बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

मैं और मेरा स्वभाव-

         मेरी मुसीबत यह है कि मैं अपने स्वभाव का दास हूं,यह स्वभाव मुझे विरासत से नहीं मिला बल्कि यह मैंने सचेत रूप से अर्जित किया है।विरासत से जो चीजें स्वभाव में मिलीं वे बहुत ही पीडादायक थीं,अहंकार से भरी थीं,पुराने मूल्यों के बोझ से दबी हुई थीं,मेरी प्रकृति पुराने मूल्यों में जीने की नहीं है.पुराना मुझे एकदम पसंद नहीं है लेकिन दूसरों का मन रखने के लिए मैं अनेकबार पुराने को मान लेता हूं, लेकिन पुराना मेरे स्वभाव से गायब हो चुका है।

जीने के लिए न्यूनतम चीजें चाहिए और वे ही चीजें जुगाड़ करके मैं रखता हूं। मेरे पास कोई संपत्ति नहीं, कोई वैभव नहीं और न यश -मान-प्रतिष्ठा पाने की मन में कोई कामना है। यश-मान-प्रतिष्ठा-पद-गरिमा आदि अंतत: मुश्किलों में फँसा देते हैं। आए दिन प्रियजनों के उलाहने सुनता हूं कि यह नहीं किया वह नहीं किया, उसने तुमको सताया ,इसने तुमको सताया ,उन सबको करारा जवाब नहीं दिया, देखो वह कितना बडा आदमी बन गया और तुम वहीं के वहीं हो,तुम्हारे पास क्या है ?

मैं हकीकत में कुछ न कर पाना , संपत्ति न जोड़ पाना, यश की पगडंडियाँ न बना पाना अपनी असफलता मानता हूं।लेकिन अपने स्वभाव का दास हूं मुझे ये चीजें पसंद नहीं हैं, ये चीजें मुझे प्रभावित भी नहीं करतीं।यहां तक कि मेरे मन में कभी एक घर बनाने या ख़रीदने का कभी सपना तक नहीं आया , इसलिए कभी जीवन में कोई कर्ज किसी से नहीं लिया।जो मिल गया जैसा मिल गया उसके साथ एडजस्ट कर लिया।जीवन में एक ही सपना था विश्वविद्यालय शिक्षक बनूँ और नए नए विषयों पर लिखूँ और पढ़ूँ।ये दोनों चीजें हासिल करने में ही अब तक की सारी उम्र कट गयी।

अमूमन लोग संचय करने को ही जीवन का लक्ष्य मानकर चलतेहैं लेकिन मैं उलटा सोचता हूं।जीवन में सृष्टि करना चाहते हो तो संचय नहीं विसर्जित करने की आदत डालो।विसर्जन करने में कोई दायित्व नहीं होता , लाचारी नहीं होती।जैसाकि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है " हमारा आनंद,हमारा प्रेम,अकारण ही आत्म विसर्जन में अपने को चरितार्थ करता है।" "आत्मा भी लेने में खुश नहीं होती है, वह देने में खुश होती है।"

मेरी हमेशा से "क्षुदित अहं" वाले भावबोध से जंग रही है।जो लोग इस भाव में रहते हैं वे कंगाल की तरह सब कुछ अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहते हैं।जो लेने के मतलब के अलावा कुछ देता नहीं है, वह फल पाने के अलावा और कुछ करता नहीं है।मैंने सचेत रुप से इस अहं से लडाई की है और यह अभी भी जारी है।



सवाल यह है जीवन को अहं से संचालित करना चाहते हैं या आत्मा के जरिए ? अहं बनाम आत्मा के संघर्ष में दाखिल होने से हम बचते रहे हैं जबकि होना चाहिए उलटा।टैगोर के अनुसार "अहं का स्वभाव है भीतर की ओर खींचना और आत्मा का स्वभाव है बाहर की तरफ देना।" इन दोनों में मेल बिठाना संभव नहीं है, तय करें हमें अहं से प्रेम है या आत्मा से!मुझे तो आत्मा से प्रेम है।

