बुधवार, 8 जुलाई 2009

किसान,सेज और मीडिया (2)

मैं कोलकता में रहता हूँ,तकरीकन सभी बड़े घरानों के मालिक यहां रहते हैं। किंतु पूरे कोलकाता अथवा आसपास के शहरों में इक्का-दुक्का प्रयासों को छोड़कर कारपोरेट घरानों का सार्वजनिक जीवन में पूंजी निवेश नजर नहीं आएगा। इससे यह भी पता चलता है कि हमारे कारपोरेट घरानों और उनके पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों की गांव के विकास में कितनी ज्यादा दिलचस्पी है। सच यह है गांव और जंगलात में रहने वालों के अधिकारों को हमने कभी वरीयता नहीं दी, वे हमारे विमर्श का कभी मुख्य विषय नहीं रहे। जबकि विकास के नाम पर लाखों लोगों को हम विस्थापित कर चुके हैं। विस्थापित,गांव के लोग, आदिवासी हमें कभी अच्छे नहीं लगते। उनके सवाल हमें उद्वेलित नहीं करते। विगत साठ सालों में हमारा उनसे अलगाव और द्वेष इस कदर बढ़ा है कि हमें उनकी त्रासदी परेशान ही नहीं करती। हमने उनकी त्रासदी के प्रति बेगानापन ,बेरूखापन अपना लिया है।
कायदे से आजादी के बाद हमारा अपने देश के बाशिंदों के प्रति भाईचारा,प्रेमभाव बढ़ना चाहिए था किंतु हुआ इसके एकदम विपरीत जिन्हें भाई बनाना था,जिनके साथ बंधुत्वभाव से जीना था आज वे ही हमारे लिए सबसे ज्यादा बेगाने हैं। गांव के लोगों,प्राकृतिक संपदा,आदिवासी समाज और ग्रामीणों की उपज के प्रति हमारे समाज में आए बेगानेपन की जड़ें कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में हैं। आज स्थिति भयानक है। जो बच्चा स्कूल में पढ़ता है वह फूलों के नाम नहीं जानता, यदि कभी नाम सुना है तो फूल को देखकर पहचान नहीं पाता, वह गेंहूँ ,चावल,दाल आदि का दैनन्दिन उपभोग करता है किंतु उसने कभी दाल ,चावल,गेंहूँ की बालियों को नहीं देखा, उसने कभी खेत नहीं देखे, खेत में देखकर वह पहचान नहीं सकता कि आखिरकार किस चीज की खेती हो रही है। हमने अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा दी है जो हमें जिंदगी के यथार्थ से ,ग्राम्य यथार्थ से काट देती है, उसके प्रति बेगानापन बढ़ाती है।
अब हमारे पास खेत हैं,किसान हैं, पेड़ हैं,पौधे हैं,क्यारियां हैं, किंतु इनको पहचानने वाले शहरों में बच्चे अथवा लोग नहीं हैं। हम साठ साल में गांव से जुड़ने की बजाय कटते चले गए हैं। गांव के लोगों के सुख-दुख के साझीदार बनने की बजाय पराए हो गए हैं। यही ग्राम्य अलगाव हमारी समस्याओं की मूल जड़ है। कारपोरेट घराने और सरकारें इसी अलगाव का दुरूपयोग कर रही हैं। यदि गांव और शहर के लोगों में अलगाव नहीं होता तो सेज का संघर्ष सबका संघर्ष बन जाता।
मीडिया में सेज की प्रस्तुति कानून-व्यवस्था की समस्या के तौर पर आ रही हैं। सेज के खिलाफ उठे विवादों और प्रतिवादों को तब ही पेश किया जाता है जब कोई त्रासद अथवा हिंसक घटना घट जाए। मीडिया की नजरों में सेज अथवा विशेष आर्थिक क्षेत्र की समस्या जमीन,विकास और किसान की समस्या नहीं है। बल्कि उद्योग और कानून-व्यवस्था की समस्या है। इस क्रम में कई महत्वपूर्ण पक्षों को अदृश्य बना दिया गया है, जैसे किसान, उसकी जिंदगी,ग्लोबलाईजेशन और तद्जनित तबाही आदि। इनके संदर्भ तो बताए जाते हैं किंतु इनके विवरण और ब्यौरे गायब रहते हैं। इसके अलावा भाषा के नए तंत्र के जरिए संप्रेषण का प्रबंधन किया जा रहा है।
मसलन् किसान का हमारे यहां एक सार्वभौम फिनोमिना और सार्वभौम वर्गके रूप में चित्रण होता रहा है। प्रेमचंद और टॉलस्टॉय के किसान में अंतर करना मुश्किल है। ये दोनों लेखक दो भिन्ना देशों में पैदा होने के बावजूद 'सार्वभौम' के आधार पर गांव के किसान, किसान के शोषण ,किसानीचेतना आदि का समग्रता में श्रेष्ठ चित्रण करने में सफल रहे। आपको इनके चित्रण को देखकर नहीं लगेगा कि आप किन्हीं दो देशों के किसानों का विवरण पढ़ रहे हैं। चित्रण के इस 'सार्वभौम' रूप को 'ग्लोबल' ने अपदस्थ कर दिया है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि 'ग्लोबल' और 'यूनीवर्सल' में हमें घालमेल नहीं करना चाहिए। इन दोनों को पर्यायवाची भी नहीं समझना चाहिए।
'सार्वभौम' का जब प्रयोग करते हैं तो उसके साथ मानवाधिकार,स्वाधीनता, संस्कृति,लोकतंत्र आदि का भी प्रयोग करते हैं। ये सब 'सार्वभौम' का अभिन्ना हिस्सा हैं। जबकि इसके विपरीत 'ग्लोबल' का संबंध टेक्नोनॉजी से है, बाजार से है,पर्यटन से है,सूचना से है। ग्लोबलाईजेशन को पलटा नहीं जा सकता जबकि सार्वभौम में परिवर्तन के रास्ते तलाश सकते हैं। ग्लोबलाईजेशन के विकास के बाद मानवाधिकारों, लोकतंत्र, स्वाधीनता आदि के क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई । सार्वभौम का लोप हुआ । उसकी जगह ग्लोबलाईजेशन आ गया। हमारे यहां किसान 'सार्वभौम' की देन था, किसान के जो भी चित्र अथवा पहचान निर्मित की गई थी वह सार्वभौमत्व की स्थापना की प्रक्रिया में की गई थी। किसान का जीवन और उसके यथार्थ का चित्रण मानवाधिकारों और उसकी मुक्ति के प्रयासों की आकांक्षा के बिना पूरा नहीं होता । हम जितना ग्लोबलाईजेशन में समाहित होते गए हमारे सार्वभौम मूल्य और पहचान के रूप अपदस्थ होते गए अथवा कमजोर होते चले गए। सार्वभौम का ग्लोबल के साथ विनिमय ही है जो सार्वभौम मूल्यों के विनिमय को खत्म कर देता है। ग्लोबलाईजेशन के एकीकृत विचार ने सार्वभौम पर कब्जा जमा लिया है उसे पछाड़ दिया है।
