचक और लेखकों ने अज्ञेय के जमाने में लोकतंत्र को सकारात्मक फिनोमिना के रुप में चित्रित किया है ?  




                




1 टिप्पणी:

  1. नाच
    अज्ञेय
    एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ।
    जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूं
    वह दो खम्भों के बीच है।
    वह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच है।
    दो खम्भॊं के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ
    उस पर तीखी रोशनी पड़ती है
    जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं।
    परमैं जोनाचता हूँ
    जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ
    जो जिस खम्भों के बीच है
    जिस पर जो रोशनी पड़ती है
    उस रोशनी में उन खम्भों के बीच उस रस्सी पर
    असल में मैं नाचता नहीं हूँ।
    मैं केवल उस खम्भे से इस खम्भे तक दौड़ता हूँ
    कि इस या उस खम्भे से रस्सी खोल दूँ
    कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो जाये—
    पर तनाव ढीलता नहीं
    मैं इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ता हूँ
    पर तनाव वैसा बना ही रहता है
    सब कुछ वैसा ही बना रहता है।
    और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं
    मुझे नहीं
    रस्सी को नहीं
    खम्भे नहीं
    रोशनी नहीं
    तनाव भी नहीं
    देखते हैं — नाच!

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