सहज जीवन जीना क्यों जरूरी है


       सामान्यतः यह माना जाता है कि मनुष्य सहज प्राणी है।लेकिन आचरण में यह चीज बहुत कम नजर आती है।हम यदि अपने पुराण-उपनिषद आदि को देखें तोवहां सहज जीवन और सहज स्वभाव का आधिक्य मिलेगा।सहज स्वभाव हमारे धर्म की आत्मा है।यह ऐसी आत्मा है जिसे वस्तुओं के प्रेम,आडम्बर, यश की कामना,सामाजिक हैसियत आदि अर्जित नहीं कर सकते।यह प्रदर्शन की चीज नहीं है।सहज जीना,स्वस्थ सामाजिक विकास का लक्षण है।यदि हमारा जीवन असहज हो रहा है,जटिल बन रहा है तो इसका प्रधान कारण है हमारे जीवन की अवस्था के साथ जीवन का अंतर्विरोध।हम सामाजिक अंतर्विरोधों पर बातें करते समय राजनीतिक—आर्थिक अंतर्विरोधों पर बहुत ध्यान देते हैं लेकिन जीवन और समाज के बीच बन रहे अंतर्विरोध,सरल और जटिल जीवन के बीच पैदा हो रहे अंतर्विरोध की आमतौर पर चर्चा नहीं करते।इससे हमारी समूची जीवनशैली सुखकी बजाय दुख देने लगी है।महात्मा बुद्ध,ईसा मसीह,महात्मा गांधी के जीवन को महान बनाने में उनकी सहज क्रियाओं और सहज-सरल मन की निर्णायक भूमिका थी।सहजता कोई फालतू तत्व नहीं है।वह कोई संयासियों और मूर्खों की चीज नहीं है।सरल को हम आमतौर पर मूर्ख मानकर चलते हैं।बोलते भी बड़े सरल हैं,मूर्ख भी हैं,चीजें समझते नहीं हैं।चालाकी,धूर्तता,तिकड़म आदि की इसकी तुलना में मूल्यवान समझते हैं।जो चालाक है-चतुर है वह दुनियादार है,उसकी आए दिन सफलताओं की चर्चा करते नहीं अघाते।

हमारे उपनिषद का सुंदर कथन है ´स्वाभाविकी ज्ञानवल क्रिया च।´यानी उस एक की ही ज्ञान क्रिया और बल क्रिया स्वाभाविक है।यानी हमारी इच्छा का मंगल-इच्छा से जब सामंजस्य हो जाता है तो सारी क्रियाएं सहज हो जाती हैं।उसके बाद अहंकार हमें धकेलता नहीं है। सामाजिक गुटबंदी,यश की कामना,किसी तरह का उत्पीड़न आदि हमारी इच्छाओं को धकेलता नहीं है। सामाजिक विकास के क्रम में हमारी इच्छाएं प्रबल होती गयी है लेकिन मंगल-इच्छा के साथ निजी इच्छाओं के सामंजस्य को हम भूल गए,फलतःहमारे जीवन में जटिलताओं ने जन्म ले लिया है।मसलन् ,हमारी इच्छा है कि दीपावली पर पटाखे चलाएं लेकिन इसका सामाजिक मंगल के साथ टकराव है,इसे हम अनदेखी कर रहे हैं।व्यक्ति की निजी इच्छा और सामाजिक मंगलइच्छा इन दोनों के बीच में सामंजस्य से ही ज्ञानबल और क्रियाबल की अभिव्यक्ति होती है। जो आदेश हमारी निजी इच्छा को सामाजिक मंगल की इच्छा से जोड़ते हैं वे हमें इन दिनों अच्छे नहीं लगते।

हम ज्ञान में पिछड़े क्यों क्योंकि हम स्वाभाविक नहीं रहे,सरल नहीं रहे।हमारे यहां सब कुछ जटिल है,तामझाम से युक्त है।मंगल इच्छा से संचालित नहीं है। कुछ साल पहले की घटना है इटली के प्रधान मार्क्सवादी और विश्व के जीवित सबसे बड़े बुद्धिजीवी उम्ब्रेतो इको दिल्ली आए थे,उनकी सादगी ,सरलता और सज्जनता देखने लायक थी।मैं कोलकता से चलकर उनके दिल्ली व्याख्यान को सुनने आया था।उनका जेएनयू में भी कार्यक्रम था, उन्होंने जेएनयू में ´टेस्ट´या ´अभिरूचि´ के सवाल पर बहुत सुंदर व्याख्यान दिया ,इसके लिए उन्होंने भरत के रस सिद्धांत को आधार बनाया था और अभिनव गुप्त-आनंदवर्द्धन की मदद ली।दिलचस्प बात यह थी कि इको कार्यक्रम शुरू होने के समय आ चुके थे,लेकिन बाहर कहीं बैठकर कॉफी पी रहे थे किसी ने उनसे कहा कि लोग सुनने आ गए हैं वे तुरंत कॉफी लेकर हॉल में चले आए और कॉफी का कप हाथ में लिए मंच पर चढ़ने वाली चीढ़ियों पर सहज भाव से बैठ गए और आराम से उन्होंने पहले कॉफी पी। उनकी इस सहजता को देखकर सभी लोग मंत्रमुग्ध थे।दिलचस्प बात थी कि हॉल में उपस्थिति अधिकांश अंग्रेजीदां लोग भरत-आनंदवर्द्धन-अभिनवगुप्त आदि के नाम तक से अपरिचित थे,अनेक फैकल्टी मेम्बर एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि आनंदवर्द्धन कौन हैं,अभिनव गुप्त कौन हैं ॽ पहलीबार मुझे बड़ा झटका लगा कि जिस जेएनयू पर हम गर्व करते हैं वहां अनेक ऐसे भी विद्वान हैं जो आनंदवर्द्धन के नाम तक को नहीं जानते।