ग्लोबलाईजेशन का एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण कार्य-व्यापार है बाजार का भूमंडलीकरण। सभी किस्म की वस्तुओं के बीच में विनिमय को संभव बनाना। मुद्रा का निरंतर प्रवाह बनाए रखना।संस्कृति के क्षेत्र में ग्लोबलाईजेशन अविवेकी प्रतीकों और मूल्यों की बाढ़ पैदा करता है। भूमंडलीकरण प्रत्येक चीज को विनिमय में बदल देता है। विनिमय के जरिए वह ग्लोबल और सार्वभौम के अंतर को मिटा देता है। अब मानवाधिकार भी माल बन जाते हैं और उनका भी पूंजी अथवा तेल अथवा किसी माल के साथ विनिमय होने लगता है। अब हम ग्लोबल संपर्क के समाज में फेंक दिए गए हैं। सार्वभौम से ग्लोबल में जाते समय ग्लोबल निरंतर इकसार बनाने में लगा है। इसके कारण अंतहीन दरारें,भेद,टूट,अन्तर्विरोध,विखंडन आदि को देख सकते हैं।
ग्लोबलाईजेशन ने बिखराव,अदस्थीकरण,विस्थापन,विकेन्द्रीकरण की बजाय अकेन्द्रीकरण को केन्द्रीकरण के स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। भेदभाव और बहिष्करण अचानक केन्द्र में नहीं आए हैं बल्कि ये भूमंडलीकरण का स्वाभाविक परिणाम हैं। आज सार्वभौम का आईना टूट चुका है। हम टूटे हुए आईने या कांचों के जरिए जिस यथार्थ को देख रहे हैं वह एकल रूप में नजर आ रहा है। घटनाएं एक-दूसरे से पृथक नजर आ रही हैं। हम चीजों को समग्रता में जोड़कर नहीं देख पा रहे हैं। घटनाओं को खासकर सेज के खिलाफ चल रहे संघर्षों को जोड़कर देख नहीं पा रहे हैं। एकल रूप में देखने के कारण इसके प्रति समग्रबोध निर्मित नहीं हो पा रहा। इसके पुनरूध्दार की संभावनाएं भी खत्म हो गयी हैं। समाधान की संभावनाएं भी खत्म हो गयी हैं। किसानों के यथार्थ को समग्रता में ग्लोबलाईजेशन विरोधी प्रोजेक्ट के परिप्रेक्ष्य में समग्रता में देखें तो शायद विकल्प भी पैदा हों। बिखरे हुए यथार्थ,बिखरे हुए संघर्ष ,बिखरे हुए लोग और बिखरे हुए संगठनों की वास्तविकता ने किसान को उसके यथार्थ को, किसानों के लिए लड़ने वाले संगठनों को वर्चुअल बना दिया है।
आज सार्वभौम अपनी वैधता और अधिकारबोध से वंचित है। सार्वभौम में भेदों की गुजाइश थी, ग्लोबल में भेदों में टकराहट है अथवा भेद अदृश्य हैं। भेदों के तार टूटे हुए हैं। सार्वभौम में भेदों में संपर्क था,संबंध था, दुख-सुख के साझीदार थे। ग्लोबल ने इस साझेदारी को शत्रुता और अलगाव में बदल दिया है। सार्वभौम में संस्कृति थी, संस्कृति के भेद थे, किंतु ग्लोबल में सिर्फ एक ही संस्कृति होती है वह है टैक्नोकल्चर अथवा तकनीक संस्कृति। उसका ही वर्चस्व है। तकनीक संस्कृति नयी तकनीक संरचनाओं पर टिकी है। वह अपने अनुरूप इकसार संस्कृति पैदा कर रही है।
मानवाधिकार,स्वाधीनता,संप्रभुता,स्वायत्ताता,लोकतंत्र को तकनीक संस्कृति बुरी नजर अथवा उपेक्षाभरी नजर से देख रही है। अथवा उसे दोयम दर्जा दिया जा रहा है। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें सेज के संदर्भ में किसान के अस्तित्व के सवालों के संदर्भ में देखना चाहिए और उस पर होने वाले जुल्मो-सितम और हिंसाचार को दोयमदर्जा देना चाहिए। मीडिया ने चालाकी के साथ जुल्म के सवाल उठाए हैं किसान के अस्तित्व के सवालों पर पर्दा ड़ाला है।
सेज के नाम पर जितने प्रकल्प आ रहे हैं उनमें ज्यादातर तकनीक संस्कृति के प्रकल्प हैं। उल्लेखनीय है कृषि से संस्कृति पैदा हुई , किंतु ग्लोबल से तकनीक संस्कृति पैदा हुई है। संस्कृति और तकनीक संस्कृति में बैर है। तकनीक संस्कृति नकारात्मक संस्कृति है। तकनीक संस्कृति ऐतिहासिक तौर पर हिंसा की संस्कृति है। यह आलोचनात्मक सामाजिक परिवेश को नष्ट करती है अथवा संकुचित करती है। तकनीक संस्कृति के बृहत्तार प्रयासों के अंश के तौर पर विशेष आर्थिक क्षेत्र के नीतिगत प्रस्तावों पर विचार किया जाना चाहिए।
तकनीक संस्कृति स्वभाव से हिंसक है वह जहां पर भी दाखिल होती है हिंसाचार को बढ़ावा देती है ,जीवन में हिंसा बढ़ी है,खासकउन लोगों में हिंसाचार ज्यादा बढ़ा है जो तकनीक संस्कृति के प्रत्यक्ष निशाने पर हैं। इस हिंसाचार के प्रति हमारे मन में सहिष्णुभाव बना रहे, दर्शकीयभाव बना रहे इसके लिए हठात् मीडिया में हिंसा का कवरेज कई गुना बढ़ गया है। हिंसा की बृहत्तार मीडिया प्रस्तुतियों के फ्लो के हिस्से के तौर पर सेज का कवरेज पढ़ा जाना चाहिए। तकनीक संस्कृति का हिंसाचार ग्लोबल हिंसाचार का हिस्सा है। यह लोकल फिनोमिना नहीं है। यह साधारण फिनोमिना नहीं है। बल्कि विशिष्ट फिनोमिना है। यह ग्लोबल वर्चुअल कल्चर के साथ अन्तर्क्रियाएं करते हुए संप्रेषण्ा कर रहा है। इसमें नई तकनीक के प्रभाव और श्रेष्ठता को सहज ही देखा जा सकता है।