मंत्र यानी बांधने का उपाय-

      मेरा जब जनेऊ हुआ तो उस समय मेरी उम्र 7साल की थी,पिता ने बड़े जतन के साथ वैदिक रीति से हम सब भाईयों का जनेऊ कराया। साथ में दो और भाईयों का जनेऊ हुआ। स्व.कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी,श्रीजी मंदिर –यमुनाजी धर्मराज मंदिर वाले मेरे दीक्षागुरू बने, उन्होंने ही मंत्र दीक्षा दी,पहले गायत्री मंत्र की दीक्षा दी,साथ में बाला और भुवनेश्वरी के मंत्रों की दीक्षा दी,पिता के पास पहले से ही महात्रिपुरसुंदरी यंत्र थे।यानी बचपन से तीन देवियों गायत्री,बाला और भुवनेश्वरी की उपासना पद्धतियां जीवन में शामिल हो गयीं।बचपन के तकरीबन 12साल सघन आराधना-उपासना में बीते।मैं सुबह 4बजे उठता था,उठकर पढ़ता था, आधा गिलास चाय माँ बनाकर 4बजे ही दे देती थी।सात साल की उम्र से लेकर 12 साल की उम्र तक तो सुबह उठकर संध्या आदि करने के अलावा समूची तांत्रिक पद्धति से पूजा उपासना में पाँच-छह घंटे खर्च करता था। घर में ही पूजा की बढ़िया व्यवस्था थी।बाद में 11 साल की उम्र से माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा तो दैनंदिन जीवन में बदलाव आया।पूजा के घंटे कम हो गए,पढाई के घंटे बढ़ गए। इनमें सुबह का पढ़ना शामिल हो गया,पहले सुबह उठकर कम पढ़ता था, पूजा-उपासना में मन ज्यादा लगाता था।

मेरा घर यमुना के किनारे है और यमुना के उस पार एक बगीची खरीदी गयी उसका एकमात्र मकसद ही यही था कि पूजा के लिए फूलों को लाना।मेरी पूजा में तकरीबन डेढ़ दो किलो फूल लगते थे।इतने फूल रोज खरीदना संभव नहीं था। यह बगीची आज भी है,दुर्वासा ऋषि के आश्रम के पास ही ईसापुर ग्राम में, वहां भी पिता ने एक मंदिर बनवाया था, मैं सुबह ही सुबह पांच बजे के करीब रोज पिता के साथ वहां नाव में बैठकर निकल जाता और वहां घंटों रहता,नहाना-धोना-पूजा-भजन आदि करना,नाश्ता के तौर पर वहीं पर फल आदि तोड़कर खाना,यह दैनिक क्रिया तकरीबन 7-8 साल चली। दिलचस्प बात यह है कि मैंने जितना भजन-पूजन किया मेरे जीवन के दुख कम नहीं हुए।इससे एक बात बचपन में ही समझ में आ गयी कि भजन-पूजन-ईश्वरोपासना का दुख दूर करने से कोई संबंध नहीं है। हकीकत यह थी कि जितना भजन मैंने किया शायद मेरे साथ के किसी मित्र ने नहीं किया।जितनी पूजा मैंने की,उतनी किसी ने नहीं की।सब कुछ मंत्रबद्ध,सही पद्धति के साथ बेहतरीन गुरूओं के निर्देश में किया।इस मामले मैं मेरे असल गुरू तो पिताजी ही थे,वे तंत्र के पारंगत विद्वान हैं,वेदों का उन्होंने गंभीरता से अध्ययन किया है। दीक्षागुरू कामेश्वरनाथ जी निजी तौर पर बेहतरीन इंसान थे, हमें बेहद प्यार करते थे। इस वाकया को बताने के दो प्रधान कारण हैं ,पहला, निजी जीवन की तलाश,दूसरा,मंत्र के साथ अपने संबंध की नए सिरे से खोज।मंत्र जप मुझे आज भी प्रिय है,मैं मंत्र जप करता हूँ।आमतौर पर अजपा-जप करता हूँ।यानी मन ही मन मंत्र जप चलता रहता है।

मंत्र का एक रूप वह है जिसे पूजा-उपासना के संदर्भ में हमलोग जानते और मानते हैं लेकिन मंत्र का एक दूसरा बड़ा अर्थ भी जिसे आमतौर पर लोग नहीं जानते।मंत्र जप के संदर्भ में पहली बात यह कि मंत्र जप से मनोकामना कभी पूरी नहीं होती,मंत्र जप से सिद्धियां प्राप्त नहीं होतीं,ये सब बातें पाखंडियों की रची गयी हैं।मंत्र का प्रयोजनमूलक उद्देश्य पाखंडियों की सृष्टि है।मंत्र तो असल में जीवन को बाँधने का उपाय है।आप अपने जीवन को किस तरह के तारों से बाँधना चाहते हैं यह मंत्र से तय होता रहा है।मंत्र यानी जीवन बाँधने की कला।मंत्र को यदि जीवन जीने की कला के रूप में लें और देखें तो हमारे धर्म के अनेक संकट और व्याधियां खत्म हो जाएं।अनेक पाखंड खत्म हो जाएं।मंत्र का मतलब पाखंड से किसने जोड़ा हमें नहीं मालूम, लेकिन यही सच्चाई है कि मंत्र आज पाखंड का अंग है।जीवन जीने के अनेक रूप हैं उनमें से आपको चुनना होगा कि कैसे जिओगे,मंत्र असल में जीने के मार्ग को बांधने, नियोजित करने,संगठित,अनुशासित होकर जीने की कला है।

जीवन आज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ है, भयानक अराजकता है, जीवनशैली के रूपों में अराजकता है , हमारे पास जीवनशैली को बांधने,संगठित करने का कोई उपाय नहीं है, पुराने जमाने में मंत्र का आविष्कार असल में जीवन बाँधने की कला के रूप में हुआ ,उसके हजारों-लाखों रूप हमें परंपरा में मिलते हैं, लाखों मंत्र मिलते हैं।जीवन जीने के लिए मंत्र जरूरी है,मंत्र के बिना जीवनशैली के अव्यवस्थित और अराजक हो जाने के चांस ज्यादा हैं।मंत्र का दूसरा पहलू है उदात्तता।मंत्र हमें क्षुत्रताओं से परे ले जाता है, निहित-स्वार्थों से परे ले जाता है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने सही लिखा है ´मंत्र नामक वस्तु जीवन बाँधने का एक उपाय है।मंत्र का सहारा लेकर हम चिंतन के विषय को मन के साथ बाँधे रहते हैं।यह मानो वीणा की खूँटी,उसके कान की तरह है।तार को ऐंठ कर बाँधे रखने का साधन,वह तार को खुलकर अलग नहीं होने देता,उसे कस कर बाँधे रखता है।विवाह के समय स्त्री-पुरूष के वस्त्रों को गाँठ लगाकर बाँध दिया जाता है।इसके साथ मंत्र पढ़ दिए जाते हैं,वे मंत्र मन में ग्रंथि-बंधन करते रहते हैं।ईश्वर के साथ हमारे ग्रंथि-बंधन की जो जरूरत है,मंत्र उसमें सहायता करता है। इस मंत्र के सहारे हम उनके साथ अपना कोई एक संबंध पक्का कर लेंगे। वैसा एक मंत्र है पिता नोsसि।आप मेरे पिता है।मंत्र के इस सुर में अपने जीवन को बाँध लेने पर सारी चिन्ताओं,सारे कर्मों में एक विशेष रागिनी झंकृत हो उठेगी।मैं उनका पुत्र हूँ यही उक्ति साकार होकर हमारे सारे कार्य कलापों में प्रकाशित होने लगेगी कि मैं उनका पुत्र हूं।´

कहने का आशय यह कि मंत्र के मर्म को हम भूल गए और उसे हमने व्यवहारवाद,अवसरवाद, फल प्राप्ति के उपायों का सहारा बना दिया।मैं भी कभी-कभी किसी के मन संतोष के लिए उपाय के तौर पर मंत्र सुझा देता हूँ लेकिन सच यही है कि मंत्र उपाय नहीं है बल्कि मंत्र जीवन को बाँधने की कला है।संगठित नियमित जीवन जीना है तो मंत्र से सीखो।किसी अन्य से नहीं।







मंगलवार, 22 अगस्त 2017

शिक्षा किसके दवाब में है ? शिक्षा के शत्रु कौन हैं ?