तकनीकी श्रेष्ठता के आधार पर अपनी सकारात्मक इमेज बना रहा है। आज किसान के जीवन में घटित हिंसाचार पूरी तरह वर्चुअल और डिजिटल तकनीक के जरिए हमारे पास पहुँच रहा है। किसान संघर्ष के जितने भी आन्दोलन चल रहे हैं वे सबके सब वर्चुअल तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, ग्लोबल संप्रेषण कर रहे हैं। इस अर्थ में किसान ग्लोबल बन गया है,वर्चुअल बन गया है।फलत: किसान के लोकल आख्यान,लोकल संघर्ष,लोकल भाषा आदि के साथ विपर्यय घट रहा है। किसान अब ग्लोबल हो गया है। ग्लोबल भाषा में संप्रेषित कर रहा है। ग्लोबल वर्चुअल इमेजों के साथ हमारे बीच में आ रहा है। इंटरनेट और टीवी चैनलों में जिस तरह का संचार हो रहा है वह वर्चुअल संचार है। डिजिटल संचार है। कोड में किया गया संचार है। कोड़ में संप्रेषण की बुनियादी मुश्किल यह है कि इससे आप सामाजिक परिवर्तन पैदा नहीं कर सकते। कोड़ को बदलना संभव नहीं है। कोड़ को आप पढ़ सकते हैं, खोल सकते हैं किंतु बदल नहीं सकते। संघर्ष का कोड़ में रूपान्तरण इस युग सबसे बड़ी मीडिया त्रासदी है। कोड़ और बंटे हुए रूपों में प्रसारित किसान संघर्ष के यथार्थ के वाहक ज्यादातर संगठन वे हैं जिन्हें हम स्वयंसेवी संगठनों के नाम से जानते हैं। ये संख्या में हजारों हैं किंतु इनके पीछे गोलबंद जनता की तादाद सीमित है।
नए मीडिया की वर्चुअल दुनिया में किसान अथवा मनुष्य सिर्फ संदर्भ मात्र है। स्वायत्ता संदर्भ है। किंतु इस किसान अथवा मनुष्य को ठोस ब्यौरे और विवरणों के साथ मीडिया कभी पेश नहीं करता। कभी यह भी नहीं बताता कि आखिर मनुष्य के शत्रु कौन हैं और दोस्त कौन हैं ?अब यही कहा जा रहा है कि मानवता के शत्रु स्वयं मानवता के अंदर हैं। किसान के शत्रु किसान के अंदर हैं। जो किसान अपनी जमीन सेज के लिए देने के लिए मना कर रहे हैं, प्रतिवाद कर रहे हैं,उन सबको मानवता का शत्रु ,विकास का दुश्मन,साम्राज्यवाद का दलाल आदि करार दे दिया गया है।
कायदे से हमें यह देखना चाहिए कि आखिरकार किसान के जीवन में ग्लोबलाईजेशन के आने के बाद इतना व्यापक हिंसाचार कहां से आ गया ? कल तक यही किसान शांति का दूत था,हरितक्रांति का सैनिक था और आज यही किसान विकास का शत्रु,किसानी का शत्रु आदि न जाने क्या-क्या बताया जा रहा है। भूमंडलीकरण की तकनीक संस्कृति का हिस्सा होने के कारण सेज के प्रकल्प स्थलों पर जमकर हिंसा हो रही है, यह ग्लोबल हिंसा है। यह सिर्फ किसी देश विशेष तक सीमित फिनोमिना नहीं है बल्कि ग्लोबल हिंसाचार का हिस्सा है अत: इसके मीडिया कवरेज को ग्लोबल हिंसाचार के कवरेज के साथ रखकर देखा जाना चाहिए।
ग्लोबल हिंसा धीरे-धीरे किंतु श्रृंखलाबध्द ढ़ंग से घटती रहती है।यह धीरे-धीरे हमारी प्रतिरोध क्षमता को खत्म करती है। प्रतिरोध को हजम करती है। किंतु ग्लोबल हिंसा का खेल सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। अभी पूरी तरह ग्लोबलाईजेशन आया भी नहीं है और न अभी पूरी तरह जंग ही खत्म हुई है। भारत की स्थिति यह है कि हमारे बृहत्तार समाज ने तकनीक संस्कृति को अपना लिया और उसके साथ मानसिक रिश्ता भी बना लिया है किंतु हम इसके अविवेकपूण्र्ा हिस्सों से संघर्ष करना चाहते हैं। यही वह बिंदु है जहां पर हमें आलोचनात्मक नजरिए से विचार करने की जरूरत है। मानसिक तौर पर हमारे समाज के बहुत बड़े मध्यवर्गीय हिस्से ने ग्लोबलाईजेशन को स्वीकृति दे दी है।
सवाल उठता है ग्लोबलाईजेशन के आने के बाद इतनी व्यापक हिंसा क्यों बढ़ी है ? आखिरकार यह हिंसा कहां से आ रही है ? यह नयी ग्लोबल विश्व व्यवस्था की देन है यह नकारात्मकता और एकरूपता की कोख से जन्मी है। यह सामाजिक हिंसा है ,इसने मूल अन्तर्विरोधों की पहचान को धूमिल किया है। यह अंतहीन, थकाने वाली हिंसा है। इसके कारण ऐसे समाज का जन्म हो रहा है जिसमें कुछ भी स्वाभाविक नहीं बचता। कोई चीज स्वाभाविक दिखाई नहीं देती। स्वाभाविक का अंत हो गया। कृत्रिम और बनावटी या निर्मित जीत जीत गया है। चाहे वह शरीर हो,सेक्स हो, जन्म हो, मृत्यु हो, कोई भी स्वाभाविक चीज नजर नहीं आती। इस ग्लोबल हिंसा को बौद्रिलार्द ने भूमंडलीय जहर कहा है,इस तरह की हिंसा विषाक्त वातावरण में ही खत्म होती है। संक्रमण के रूप में फैलती है। इसकी श्रृंखलाबध्द प्रतिक्रिया होती है और क्रमश: धीरे-धीरे हमारे सहिष्णुभाव और प्रतिरोध को नष्ट कर देती है।
अभी ग्लोबलाईजेशन की पूरी तरह जीत नहीं हुई है। भूमंडलीकरण की हजम कर जाने और इकसार बनाने की शक्ति के सामने विविधतापंथी ताकतें प्रत्येक स्तर पर प्रतिवाद कर रही हैं। इनके जरिए भूमंडलीकरण के खिलाफ तेज प्रतिक्रिया व्यक्त हो रही है। विश्वस्तर पर सामाजिक और राजनीतिक रूपों में प्रतिवाद भी हो रहा है। हमें इस प्रतिवाद की उपेक्षा अथवा महिमामंडन दोनों से बचना चाहिए।