      भारतीय समाज की आयरनी यह है कि सब शिक्षा लेना चाहते हैं लेकिन शिक्षा पर सोचना कोई नहीं चाहता।शिक्षा साझा समस्या है लेकिन इस पर न कोई जनांदोलन है और न किसी तरह की सामाजिक सचेतनता नजर आती है।यहां तक कि शिक्षकों और छात्रों में भी शिक्षा की समस्याओं को लेकर कोई सचेतनता और सक्रियता नहीं है।राजनीतिकदलों ने हमेशा शिक्षा को एक मृत विषय या अप्रासंगिक विषय के रुप में  व्यवहार किया है।शिक्षितों में शिक्षा संबंधी अचेतनता बताती है कि हमारा शिक्षित समाज, राजनीतिक संरचनाएँ, संसद-विधानसभा आदि  इस विषय को लेकर कितनी अचेत हैं।
     कल दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने यह फैसला लिया कि ४०० से ज्यादा प्राइवेट स्कूलों को सरकार अधिग्रहीत करेगी क्योंकि वे स्कूल सरकार की नहीं मान रहे थे और मनमानी फ़ीस वसूल कर रहे थे। कायदे से इस तरह के फैसले अन्य राज्य सरकारों को भी लेने चाहिए।दिल्ली सरकार ने पहले निजी स्कूलों को चेतावनी दी जब उन्होंने चेतावनी नहीं मानी तो सरकार ने अधिग्रहीत करने का आदेश दिया।दिलचस्प बात यह है इस खबर को मीडिया ने कहीं पर भी प्रमुखता से न छापा और न टीवी कवरेज ही मिला।शिक्षा को लेकर जो उदासीनता है यह उसका ताजा उदाहरण है। मैंने हाल ही में अपने तीस साल के टीवी अध्ययन में पहलीबार एकमात्र एनडीटीवी पर कई दिनों तक लगातार स्कूली शिक्षा की दशा पर महत्वपूर्ण सचेतनता पूर्ण टीवी टॉक शो देखा।किसी भी टीवी ने आज तक इतना व्यापक कवरेज शिक्षा पर प्राइम टाइम में नहीं दिया।
          असल में शिक्षा का विगत सत्तर सालों में बुनियादी अर्थ ही बदल गया है , जेएनयू पर जिस तरह केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया ने हमला किया है उसने एक ही संदेश दिया है कि शिक्षा व्यवस्था को सरकारी दल का पिछलग्गू या भोंपू होना चाहिए।शिक्षा तकरीबन समूचे देश में आज सरकारी दल के पिछलग्गू के रुप में ही काम कर रही है।विभिन्न राज्य सरकारें अपने निहित स्वार्थी नजरिए के अनुकूल लोगों को नौकरी देती हैं और तदनुरूप पठन-पाठन भी होता है।
                 विगत सत्तर सालों में तीन तरह के उपयोगितावाद को शिक्षा में देखा गया है।पहला, राजनीतिक उपयोगितावाद,दूसरा,व्यापारी उपयोगितावाद और तीसरा ,नौकरीकेन्द्रित उपयोगितावाद।शिक्षा संबंधी नीति,परिप्रेक्ष्य और आधारभूत संरचनाओं के निर्माण संबंधी फैसले इन तीन तरह के उपयोगितावाद को केन्द्र में रखकर लिए जाते रहे हैं, इसने आम शिक्षितों के शिक्षा संबंधी अज्ञान में इजाफा किया है,शिक्षा सचेतनता को दोयम दर्जे की चेतना बनाकर रख दिया है।
            शिक्षा का बुनियादी काम उपयोगितावादी बुद्धि निर्मित करना नहीं है। शिक्षा का बुनियादी काम है सचेतन नागरिक बनाना।दिलचस्प बात यह है हम जब पढते-पढाते हैं तो उपभोगवादी दृष्टिकोण से काम लेते हैं। मांग-पूर्ति के नजरिए से कक्षा में प्रवेश करते हैं।पाठ्यक्रम पढाना है और पाठ्यक्रम पढना है।काम के सवाल और उनके उत्तर बताना -लिखाना मात्र मकसद रह गया है।छात्र ,शिक्षा और शिक्षक की इतनी सीमित भूमिका के कारण ही आज शिक्षा एकदम अप्रासंगिक होकर रह गयी है।इसने शिक्षक को दाता और छात्र को उपभोक्ता मात्र बनाकर रख दिया है।आज शिक्षक और छात्र शिक्षा के कल-पुर्ज़े मात्र होकर रह गए हैं।आज छात्र-शिक्षक सचेतन नागरिक नहीं रह गए, बल्कि उलटा हो रहा है , जेएनयू के छात्रों -शिक्षकों को सचेतन नागरिक होने के नाते,उनके समर्थक शिक्षकों और छात्रों को सारे देश में राष्ट्रविरोधी कहकर अपमानित किया जा रहा है।
            जेएनयू का इस व्यवस्था के साथ एक ही बात पर मेल नहीं बैठता , वे शिक्षा के उपयोगितावाद और दाता-उपभोक्ता वाले मॉडल को एकसिरे ठुकराते  हैं,यही वजह है कि जेएनयू आज केन्द्र सरकार,आरएसएस और कारपोरेट मीडिया के निशाने पर है। जेएनयू की खूबी है कि वहाँ शिक्षित नागरिक तैयार किए जाते हैं और यही वजह है कि सत्ताधारियों को यह बात पसंद नहीं है।जेएनयू के छात्र और शिक्षक नागरिकचेतना, नागरिक हकों और संवैधानिक सोच-समझ को लेकर शिक्षित  हैं, वे दैनन्दिन राजनीति की जटिलताओं को समझने और उनका समाधान खोजने, उसके लिए संघर्ष करने की समझ रखते हैं,वे मूढमति शिक्षितजन नहीं हैं,इस मायने में वे सारे देश से भिन्न एकदम विकसित चेतनायुक्त नजर आते हैं।जेएनयू माने सचेतन नागरिक की पहचान ,यही चीज है जो सत्ताधारियों को बेचैन किए रहती है।पहले कांग्रेसी परेशान थे अब आरएसएस परेशान है।
         शिक्षा जहाँ एक ओर नागरिकबोध पैदा करे वहीं साथ ही सामाजिक यथार्थ के अन्तर्विरोधों को गहराई से जानने की दृष्टि भी दे।इन अन्तर्विरोधों को जाने बग़ैर नागरिकचेतना नहीं बनती।जेएनयू में यह दृष्टिकोण पूरे कैम्पस के माहौल में रचा बसा है।आप किसी भी विषय के  शिक्षक और छात्र हों यह परिवेश आपको शिक्षित करेगा,अन्यत्र संस्थानों में यह चीज दुर्लभ है।अन्यत्र शिक्षा संस्थानों में "शिक्षित युवा", "कमाऊ युवा" मिलेगा ,नागरिकचेतना संपन्न नागरिक कम मिलेंगे।
             
     

सोमवार, 21 अगस्त 2017

शिक्षण की स्टीरियोटाइप शैली के खतरे


       शिक्षा में लगे लोग जाने-अनजाने जिस शैली का शिक्षण के लिए इस्तेमाल करते हैं उस पर कभी घर जाकर सोचते होंगे इस पर मुझे संदेह है।शिक्षण शैली के तीन स्टीरियोटाइप पहलू हैं, पहला , प्रस्तुति की स्टीरियोटाइप शैली, दूसरा, स्टीरियोटाइप पाठ्यक्रम, तीसरा, ज्ञान का स्टीरियोटाइप दार्शनिक नजरिया,वर्ग और राष्ट्र का स्टीरियोटाइप नजरिया।पढाते समय इन तीनों ही किस्म के स्टीरियोटाइप से बचने की जरूरत है।
      शिक्षण सर्जनात्मक होता है,वह तयशुदा चीजों और बातों से शुरु तो हो सकता है लेकिन उसका लक्ष्य तयशुदा लक्ष्य को प्राप्त करना नहीं है,बल्कि तयशुदा से परे जाकर नए की खोज करना उसका लक्ष्य है,तयशुदा के बारे में सवाल खडे करना, संवाद-विवाद पैदा करना । यदि स्टीरियोटाइप फ्रेमवर्क में ही चीजें पेश की जाती  हैं तो संवाद पैदा नहीं होगा।सवाल खडे नहीं होंगे।खोज और जिज्ञासा की भावना पैदा नहीं होगी।खोज और जिज्ञासा की भावना के बिना आप आधुनिक नहीं बन पाएँगे, यही वजह है  हमारी शिक्षा पूर्व-आधुनिक मनोभावों और मूल्यों से मुक्त नहीं करती।कहने का मतलब यह कि स्टीरियोटाइप नजरिया और अभ्यास शिक्षक और छात्र दोनों को नुकसान पहुँचाता है।
         हिंदी फिल्मों में ऐसी फ़िल्में बनी हैं जो स्टीरियोटाइप को चुनौती देती हैं.मसलन् , "तारे जमीन पर" (२००७) में ऐसा शिक्षक है जो एकदम खुले दिमाग का है और पूर्वाग्रहों से रहित है।" मैं हूं ना" (२००४)फिल्म में शिक्षक -छात्र मित्रता पर जोर है।शिक्षक बोरिंग नहीं होता। "चक दे इण्डिया" (२००७)में शिक्षक की भूमिका है टीम को एकजुट करने की,"थ्रीइडियट"(२००९) में बोमन ईरानी (वीरू सहस्त्रबुद्धे ,शिक्षक का नाम) जीनियस और अहंकारी शिक्षक है, वहीं आमिर खान (रांचो)का चरित्र है जो लगातार यही बताता है कि डिग्रियाँ कहीं नहीं ले जातीं।असली ज्ञान तो क्लास रुम और किताबों के बाहर है।"ब्लैक" फिल्म में अमिताभबच्चन ( देवराज सहाय) बताता है कि शिक्षक किस तरह अर्थपूर्ण जीवन बना सकता है।इसी तरह "मोहब्बतें" फिल्म में जोर है कि शिक्षक को नरमदिल होना चाहिए तब ही वह छात्रों की संवेदनाएँ समझ सकता है।