सवाल यह है भूमंडलीकरण को कौन परास्त करेगा ? क्या इसे ग्लोबलाईजेशन विरोधी आन्दोलन परास्त करेगा ? जी नहीं, इनका तो प्रधान लक्ष्य है डीरेगूलेशन की गति को धीमा करना। इस आन्दोलन का राजनीतिक असर महत्वपूर्ण हो सकता है। किंतु यह प्रतीकात्मक असर है,दीर्घावधि में यह अर्थहीन हो जाएगा। ग्लोबलाईजेशन विरोधी आन्दोलन तो भूमंडलीकरण की व्यवस्था का हिस्सा है,उसका आंतरिक तत्व है, भूमंडलीकरण को इसको संभालने में ज्यादा परेशानी नहीं आएगी। वे इसे सहज ही नियंत्रण में रख सकते हैं। इस तरह का कोई भी विकल्प भूमंडलीकरण के वर्चस्व को परास्त नहीं कर सकता। बल्कि एकात्मकता ,जो न नकारात्मक हो और न सकारात्मक हो,वही इसे पराजित कर सकती है। एकात्मकता स्वयं विकल्प नहीं है। वह भिन्ना किस्म की प्रतीक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। वह मूल्य निर्णय और राजनीतिक यथार्थ से बंधी नहीं है। वह अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। उसका ऐतिहासिक सामूहिक एक्शन के जरिए नियमन संभव नहीं है। वह किसी भी वर्चस्वशाली विचार को पराजित कर सकती है। वह विलक्षण प्रतिवादी विचार के तौर पर अपने को पेश नहीं करती, सामान्यत: वह अपना खेल स्वयं रचती है और उसके नियमों को आरोपित करते हैं। सभी किस्म की इकसारता हिंसक नहीं होती। भाषायी,कलात्मक,सांस्कृतिक इकसारता अप्रत्यक्ष ,सकारात्मक और प्रगतिशील होती है। लेकिन अन्य किस्म की इकसारता जैसे आतंकवाद,साम्प्रदायिकता आदि हिंसक है। इसमें ग्लोबलाईजेशन को पछाड़ने की शक्ति नहीं है। बल्कि यह उसके उपकरण की भूमिका अदा करती है।
ग्लोबलाईजेशन के रथ में वे ताकतें शामिल हो सकती हैं जो राजनीतिक इकसारता की हिमायती हैं। यह काम वे स्वच्छा से करें अथवा दबाव में करें अथवा अपने विनाश के लिए तैयार रहें। समाजवाद का पराभव और यू टर्न इसका क्लासिकल उदाहरण है। पश्चिम के मिशन का लक्ष्य है सभी संस्कृतियों को कैद करना, यह कार्य वे सांस्कृतिक समानता स्थापित करने नाम पर करते हैं। ज्यों ही संस्कृति अपना मूल्य खो देती है वह सिर्फ बदला लेती है,अन्य पर हमले करती है। ऐसा वह अपने राजनीतिक अथवा आर्थिक लक्ष्य के परे जाकर करती है। भूमंडलीकरण का सारा जोर प्रतिक्रिया के क्षेत्रों की समाप्ति पर है। प्रतिवाद और प्रतिक्रिया के इलाकों को वे उपनिवेश बना लेते हैं, इलाका दखल करके उन्हें घरेलू बंदी बना लेते हैं। जिससे वह इलाका मानसिक और भौगोलिक तौर पर प्रतिरोध न कर सके। पश्चिम बंगाल में ये तमाम लक्षण सहज ही देखे जा सकते हैं।
भूमंडलीकरण वर्चस्ववादी व्यवस्था है किसी भी किस्म का प्रतिक्रियावादी रूप मूलत: आतंकी होता है। भयोत्पादक होता है। अविवेकपूर्ण घटना के वर्चस्ववादी चरित्र की विशेषता यह है कि इसे किसी पर भी लादा जा सकता है और इसे किसी भी मंशा के तहत थोपा जा सकता है। हम चाहें तो यह भी सोच सकते हैं कि अपराधी हैं और यह भी सोचना चाहें कि माक्र्सवादी हैं तो यह भी चलेगा। असल में हम रेशल और प्रोग्रेमेटिक व्यवस्था के नियंत्रण में हैं। आज हम अपने चारों ओर टीवी,फिल्म,राजनीति से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उद्देश्यों को भूल चुके हैं। अब मुक्त समाज दुर्लभ हो गया है।
भूमंडलीकरण को एक वाक्य में परिभाषित करना बेहद मुश्किल है फिर भी विचारधारा के तौर पर उसे परिभाषित करना हो तो कहा जा सकता है कि राष्ट्र-राज्य उसके मुख्य शत्रु हैं। राष्ट्र-राज्य के प्रति उसकी शत्रुता का प्रधान कारण है राज्य अपने अनेक कार्यों में से एक काम यह भी करता है कि वह चंद लोगों के हितों की तुलना में जनता के हितों को प्राथमिकता देता है। यही चीज भूमंडलीकरण को पसंद नहीं है। यही वजह है कि भूमंडलीकरण्ा राष्ट्र-राज्य को तरह-तरह से कमजोर करता है। नष्ट करता है। अब राष्ट्र-राज्य की बजाय परा-राष्ट्रीय कंपनियां शासन को दिशा-निर्देश देने लगती हैं। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि भूमंडलीकरण के वे विचारक,दल और व्यक्ति पहले शिकार बनते हैं जो अपने -अपने तरीकों से राष्ट्र-राज्य के वर्चस्व को चुनौती देते रहे हैं। विश्वस्तर पर भूमंडलीकरण के उभार का सबसे पहले निशाना बनी सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी और सोवियत संघ।
सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने सर्वहारा के अधिनायकत्व के आधार पर राष्ट्र-राज्य से भी ऊपर पार्टी के वर्चस्व को स्थान दिया हुआ था और यह परंपरा साठ साल तक निर्बाध ढ़ंग से चलती रही। किंतु भूमंडलीकरण के आने के साथ ही एक ही झटके में सोवियत संघ ताश के पत्ताों की तरह बिखर गया। सोवियत संघ के अनुयायी समाजवादी देशों ( पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट पार्टी शासित देश ) में भी यही हाल हुआ क्योंकि उन देशों में पार्टी वर्चस्व के मातहत राष्ट्र-राज्य था, अत: भूमंडलीकरण का सबसे पहला बड़ा शिकार सोवियत संघ बना और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी बनी। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने सबसे पहले भूमंडलीकरण के सामने घुटने टेके। यही स्थिति कालान्तर में कम्युनिस्ट चीन की भी हुई। वहां पर भी राष्ट्र-राज्य पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व था। सोवियत संघ के पराभव के बाद अकस्मात् चीन ने यू टर्न लिया और भूमंडलीकरण का रास्ता पकड़ा। कहने का तात्पर्य यह है कि भूमंडलीकरण्ा उन ताकतों को सबसे पहले निशाना बनाता है जो राष्ट्र-राज्य के वर्चस्व को चुनौती देते रहे हैं, जो बागी हैं, क्रांतिकारी हैं, प्रतिवादी हैं। इस परिप्रेक्ष्य में रखकर यदि सोचेंगे तो पाएंगे कि जो भूमंडलीकरण विरोधी मंडलियां हमारे इर्दगिर्द घूम रही हैं वे प्रतिरोध करने में, इसका विकल्प तैयार करने में असमर्थ हैं। उनका प्रतिरोध इस बात पर है कि विनियमन (डीरेगूलेशन) की प्रक्रिया की गति को धीमा किया जाए। भूमंडलीकरण को मानवीय बनाया जाए।
भूमंडलीकरण नयी विश्व व्यवस्था है जिसकी समय-समय अमरीकी-ब्रिटिश शासक वकालत करते रहे हैं। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय वित्ताीय संस्थानों का वर्चस्व है। इसके अलावा 500 बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। इन कंपनियों का अमरीका की 80 फीसद अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व है। किसानों की जमीन को खासकर उपजाऊ जमीन को विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर इजारेदार कंपनियों को उद्योग- धंधों की स्थापना और विकास के नाम पर सौंपने के व्यापक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिणतियां होंगी। यह प्रक्रिया सिर्फ भारत में ही नहीं चल रही बल्कि यह विश्वव्यापी प्रक्रिया है। इसमें बड़े कारपोरेट घराने बड़े खिलाड़ी हैं। किसानों की जमीन को हथियाने की विश्वव्यापी प्रक्रिया की बृहत्तार परिणतियों की मीडिया उपेक्षा कर रहा है।
सेज के खिलाफ आन्दोलन करने वालों को विकास विरोधी ,औद्योगिकीकरण विरोधी कहा जा रहा है, साथ ही भूमंडलीकरण के पक्ष में अहर्निश निरंतर प्रचार चल रहा है। भूमंडलीकरण के विरोधी उसी समय मीडिया में नजर आते हैं जब कोई हिंसा की घटना हो जाए अथवा आंदोलन चल रहा हो। 'सेज' विरोधियों को मीडिया नकारात्मक ,विकासविरोधी, और उपद्रवकारी के रूप में पेश करता रहा है। इस तरह की प्रस्तुतियां बड़ी चालाकी के साथ तैयार की जा रही हैं। भूमंडलीकरण और सेज का विरोध करने वाले कभी शांत माहौल,सामान्य माहौल में पेश नहीं किए जाते,उन्हें हमेशा असामान्य माहौल में ही पेश किया जाता है।
इसके विपरीत भूमंडलीकरण के पक्षधरों को अमूमन शांत और सामान्य माहौल में पेश किया जाता है। सामान्य खबर के फ्लो में पेश किया जाता है। इसके विपरीत भूमंलीकरण और सेज विरोधियों को तनाव और हिंसा की खबरों के फ्लो में पेश किया जाता है। हिंसा-तनाव का फ्लो ऑडिएंस पर नकारात्मक असर छोड़ता है। यही वजह है कि मीडिया के व्यापक कवरेज के बावजूद 'सेज' विरोधी संघर्ष सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित है। स्थान विशेष तक सीमित है और सीमित जनसंख्या को ही उसके साथ दरशाया जाता है।
आमतौर पर मीडिया प्रस्तुतियों में किसान सिर्फ संदर्भ मात्र है, मौत की खबर मात्र है। उसके जीवन का व्यापक चित्रण अथवा रूपायन कहीं पर भी नजर नहीं आता,यही स्थिति साहित्य की भी है। साहित्य से किसान गायब है। उसके सुख-दुख गायब हैं,उसके जीवन का यथार्थ गायब है। त्रासदियां गयब हैं। वास्तविकता यह है हमारे पास किसान जीवन के चितेरे लेखक,पत्रकार,संस्कृतिकर्मी हैं किंतु वे अभिव्यक्ति करने में असमर्थ हैं,मीडिया और साहित्य से नदारत हैं। किसान का दर्द कभी-कभार विदर्भ अथवा अन्य इलाकों में हो रही मौतों और आत्महत्याओं के जरिए सामने आ जाता है।
किसान की खबरें दुर्घटना ,आत्महत्या,हिंसा आदि की खबर के रूप में पेश की जाती हैं। जबकि किसान की आत्महत्या ,कृषि ऋण, विशेष आर्थिक क्षेत्र की खबरें विकासमूलक परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट खबर के रूप में पेश की जानी चाहिए। किंतु मीडिया उन्हें रूटिन खबर के तौर पर सामान्य खबर के तौर पर पेश करता है और उसकी महत्ताा को कम करता है। उसे एक रूटिन खबर बना देता है। रूटिन खबर, दुर्घटना की खबर स्मृति में संजोए रखने वाली खबर नहीं होती ,वह जितनी जल्दी आती है,उतनी ही जल्दी गुम हो जाती है। प्रभावहीन होती है।