शिक्षा में साम्प्रदायिकता और स्टीरियोटाइप

 
           आप देश में कहीं पर भी जाइए आपको विश्वविद्यालयों और कॉलेज शिक्षकों में एक बड़ा तबक़ा मिलेगा जो सहज और स्वाभाविक तौर पर साम्प्रदायिकचेतना और जातिचेतना संपन्न है । स्थानीय तौर पर अनेक मसलों पर ये लोग साम्प्रदायिक या जातिवादी नजरिए से सोचते हैं । इस तरह की चेतना कांग्रेस के जमाने में भी थी और आज भी है।लेकिन भाजपा-आरएसएस का प्रचार यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में वामदलों का , वाम विचारधारा का वर्चस्व है।आरएसएस का यह प्रचार एकदम निराधार और सफेद झूठ है।मैं जब पढता था तब और जब पढाने लगा तब भी अधिकांश शिक्षकों में साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना के मैंने जेएनयू से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक साक्षात दर्शन किए हैं।सवाल यह है शिक्षकों में यह चेतना कहाँ से आती है? हम अपनी शिक्षा और शिक्षकों को साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना से मुक्त क्यों नहीं कर पाए ? असल में हमारी शिक्षा परिवर्तन विरोधी है , परिवर्तनकामी को शिक्षा में शक की नजर से देखते हैं।
          एक अन्य बुनियादी सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज तर्क और विवेक के आधार पर चल रहे हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से चल रहे हैं ? शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तर्क,विवेक और वैज्ञानिक नजरिए से पढाते हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से पढाते हैं? अंदर की हकीकत यह है कि हम अपने विद्यार्थी को स्टीरियोटाइप पद्धति से पढाते हैं।वास्तविकता यह है कि हमारे विकास और परिवर्तन की गारंटी स्टीरियोटाइप नजरिया नहीं है। हमें यदि बदलना है और नया समाज बनाना है तो तर्क और विवेक के आधार पर चीजों को देखने,समझने और परखने के संस्कार पैदा करने होंगे।ये चीजें ही शिक्षा की सार्थकता की गारंटी हैं।
         विश्वविद्यालय और कॉलेज का नाम आते ही  पहला शब्द ज़ेहन में आता है वह है ज्ञान या नॉलेज।सवाल यह है हम ज्ञान कैसे अर्जित करते हैं ? ज्ञान कैसे संप्रेषित करते हैं ? जानना या खोज की भूख पैदा करना बेहद जरुरी है लेकिन हमारा समूचा पठन -पाठन ज्ञान की भूख पैदा नहीं करता,खोज की इच्छा पैदा नहीं करता इसके विपरीत हमने यह मान लिया है कि हमें किसी तरह डिग्री हासिल करनी है, नौकरी हासिल करनी है और इसके लिए जितना जरुरी है उतना ही पढो, रट लो और फिर काम पर निकल लो! यानी ज्ञान के साथ हमने प्रयोजनमूलक संबंध बनाया है ज्ञानकेन्द्रित संबंध नहीं बनाया है।शिक्षा में प्रयोजनमूलक दृष्टि हमें पुराने संस्कारों ,मूल्यों और संबंधों से मुक्त करने में मदद नहीं करती यही वजह है कि हम जैसे पढने आते हैं डिग्री पाने के बाद भी वैसे ही बने रहते हैं। यही दशा शिक्षकों की भी है। वे शिक्षित होकर भी अवैज्ञानिक बातें करते हैं, तर्कहीन और अविवेकपूर्ण बातें करते हैं ,अपरिवर्तित बने रहते हैं। 
       असली शिक्षा वह है जो मनुष्य को बदले, मनुष्य के अंदर बैठे पशुबोध को नष्ट करे। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम न तो बदलते हैं और न हमारे अंदर का पशुबोध मरता है बल्कि शिक्षित होने के बाद यह  प्रबल और शक्तिशाली हो जाता है।यथास्थिति बनी रहती है और इसे बनाने में स्टीरियोटाइप पठन-पाठन की केन्द्रीय भूमिका है।यही वह बुनियादी जगह है जहाँ पर साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना फल-फूल रही है।
        