यदि मीडिया किसान को एजेण्डा बनाए और उसके विभिन्ना आयामों को धीरे- धीरे विकसित करे और तब तक उसे एजेण्डा बनाए रखे जब तक वह खबर पूरी तरह सम्पन्ना हो, किंतु मीडिया में इतना धैर्य कहां ? उसकी खबर के विकास की प्रक्रियाओं में कम नाटकीयता , घटना,हिंसा अथवा टॉक शो में दिलचस्पी ज्यादा होती है। इस क्रम में मीडिया किसान को अपदस्थ करके घटना विशेष को उभारता है उसके कवरेज को बढ़ावा देता है। इसके अलावा चैनलों में टॉक शो की बाढ़ आ जाती है। टॉक शो को किसान की खबर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। टॉक शो आराम और आनंद का बौध्दिक व्यायाम है। यह सैलीबरेटी की बोगस शाब्दिक जुगाली है। इसमें तर्क की कम और चमत्कृत करने वाले शब्दों की व्यापक भूमिका होती है।
मीडिया में हिंसा का समाचार फ्लो बढ़ा है उसकी संगति 'सेज' की हिंसा को पेश किया जा रहा है। यानी बड़ी चालाकी से -सेज' की खबर को प्रतिवाद और विकास के फ्लो के बाहर ले जाकर हिंसा और तनाव की खबरों के व्यापक फ्लो के संदर्भ में फिट कर दिया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि कृषि योग्य जमीन यदि किसानी की बजाय अन्य कामों में लगा दी जाती है तो इससे हमारे देश की खाद्य आत्मनिर्भरता पर नकारात्मक असर होगा। इस परिप्रेक्ष्य में सेज का प्रतिवाद विकासमूलक प्रतिवाद है यह हिंसा की केटेगरी में रखने वाली खबर नहीं है,अपराध खबर नहीं है।
किसानों की जमीन हथियाने और कृषि जगत पर आए विश्वव्यापी संकट के संदर्भ में आज सारी दुनिया में किसान,खेत मजदूर ही हैं जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर बहुराष्ट्रीयनिगमों की नीतियों का सामना करना पड़ रहा है और सबसे ज्यादा तबाही और पामाली के शिकार भी वही हो रहे हैं। तीसरी दुनिया के देशों में अमरीका और यूरोपीय यूनियन के देश सस्ते खाद्यान्ना की सप्लाई करके देशज कृषि अर्थव्यवस्था को सीधे तबाह कर रहे हैं साथ ही तीसरी दुनिया के मुल्कों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे किसानों को दी जाने वाली सब्सीडी खत्म करें।
तीसरी दुनिया के देशों पर विदेशी कृषि उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए खुलेपन की मांग की जा रही है। विदेशी कृषि मालों के लिए बाजार खोल दिए जाने के लिए निरंतर दबाव डाला जा रहा है। इस दबाव का ही परिणाम है कि भारत जैसे देश में आज महानगरों में विदेशी कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गयी है। अमरीका की स्थिति यह है वहां के बाजारों में कृषि उत्पादों के लिए जगह नहीं है। यही वजह है अमरीका आक्रामक ढ़ंग से विदेशी बाजारों में अपने कृषि उत्पादों की बिक्री कर रहा है। इसमें उसे विश्व व्यापार संगठन की नयी रीति-नीतियों के कारण सफलता मिली है।
आज प्रति तीन एकड़ में से एक एकड़ में पैदा हुए कृषि उत्पादों का अमरीका निर्यात कर रहा है। अमरीका की कृषि उत्पादों की सकल बिक्री का एक -चौथाई हिस्सा निर्यात किया जा रहा है। अमरीका और यूरोपीय यूनियन के देश सारी दुनिया पर कृषि सब्सीडी घटाने के लिए दबाव डाल रहे हैं किंतु अपने देश के किसानों को प्रतिदिन एक बिलियन डालर की सब्सीडी दे रहे हैं। कृषि उत्पादों के निर्यात पर से प्रतिबंध हटा देने का सीधा असर तीसरी दुनिया के किसानों पर पड़ रहा है। इसके कारण किसानों की पामाली बढ़ी है। देश के बाहर से कृषि उत्पाद मंगाने पर लगने वाले करों को हटा लेने से तीसरी दुनिया के देशों में सीधे खाद्य संकट पैदा हो रहा है।
मसलन् मैक्सिको ने अपने यहां पर बाहर से आने वाले कृषि उत्पादों पर प्रतिबंध हटा लिया और इससे एक ही झटके में मैक्सिको में खाद्य संकट पैदा हो गया, प्रतिबंध हटाने के पहले खाद्य उत्पादन में मैक्सिको आत्मनिर्भर था, किंतु जब निर्यात से आने वाले कृषि मालों पर से करों में रियायत दी गयी तो अचानक मैक्सिको की कृषि उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भरता खत्म हो गयी और आज वह 95 फीसदी सोया का आयात करता है, 58 फीसदी चावल का आयात करता है 49 फीसदी गेहँ और 40 फीसद मांस का आयात करता है। इस प्रक्रिया में मैक्सिको के कोर्न उत्पादक किसान तो व्यापार से खदेड़ दिए गए। आज स्थिति यह है कि मैक्सिको के 80 फीसदी किसान गांवों में भयावह गरीबी की अवस्था में जी रहे हैं। इनमें बीस लाख कोर्न उत्पादक किसान हैं। ये किसान किसी भी तरह अमरीका के सब्सीडी प्राप्त किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। प्रतिदिन 600 किसान अपनी जमीन से वंचित हो रहे हैं। यही स्थिति सारी दुनिया की है।
भारत सरकार के अनुसार प्रतिवर्ष बीस लाख से ज्यादा किसान अपनी जमीन से अलग होते जा रहे हैं। आईएमएफ और विश्पबैंक का अपने कर्जगीर देशों पर नीतिगत दबाव है किसानों की सब्सीडी कम करें, क्रमश: कटौती करें। इसके अलावा किसानों को नगदी फसलों की खेती के लिए तैयार करें। औद्योगिक कृषि की उन्नाति पर ध्यान दें। किसानों के सामाजिक सुरक्षा तंत्र को नष्ट करें। मसलन् उस तंत्र को नष्ट करें जिससे गरीबों को लाभ मिलता है। जैसे सार्वजनिक वितरण्ा प्रणाली को नष्ट किया जाए। जिससे गरीबों को भिखारी बनाया जा सके। खुले बाजार में भिक्षावृत्तिा के लिए मजबूर किया जा सके। औद्योगिक कृषि और कृषि का उदारीकरण अंतत: जमीन का केन्द्रीकरण कर रहा है। बड़े लोगों के हाथों कृषि जमीन का केन्द्रीकरण बढ़ा है। किसानों को बेदखल किया जा रहा है। किसानों को भयावह कष्टों भरी जिन्दगी जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्हें शहरों की ओर ठेला जा रहा है और सस्ती मजदूरी के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वे जहर खाकर आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि के उदारीकरण का सबसे ज्यादा असर बच्चों और औरतों पर हो रहा है। वे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
भूमंडलीकरण और सेज के कहानीकार औरतें और बच्चे हैं। वे ही हैं जो बार-बार हमारे सामने आ रहे हैं और अपना आख्यान बता रहे हैं। अपनी तकलीफों को व्यक्त कर रहे हैं। दूसरी ओर अमीर लोग हैं, धनी-मानी और बड़े अधिकारी हैं , बुध्दिजीवी हैं ,राजनीतिज्ञों का आख्यान आ रहा है,ये लोग बार-बार सेज के फायदे गिना रहे हैं। अद्भुत स्थिति है कि एक ओर औरतें और बच्चे हैं और दूसरी ओर धनी-मानी लोग हैं। ये एक ही सिक्के के,ग्लोबल आख्यान के दो पहलू हैं। इन दोनों के आख्यान में सतह पर कोई संवाद नहीं दिखेगा किंतु असल में ये एक-दूसरे के विलोम को रच रहे हैं। इन दोनों के आख्यान को भूमंडलीकरण के फ्रेम में रखकर पेश किया जा रहा है।
'सेज' की मीडिया प्रस्तुति का श्रीगणेश किसी क्षेत्र विशेष को विशेष आर्थिक क्षेत्र में चुने जाने साथ शुरू होता है और आरंभ में ही यह बताया जाता है कि इस क्षेत्र में कौन-कौन से उद्योग लगने वाले हैं और उससे कितने लोगों को रोजगार मिलेगा। कवरेज का दूसरा चरण जमीन की कीमत के साथ शुरू होता है और इस प्रक्रिया में किसान की जमीन को महज जमीन का टुकड़ा बनाकर पेश किया जाता है, गोया किसान अपनी जमीन पर कुछ पैदा नहीं करता, उसकी जमीन बंजर हो, किसानी से हमारे देश को कोई लाभ नहीं मिलता,पर्यावरण और प्राकृतिक संपदा के निर्माण और उपलब्ध प्राकृतिक संपदा के साथ गोया किसान की जमीन का कोई संबंध ही नहीं है। मीडिया के लिए किसान की जमीन सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा है और टुकड़ा बिक जाए तो अच्छा है ! विकास के काम आएगा! जो बेचेंगे उन्हें क्या-क्या लाभ होंगे ?इस पर ज्यादा जोर दिया जाता है।
सेज के मीडिया कवरेज का तीसरा चरण तब शुरू होता है जब वे जमीन देने से मना करते हैं। किसानों की ओर से सेज का प्रतिवाद क्यों हो रहा है और उसके तर्क क्या हैं,इन्हें मीडिया सचेत तौर पर छिपाता है और सिर्फ प्रतिवाद के स्वरों को सुनाता और दिखाता है, वह किसान को नहीं पेश करता, वह धरने,प्रदर्शन और इनमें शामिल नेताओं को पेश करता है। सेज के खिलाफ हो रहे एक्शनों में उन लोगों को खूब उछाला जाता है जो किसान नहीं हैं, नेता का तमतमाया चेहरा,आग उगलती अथवा प्रतिवाद करती मुद्राएं, लाठीचार्ज,गोलीबारी, घायल लोग, मारे गए लोगों के शव,बलात्कार की शिकार औरतें,गुमशुदा लोगों के परिवारीजनों कार् आत्तानाद आदि सब कुछ देख सकते हैं किंतु शांत किसान नहीं देख सकते।
मीडिया में शांत किसान की इमेज तब ही आती है जब वह सेज समर्थक हो। इस किसान की प्रस्तुति इसलिए होती है कि सेज का विरोध करने वालों का विरोध दरशाना है। यह किसान भी सेज के बारे में कम से कम और सेज विरोधियों के कारनामों अथवा राजनीतिक एक्शन के बारे में ज्यादा बोलता नजर आता है। यानी समग्रता में देखें तो किसान सिर्फ प्रतिक्रिया व्यक्त करता नजर आता है, प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाला सर्जक नहीं बाधक होता है,सकारात्मक नहीं नकारात्मक होता है। फलत: मीडिया में किसान की नकारात्मक इमेज बनती है और उसी का बार-बार प्रक्षेपण होता रहता है।
इसी दौर में बाहरी बनाम स्थानीय के नाम पर सेज का विरोध करने वालों पर वैचारिक हमले तेज कर दिए जाते हैं। उन्हें बाहरी तत्व,उकसाने वाला,भड़काने वाला, अशांति के लिए किसानों को प्रशिक्षित करने वाला, शैतान,दुष्ट,माओवादी,साम्राज्यवादी दलाल आदि बनाकर पेश किया जाता है। यह संदेश संप्रेषित किया जाता है कि किसान तो राजी थे सिर्फ बाहरी लोगों ने आकर भड़का दिया, किसान प्रतिवाद नहीं कर रहे थे बल्कि बाहरी लोग घुसपैठ करके गड़गड़ी और अशांति फैला रहे थे,किसानों को भ्रमित करके विरोध के लिए भड़का रहे थे,ये बाहरी लोग न आए होते तो सबकुछ शांति से सिलट जाता। किसान तो सेज के लिए जमीन देने के लिए राजी है बाधा तो बाहरी तत्व हैं।