रविवार, 20 अगस्त 2017

मोदीमोह के छंद से गुज़रते हुए



     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी बोलते हैं तो सवा सौ करोड़ भारतवासियों को सम्बोधित करके बोलते हैं।वे हर इलाके में प्रचलित समस्या को उठाते हैं और उसे स्थानीय भावनाओं से जोड़ते हैं।फलत:मंच पर वे राजनीतिक तौर पर सही नजर आते हैं, सुनने वाला यही कहता है  मोदीजी सही बोल रहे हैं।इस क्रम में जहाँ वे समस्या की ओर व्यापकतम जनता के तबक़ों का ध्यान खींचने में सफल हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर जनता को मंत्रमुग्ध कर लेते हैं।
      मोदी के प्रचार में मंत्रमुग्ध करना ही सबसे प्रमुख चीज है। स्थिति यह है सभी विपक्षी नेता तक उनकी भाषणकला का लोहा मानते हैं।मंत्रमुग्ध करने के बाद उनका असली खेल आरंभ होता है ।वह श्रोताओं को बहलाना-फुसलाना शुरू कर देते हैं।वे मंत्रमुग्ध भावबोध को वोट देने की मंशा से जोड़ देते हैं,भाजपा-आरएसएस के लक्ष्यों से जोड़ देते हैं।इस क्रम में जनता यह भूल जाती है कि भाजपा-आरएसएस ने वर्तमान या अतीत में क्या किया ।यही वजह है कि मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद भाजपा-आरएसएस के वर्तमान और अतीत के कर्म-कुकर्मों पर बहस ही नहीं होती, उसके जनविरोधी -साम्प्रदायिक चरित्र पर बहस नहीं होती।
     मंत्रमुग्ध करके बहलाने-फुसलाने की कला के कारण हमेशा चीजें भविष्य की ओर ठेली जा रही हैं। मोदीजी जो कुछ करेंगे वह भविष्य में सामने आएगा, वर्तमान में उसे मत खोजो।राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित करने को वर्तमान की बजाय भविष्य में ठेलना अपने आपमें सबसे बडा अविवेकवाद है।लेकिन आम जनता को यह अविवेकवाद नजर ही नहीं आता।
   मोदी और आरएसएस का सारा जोर आक्रामक प्रचार अभियान पर है जिससे वे अपनी असफलताओं को आम जनता से छिपाने में सफल रहे हैं।मसलन जो उन्होंने चुनावी वायदे किए थे उनको वे आजतक पूरा नहीं कर पाए ,लेकिन जनता इस सब पर बहस ही नहीं कर रही, वह तो मोदीमोह में डूबी है और सुंदर भविष्य का इंतजार कर रही है, आम जीवन में सामाजिक-आर्थिक तौर पर जो गिरावट आई है उस पर समाज में कहीं पर बहस नहीं हो रही और सारी जनता भविष्य के हवाले कर दी गयी है, यह मोदी के प्रचार अभियान की सबसे बडी सफलता है।
        हम सब जानते हैं कि कांग्रेस और यूपीए की जनविरोधी नीतियों से जनता परेशान थी उसने मजबूरी में , विकल्प के अभाव में भाजपा-मोदी को वोट दिया था।मोदी आम जनता की रेशनल पसंद नहीं हैं बल्कि वे मजबूरी में , विकल्प के अभाव में सत्ता में आए हैं।वहीं दूसरी ओर मोदी के प्रचार अभियान ने विकल्प बनाने में मदद की।
        प्रचार अभियान के जरिए दो तरह के लोगों को ख़ासतौर पर निशाना बनाया गया।एक तरफ भाजपा-आरएसएस के समर्थकों को निशाना बनाया गया वहीं दूसरी ओर तटस्थ  मतदाताओं को निशाना बनाया।इसके लिए बृहत्तर जन आकांक्षाओं को प्रचार अभियान के केन्द्र में रखा गया।
        मोदी के प्रचार अभियान के प्रभाव को उनको मिले वोट की तराज़ू में नहीं तोलना चाहिए, कहने उनको मात्र ३१ प्रतिशत वोट मिले हैं, लेकिन उनके प्रचार के असर को देखना हो तो यहां से देखो कि उन्होंने भाजपा और आरएसएस के बारे में जनता का नजरिया ही बदल दिया।उन्होंने जितने भी राजनीतिक एक्शन किए उसकी संगति में प्रचार मशीन को सक्रिय रखा जिसका उनको लाभ मिला।मसलन् लवजेहाद,गऊ रक्षा, जेएनयू आदि के बारे में उनके राजनीतिक एक्शन को आम लोगों में व्यापक समर्थन मिला जबकि ये तीनों मसले एकसिरे से जनविरोधी और संविधान विरोधी फ्रेमवर्क में चलाए गए।आम लोगों में इन तीनों मसलों पर या तो संघ परिवार के साथ सहमति नजर आई या फिर लोगों ने प्रतिवाद को गंभीरता से नहीं लिया।

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