किसान को शांत और सार्थक रूप में दिखाने में मीडिया की कोई दिलचस्पी नहीं होती। मीडिया के द्वारा किसान के दरवाजे पर कभी दस्तक नहीं दी जाती, मीडिया हमें किसान को प्रतिक्रिया में बोलते हुए ही प्रस्तुत करता है। किसान जब क्रिया में था, सकारात्मक भूमिका अदा कर रहा था, समाज के लिए रच रहा था, उत्पादन करके खाद्य आत्मनिर्भर बना रहा था उस समय किसान को यश नहीं दिया गया उस समय यश लिया राजनेताओं और कृषिवैज्ञानिकों ने। हरित क्रांति के लिए किसान को कम और राजनेताओं को यश ज्यादा मिला, इसी तरह दुग्ध क्रांति के लिए मदर डेयरी आन्दोलन के संस्थापक की महिमा का गुणगान ज्यादा किया गया ,दुग्ध उत्पादक किसानों की महिमा का यशगान पेश नहीं किया। बताया गया दुग्ध क्रांति का नायक किसान नहीं बल्कि मदरडेयरी का संस्थापक था। कहने का तात्पर्य यह है मीडिया की उत्पादक शक्तियों की सकारात्मक इमेज पेश करने में एकदम दिलचस्पी नहीं होती, वह उन लोगों को ज्यादा उभारते हैं, जो पराए हैं, अन्य हैं,पराश्रित हैं और उत्पादक शक्तियों के श्रम का अपहरण कर रहे हैं।
सेज के मीडिया कवरेज का चौथा और अंतिम चरण तब शुरू होता है जब सेज प्रसंग में शासकवर्ग की एजेंसियां हिंसाचार में शामिल हो जाती हैं। सेज का प्रतिरोध करने वालों को तरह-तरह से उत्पीड़ित करने लगती हैं। इस दौर में विरोधियों पर तरह-तरह के हमले तेज हो जाते हैं। उनकी राजनीतिक मंशा, परिप्रेक्ष्य, निहित -स्वार्थ, चरित्र आदि के बारे में मनगढंत कहानियां पेश की जाती हैं। उन्हें तरह-तरह से लांछित और कलंकित किया जाता है। किसान के सामने एक ही चित्र बार-बार पेश किया जाता है कि वह अपनी जमीन बेच दे ,जमीन बेच देगा तो सुखी रहेगा वरना मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा और इस आधार पर किसान में भय की सृष्टि करके उसकी वैचारिक दृढ़ता को कमजोर बनाया जाता है। इस क्रम में किसान अपने इर्दगिर्द सक्रिय सभी लोगों को संदेह की नजर से देखने लगता है, अविश्वास की नजर से देखने लगता है और यही वह बिंदु है जहां से वह प्रतिवाद के दायरे से खिसकना शुरू हो जाता है। प्रतिवादी तत्वों पर अविश्वास करना शुरू करता है और अंत में निराश होकर समर्पण कर देता है। सामान्यतौर पर जिन क्षेत्रों में सेज के प्रकल्पों के लिए जमीन का अधिग्रहण हो रहा है कमोबेश यही प्रक्रिया चल रही है। इस प्रक्रिया का सबसे त्रासद पक्ष जहां एक ओर किसान का हताश होना है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत राजनीतिक दलों का नीतिगत दुरंगापन है। आज कोई भी राजनीतिक दल दृढप्रतिज्ञ भाव से सेज का विरोध नहीं कर रहा। यदि एक जगह विरोध कर रहा है तो दूसरी जगह समर्थन कर रहा है। यह राजनीतिक दुरंगापन राजनीति मात्र की साख को कलंकित कर रहा है, राजनीतिक दलों के ऊपर से लोगों की आस्था घट रही है। किसानों में अराजनीतिकरण बढ़ रहा है। इससे किसानों की राजनीतिक शिरकत घटेगी।
सेज का प्रतिवाद करने वालों में दूसरा बड़ा तबका स्वयंसेवी संगठनों का है। ये वे लोग हैं जिनका व्यापक जनाधार नहीं है। ये ईमानदार लोग हैं किंतु इनके पास सीमित शक्ति है। छोटे-छोटे संगठन हैं। ये संगठन चाहते हैं कि सेज का विरोध किया जाए,भूमंडलीकरण का विरोध किया जाए,ये संगठन अपने एक्शन का मीडिया कवरेज बेहतर ढ़ंग से सम्पन्ना करते हैं, यह ऐसा कवरेज है जो स्वाभाविक की केटेगरी में प्रस्तुत नहीं किया जाता,स्वाभाविक और सटीक संदर्भ में पेश नहीं किया जाता। बल्कि इसे अस्वाभाविक, असामान्य,बाहरी परिवेश में पेश किया जाता है,यही वह बिंदु है जहां से मीडिया समूचे ग्लोबलाईजेशन विरोधी,सेजविरोधी आन्दोलन का वैचारिक अपहरण और आत्मसात्करण शुरू करता है। उसे प्रभावहीन बनाना शुरू करता है, उसकी अंतर्वस्तु को विकृत करना शुरू करता है। इस कार्य को मीडिया बड़ी चालाकी से करता है,वह जब भी स्वयंसेवी संगठनों के नेताओं को कभी भी किसान और स्थानीय वातावरण अथवा संदर्भ में पेश नहीं करता ,ये नेता हमेशा पुलिस के सामने,टीवी या जलसे के मंच पर ,बुध्दिजीवियों के बीच में अथवा शहर में प्रेसकाँफ्रेंस करते नजर आते हैं, अथवा सेज के इलाके की ओर आते-जाते नजर आते हैं। सेज के क्षेत्र में किसानों के बीच इनकी कभी कोई एकाध छवि मीडिया में भूल से आ जाए तो बड़ी बात होगी वरना तो इन नेताओं को उनके प्रतिवाद के स्थान और उससे जुड़े समाज से पृथक् करके ही दरशाया जाता है, इस तरह की प्रस्तुतियां स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिवादी नेताओं को बाहरी तत्व बनाने में सफल हो जाती हैं।
इस तरह की प्रस्तुतियों का एक उज्ज्वल पक्ष है मीडिया में बुध्दिजीवियों का कवरेज में प्रतिवादी के तौर पर आना। इससे उन बुध्दिजीवियों पर असर होगा जो चुप रहते हैं। इससे यह भी परिवर्तन होगा कि बुध्दिजीवियों में किसान के प्रति जो उपेक्षाभाव रहा है ,किसानों की समस्याओं से दूरी रही है वह कम होगी। दूसरा परिणाम यह भी निकलेगा कि राजनीतिक संस्कृति के केन्द्र में लंबे अंतराल के बाद किसान समस्याएं प्रधान स्थान ग्रहण करेंगी। कमोबेश सभी राजनीतिक दल यहां या वहां किसानों के पक्ष में बोलने और संघर्ष करने के लिए मजबूर होंगे और इससे एक नए किस्म के विकल्प की संभावनाएं भी बनेंगी।





































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